नामपट्टी उतारना, जवाबदेही उतारना है

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


नामपट्टी उतारना, जवाबदेही उतारना है

लोकतंत्र में वर्दी अधिकार देती है, लेकिन पहचान उस अधिकार को वैधता और सीमाएँ देती है। भारतीय संविधान शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति की रक्षा करता है, साथ ही सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर कुछ reasonable restrictions की अनुमति भी देता है; पर संविधान कहीं भी राज्य को यह छूट नहीं देता कि वह जवाबदेही से बचने के लिए अपनी पहचान मिटा दे। उलटे, नए आपराधिक कानून BNSS की धारा 36 कहती है कि हर पुलिस अधिकारी, गिरफ्तारी करते समय, अपनी “accurate, visible and clear identification” पहने ताकि पहचान आसान हो सके। सुप्रीम कोर्ट के 'D.K. Basu' निर्देश भी यही दोहराते हैं कि गिरफ्तारी और पूछताछ से जुड़े पुलिसकर्मी स्पष्ट नामपट्ट और पदनाम के साथ पहचाने जा सकें।

इसलिए सार्वजनिक विरोध, भीड़-नियंत्रण या गिरफ्तारी के समय नामपट्टी हटाना कोई “प्रशासनिक सुविधा” नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्कृति के खिलाफ़ एक खतरनाक ढलान है। संविधान का अनुच्छेद 33 संसद को यह शक्ति देता है कि वह कानून बनाकर armed forces या public order forces के अधिकारों की सीमा तय करे, लेकिन यह शक्ति भी "क़ानून के माध्यम" से है, सुविधा या मनमानी से नहीं। यानी राज्य की ताकत बढ़ सकती है, पर उसकी जवाबदेही घट नहीं सकती।

यही इस बहस का सबसे अहम नैतिक बिंदु है। नामपट्टी सिर्फ़ धातु का टुकड़ा नहीं होती; वह जनता को यह बताती है कि सामने खड़ा व्यक्ति कोई अज्ञात दहशत नहीं, बल्कि कानून के अधीन एक पहचाना हुआ अधिकारी है। जब नाम मिटता है, तो जवाबदेही धुँधली होती है। जब जवाबदेही धुँधली होती है, तो बल प्रयोग का दुरुपयोग आसान हो जाता है। और जब दुरुपयोग आसान हो जाता है, तो राज्य अपनी नैतिक श्रेष्ठता खोने लगता है। यह खतरा किसी एक घटना का नहीं, शासन की एक संस्कृति का है—जहाँ सत्ता विरोध को सुनने के बजाय उसे डराने, और प्रश्न को जवाब देने के बजाय उसे दबाने लगती है।

पुलिस और अर्धसैनिक बल, दोनों राज्य की शक्ति हैं; लेकिन लोकतंत्र में शक्ति तभी स्वीकार्य है जब वह पहचानी जा सके, परखी जा सके और चुनौती दी जा सके। यदि कोई अधिकारी भीड़ नियंत्रण में लगे, तो उसका चेहरा छिपा होना नागरिक के भरोसे पर चोट है। यदि कोई बल कानून-व्यवस्था संभालते हुए पहचान से बचने लगे, तो वह व्यवस्था नहीं, भय का प्रशासन बन जाता है। यह कहने के लिए किसी अदालत के अंतिम निष्कर्ष का इंतज़ार नहीं करना चाहिए कि ऐसी प्रथा संविधान की भावना के विरुद्ध है; क्योंकि संविधान की आत्मा सत्ता को छिपने नहीं, दिखाई देने की मांग करती है।

यह मामला पुलिस-विरोध का नहीं, नियम-विरोधी अनामता का है। जो अधिकारी कानून लागू करता है, उसे जनता के सामने पहचाना जा सकना चाहिए। जो राज्य प्रदर्शनकारी से उसका नाम, पता, पहचान, और जवाबदेही माँगता है, उसे स्वयं भी उसी मानक पर खड़ा होना होगा। वरना लोकतंत्र का सबसे खराब रूप सामने आता है—एक ऐसा राज्य, जो नागरिक से अनुशासन माँगता है, लेकिन अपने हाथों को नामहीन रखना चाहता है।

"वर्दी का सम्मान पहचान से बढ़ता है; नाम छिपाकर नहीं, जवाबदेही दिखाकर।"