जंतर-मंतर ने पत्रकारिता का पोस्टमार्टम कर दिया
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जंतर-मंतर ने पत्रकारिता का पोस्टमार्टम कर दिया
"जब एक पूरी पीढ़ी ने कैमरा उठा लिया, तब न्यूज़रूमों को पहली बार अपना चेहरा ठीक से दिखाई दिया।"
जंतर-मंतर पर जो कुछ घटा, वह केवल एक छात्र-आंदोलन या पुलिस-प्रदर्शन की घटना भर नहीं था। वह भारतीय पत्रकारिता के लिए एक सार्वजनिक अदालत थी। वहाँ जो सवाल उठा, वह यह नहीं था कि किसने किसको रोका, किसने किसे धक्का दिया, किसने किस पर लाठी उठाई। असली सवाल यह था कि ऐसी घटनाओं की सच्चाई को देश तक कौन पहुँचाएगा—वह पत्रकारिता, जो वर्षों से सत्ता के गलियारों में अपनी रीढ़ ढीली करती आई है, या वह नई पीढ़ी, जिसने बिना किसी संपादकीय अनुमति के, बिना किसी चैनल की मुहर के, खुद रिपोर्टिंग शुरू कर दी है?
यही वह क्षण था जब “जेन जी” ने पुराने मीडिया को उसकी औकात नहीं, उसकी सीमाएँ दिखाईं। और यह दृश्य जितना अपमानजनक पुरानी पत्रकारिता के लिए था, उतना ही आवश्यक भी। क्योंकि यह संकट अचानक नहीं आया। इसे पत्रकारिता ने खुद कमाया है।
आज देश का नागरिक जब किसी बड़ी घटना की सच्चाई जानना चाहता है, तो वह पहले न्यूज़रूम की ओर नहीं, किसी मोबाइल कैमरे की ओर देखता है। पहले किसी लाइव-स्ट्रीम पर भरोसा करता है, फिर टीवी चैनल पर। पहले किसी छात्र, किसी राहगीर, किसी नागरिक के वीडियो में सच खोजता है, फिर स्टूडियो में बैठे एंकर की व्याख्या सुनता है। यह बदलाव तकनीक का नहीं, विश्वास के पतन का परिणाम है। और विश्वास का यह पतन किसी एक दिन में नहीं हुआ। इसे “ब्रेकिंग न्यूज़” की भूख, टीआरपी की दौड़, सत्ता के प्रति झुकाव, मालिकाना दबाव और सवाल पूछने से बचने की आदत ने धीरे-धीरे जन्म दिया।
जंतर-मंतर ने इस सड़ांध को उजागर कर दिया। वहाँ कुछ लड़के-लड़कियाँ, जिनके हाथ में न महंगा कैमरा था, न ओबी वैन, न सैटेलाइट लिंक, फिर भी वे उस दृश्य को रिकॉर्ड कर रहे थे जिसे इतिहास समझना चाहता था। कोई मोबाइल उठाए दौड़ रहा था, कोई फ्रेम पकड़ रहा था, कोई पुलिस के कदमों को कैद कर रहा था, कोई उस पल को दर्ज कर रहा था जब एक नागरिक भय और साहस के बीच खड़ा था। यह दृश्य पत्रकारिता का भी था, और उसकी कमी का भी।
पुराने न्यूज़रूमों ने वर्षों तक यह मानकर चलाया कि पत्रकारिता आईडी कार्ड में बसती है। वे भूल गए कि पत्रकारिता का निवास स्थान ईमानदारी है। उन्होंने सोचा कि कैमरा बड़ा हो, स्टूडियो चमकदार हो, एंकर की आवाज़ भारी हो, तो सत्य अपने आप आ जाएगा। लेकिन जंतर-मंतर ने दिखाया कि सत्य कई बार छोटे से मोबाइल में कैद होता है और बड़े से चैनल के नीचे दबा दिया जाता है। पत्रकारिता का आकार नहीं, उसका साहस निर्णायक होता है।
यह बात केवल तकनीक की नहीं है; यह पेशे की नैतिक विफलता की है। हमने पत्रकारिता को समाचार से अधिक कारोबार में बदलने दिया। हमने सवालों की जगह सुविधा को, जोखिम की जगह आराम को, और सार्वजनिक हित की जगह संस्थागत हित को प्राथमिकता दी। हमने उस पत्रकार को सम्मान दिया जो “मैनेज” हो सकता था, और उस रिपोर्टर को किनारे किया जो “असुविधाजनक” था। हमने न्यूज रूम को जनहित का मंच नहीं, आज्ञाकारिता का कारखाना बना दिया। फिर आश्चर्य किस बात का कि जनता ने हमसे मुँह मोड़ लिया?
जंतर-मंतर की एक और महत्वपूर्ण सीख यह है कि नागरिक पत्रकारिता अब कोई वैकल्पिक अभ्यास नहीं रही। वह मुख्यधारा पत्रकारिता की चुनौती बन चुकी है। नागरिक जब कैमरा उठाता है, तो वह सिर्फ घटना रिकॉर्ड नहीं करता; वह सत्ता के कथानक में दरार डालता है। वह यह सुनिश्चित करता है कि कोई कार्रवाई केवल आधिकारिक बयान में न सिमटे। यही कारण है कि आज वायरल वीडियो, लाइव फ़ीड, स्वतंत्र क्लिप और आम लोगों की रिकॉर्डिंगें लोकतांत्रिक सूचना-तंत्र का अभिन्न हिस्सा बन गई हैं। यह अच्छी बात है। लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि हर वीडियो अंतिम सत्य नहीं होता। हर दृश्य की संदर्भ-जांच जरूरी है। हर क्लिप के पीछे पूरा घटनाक्रम होता है। फिर भी इतना तय है कि जब नागरिक कैमरा उठाता है, तो वह पत्रकारिता को बचाने नहीं, उसकी अनुपस्थिति को भरने आता है।
इस पूरे संकट में सबसे दुखद पक्ष मीडिया का आत्ममुग्ध व्यवहार है। बहुत-से मंचों पर रिपोर्टिंग अब प्रश्न नहीं, प्रदर्शन है। पत्रकारिता अब सत्ता से दूरी नहीं, सत्ता के निकटता-सूचकांक से मापी जाने लगी है। किसे कितनी एक्सेस मिली, किसे किस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जगह मिली, किसके साथ कौन मुस्कुराया, किसे किस फ़ाइल तक पहुँच मिली—ये प्रश्न खबर के नहीं, पेशे के पतन के हैं। जहाँ पत्रकार का काम सच की खोज है, वहाँ वह अब कई जगह सच की साज-सज्जा में लग गया है।
जंतर-मंतर की घटना ने यह भी दिखा दिया कि जनता अब केवल खबर नहीं चाहती, प्रमाण चाहती है। वह केवल बयान नहीं सुनना चाहती, दृश्य देखना चाहती है। और जब दृश्य सत्ता की कथा से मेल नहीं खाते, तो वह विकल्प तलाशती है। यही कारण है कि मीडिया का एकाधिकार ढह रहा है। पहले सूचना के द्वार पर चैनल पहरा देते थे; अब जनता के पास अपने द्वार हैं। पहले खबर स्टूडियो से निकलती थी; अब सड़क से निकलती है। पहले पत्रकार तय करता था कि जनता को क्या जानना है; अब जनता तय करती है कि पत्रकार ने क्या छिपाया है।
यह परिवर्तन पीढ़ीगत भी है। “जेन जी” को मोबाइल वाली, रील बनाने वाली, अधीर, अनुभवहीन कहकर खारिज किया गया। लेकिन उसी पीढ़ी ने बहुत कम समय में पत्रकारिता की सबसे महत्वपूर्ण शर्त—संदेह—को अपना लिया है। उसने किसी चैनल को आँख मूँदकर भरोसा नहीं दिया। उसने किसी संपादक से अनुमति नहीं माँगी। उसने किसी संस्थान की वैधता को जन्मसिद्ध अधिकार नहीं माना। उसने कहा—हम अपनी कहानी खुद दर्ज करेंगे। और यही आधुनिक लोकतंत्र का नया व्याकरण है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर नागरिक पत्रकार बन जाए या हर मोबाइल वीडियो अख़बार बन जाए। इसका अर्थ सिर्फ़ यह है कि अब सत्य पर एकाधिकार नहीं चल सकता। अब पत्रकारिता को अपनी विश्वसनीयता फिर से अर्जित करनी होगी। उसे मालिकों से, सत्ता से, प्रायोजकों से और अपने आराम-क्षेत्र से बाहर निकलना होगा। उसे फिर से सड़क पर जाना होगा। उसे फिर से असुविधाजनक होना होगा। उसे फिर से सत्ता से डरना नहीं, सत्ता से सवाल करना होगा। उसे फिर से यह स्वीकार करना होगा कि जनता को बेवकूफ़ समझना सबसे बड़ा पेशागत अपराध है।
जंतर-मंतर ने पत्रकारिता का पोस्टमार्टम किया है, और नतीजा साफ़ है। बीमारी किसी एक चैनल की नहीं, पूरी संस्कृति की है। बीमारी टीआरपी की है, बीमारी विज्ञापन-निर्भरता की है, बीमारी नियंत्रण की है, बीमारी आत्म-सम्मान के बजाय आत्म-सुरक्षा की है। और इलाज भी उतना ही स्पष्ट है—सवाल पूछने की आदत, तथ्य-जाँच का अनुशासन, सत्ता से दूरी, और जनता से निकटता।
अब यह बात फिर से दोहरानी होगी: पत्रकारिता कैमरे से नहीं, रीढ़ से चलती है। कैमरा केवल उपकरण है; निर्णय मन करता है। यदि मन डर से भरा हो, तो कैमरा भी झुक जाता है। यदि मन स्वतंत्र हो, तो मोबाइल भी इतिहास दर्ज कर देता है।
जेन जी ने हमें हमारी औकात नहीं, हमारी जिम्मेदारी याद दिलाई है। उसने बताया कि पत्रकारिता किसी लोगो की कैदी नहीं। वह किसी स्टूडियो की संपत्ति नहीं। वह किसी संस्थान की मोहताज नहीं। वह सच के साथ खड़े होने की क्षमता है।
और जब एक पीढ़ी यह कह दे कि अब हम स्वयं देखेंगे, स्वयं रिकॉर्ड करेंगे, स्वयं समझेंगे—तब पुरानी पत्रकारिता के पास दो ही रास्ते बचते हैं: या तो सुधर जाओ, या इतिहास की टिप्पणी बन जाओ।
"जंतर-मंतर ने आंदोलन नहीं, पत्रकारिता की परीक्षा ली थी—और इस बार परीक्षा-पत्र नागरिकों के हाथ में था।"
