थप्पड़ सिर्फ़ एक महिला को नहीं, लोकतंत्र के चेहरे पर भी पड़ा है
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
थप्पड़ सिर्फ़ एक महिला को नहीं, लोकतंत्र के चेहरे पर भी पड़ा हैलोकतंत्र की पहचान इस बात से नहीं होती कि राज्य के पास कितनी शक्ति है, बल्कि इस बात से होती है कि वह उस शक्ति का प्रयोग कितने संयम, कितनी संवैधानिक मर्यादा और कितनी मानवीय संवेदनशीलता के साथ करता है।
जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के दौरान सामने आए उस वीडियो ने पूरे देश को झकझोर दिया, जिसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कथित रूप से एक महिला प्रदर्शनकारी को थप्पड़ मारते दिखाई देते हैं। यदि न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह घटना सत्य सिद्ध होती है, तो यह केवल एक व्यक्ति के आचरण का मामला नहीं रहेगा; यह पुलिस प्रशिक्षण, जवाबदेही और लोकतांत्रिक संस्कृति पर गंभीर प्रश्नचिह्न होगा।
घटना के बाद संबंधित अधिकारी को प्रदर्शन स्थल की ड्यूटी से हटाया जाना यह संकेत देता है कि मामला साधारण नहीं माना गया। साथ ही, दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा पुलिस से जवाब तलब करना तथा सीसीटीवी और अन्य वीडियो सुरक्षित रखने के निर्देश देना भी इस बात का प्रमाण है कि इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। अब यह केवल सोशल मीडिया की बहस नहीं, बल्कि न्यायिक परीक्षण का विषय है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही किसी महिला के साथ किसी भी परिस्थिति में ऐसा व्यवहार लोकतांत्रिक राज्य की पुलिस से अपेक्षित है? पुलिस को कानून लागू करने का अधिकार अवश्य है, लेकिन संविधान उसे अपमान करने का अधिकार नहीं देता। बल प्रयोग की वैधता और नागरिक गरिमा—दोनों साथ-साथ चलने चाहिए। यदि इनमें से एक भी टूटता है, तो कानून का नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 14 समानता का आश्वासन देता है, अनुच्छेद 19 शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति और सभा की स्वतंत्रता का संरक्षण करता है, और अनुच्छेद 21 जीवन एवं व्यक्तिगत गरिमा की रक्षा करता है। प्रदर्शनकारी कानून से ऊपर नहीं हैं, लेकिन राज्य भी संविधान से ऊपर नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि छात्र आंदोलन का मूल प्रश्न—पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और युवाओं का भविष्य—बार-बार पुलिस कार्रवाई की खबरों के पीछे दबता जा रहा है। लोकतंत्र में सरकार का लक्ष्य आंदोलन को बलपूर्वक समाप्त करना नहीं, बल्कि उसके कारणों का समाधान करना होना चाहिए। जब संवाद की जगह टकराव ले लेता है, तब व्यवस्था अपनी नैतिक शक्ति खोने लगती है।
यदि किसी पुलिस अधिकारी ने अधिकारों की सीमा का उल्लंघन किया है, तो उसके विरुद्ध निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई होना कानून के शासन की अनिवार्य शर्त है। लेकिन यदि जांच में तथ्य भिन्न निकलते हैं, तो वह भी उतनी ही पारदर्शिता से सार्वजनिक होने चाहिए। लोकतंत्र में न तो भीड़ का फैसला अंतिम होता है और न सत्ता का; अंतिम कसौटी कानून और निष्पक्ष जांच ही है।
आज देश की निगाह केवल उस एक वीडियो पर नहीं है। देश यह भी देख रहा है कि क्या हमारी संस्थाएँ—पुलिस, न्यायपालिका और सरकार—इस अवसर को आत्मसुधार में बदलती हैं या नहीं। क्योंकि किसी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत अपनी गलतियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने की क्षमता होती है।
"जब नागरिक का प्रश्न अनुत्तरित रह जाए और जवाब में थप्पड़ दिखाई दे, तब संकट कानून-व्यवस्था का नहीं, लोकतांत्रिक संवेदनशीलता का होता है।"
