पेपर लीक, राजनीति और युवाओं का भविष्य: बयानबाज़ी से आगे निकलकर जवाबदेही का समय
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
पेपर लीक, राजनीति और युवाओं का भविष्य: बयानबाज़ी से आगे निकलकर जवाबदेही का समयभारत का छात्र-समाज इस समय केवल परीक्षा की अनियमितताओं से नहीं, बल्कि विश्वास के गहरे संकट से गुजर रहा है। पेपर लीक, भर्ती में अनिश्चितता, परीक्षा-व्यवस्था पर संदेह और युवाओं के बढ़ते असंतोष ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या शिक्षा अब भी समान अवसर का माध्यम है, या वह भी सत्ता, प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ती जा रही है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्ष के नेता राहुल गांधी—दोनों के बयान इस संकट की दो अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हैं। लेकिन देश को आज व्याख्या से अधिक समाधान चाहिए।
प्रधानमंत्री ने पेपर लीक के दोषियों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने, त्वरित और कठोर सज़ा देने तथा छात्रों के हितों की रक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने की बात कही है। यह अपने-आप में स्वीकार है कि समस्या गंभीर है और केवल बयान से नहीं सुलझेगी। युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को दंडित करने की घोषणा एक आवश्यक राजनीतिक संदेश है। परंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि यह संदेश महज़ संकट-प्रबंधन बनकर न रह जाए। यदि वर्षों से बार-बार परीक्षा-पत्र लीक होते रहे हैं, यदि छात्र सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं, यदि परिवारों की बचत और बच्चों के सपने एक अविश्वसनीय तंत्र के हाथों क्षत-विक्षत हुए हैं, तो केवल अदालतों की गति बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। सवाल यह है कि व्यवस्था की छिद्रता को रोका कैसे जाएगा, और जवाबदेही की जड़ तक पहुँचा कैसे जाएगा?
दूसरी ओर, राहुल गांधी का आरोप है कि युवाओं के भविष्य को सबसे अधिक क्षति स्वयं मोदी शासन ने पहुँचाई है; शिक्षा-तंत्र के “कब्ज़े” और “विनाश” को बढ़ावा दिया गया तथा जिम्मेदार लोगों को संरक्षण मिला। यह आरोप राजनीतिक रूप से तीखा है, और विपक्ष की सामान्य शैली के अनुरूप भी। लेकिन इसके भीतर एक असुविधाजनक सच छिपा है: छात्रों की पीड़ा केवल किसी एक परीक्षा या किसी एक घटना तक सीमित नहीं है। वह उस व्यापक अविश्वास का हिस्सा है जो नागरिकों को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि उनकी मेहनत का फल क्या सचमुच सुरक्षित है। विपक्ष यदि यह कहता है कि शिक्षा-तंत्र बर्बाद हुआ है, तो सत्ता को इसे केवल राजनीतिक हमला मानकर टालना नहीं चाहिए; उसे ठोस तथ्यों, सुधारों और पारदर्शी कार्रवाई से जवाब देना चाहिए।
असल संकट यही है कि शिक्षा, जो संविधान की समता और अवसर की भावना का आधार है, आज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की भाषा में फँस गई है। सरकार कहती है—कठोर सज़ा होगी। विपक्ष कहता है—विनाश के लिए सरकार जिम्मेदार है। छात्र कह रहे हैं—हमारी मेहनत का क्या होगा? यही वह प्रश्न है जिसे संसद, अदालत, कार्यपालिका और सार्वजनिक विमर्श—सभी को एक साथ सुनना चाहिए। क्योंकि शिक्षा-व्यवस्था पर भरोसा टूटे तो वह केवल एक मंत्रालय की विफलता नहीं रहती; वह सामाजिक न्याय की बुनियाद को कमजोर करती है।
फास्ट-ट्रैक अदालतें, कठोर दंड और प्रशासनिक सख़्ती तभी सार्थक होंगी जब उनके साथ परीक्षा-प्रक्रिया की सुरक्षा, प्रश्नपत्र लीक की तकनीकी रोकथाम, एजेंसियों की पारदर्शिता, दोषी तंत्र की पहचान और भविष्य में ऐसी विफलता न दोहराने की संस्थागत गारंटी भी हो। दंड के बिना न्याय अधूरा है, लेकिन केवल दंड भी समाधान नहीं। यदि परीक्षा-प्रणाली फिर भी असुरक्षित रहे, तो हर साल नया संकट खड़ा होगा और हर बार युवाओं से सब्र की अपेक्षा की जाएगी।
राहुल गांधी की मांगें—शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा, छात्रों से माफ़ी, और हिंसा करने वालों पर कार्रवाई—राजनीतिक रूप से कठोर हैं, लेकिन सार्वजनिक नाराज़गी का हिस्सा भी हैं। सवाल यह नहीं कि इस्तीफ़ा किसी दल के लिए कितना सुविधाजनक है; सवाल यह है कि क्या जिम्मेदारी तय होनी चाहिए या नहीं। लोकतंत्र में पद केवल अधिकार नहीं देता, उत्तरदायित्व भी देता है। यदि शिक्षा-व्यवस्था का संकट लगातार गहराता गया है, तो जवाबदेही से बचना और भी असहनीय हो जाता है।
छात्रों की माँगें, दरअसल, बहुत मूलभूत हैं—निष्पक्ष परीक्षा, सुरक्षित भर्ती, उनके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार और भविष्य के साथ खिलवाड़ पर रोक। ये किसी पार्टी की माँग नहीं; ये राष्ट्र की माँग हैं। यही कारण है कि इस बहस को केवल मोदी बनाम राहुल की राजनीतिक टक्कर में सीमित करना देश के साथ अन्याय होगा। यह संघर्ष सत्ता और विपक्ष से बड़ा है। यह उस पीढ़ी का प्रश्न है जो भारत की रीढ़ बनने जा रही है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार अपनी घोषणा को केवल बयान न रहने दे; विपक्ष केवल आरोप न लगाए; और संस्थाएँ—विशेषकर शिक्षा-प्रणाली से जुड़ी एजेंसियाँ—अपनी विश्वसनीयता बहाल करें। फास्ट-ट्रैक कोर्ट उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन उससे पहले या साथ-साथ लीक की जड़ों पर प्रहार, भर्ती में पारदर्शिता, परीक्षा-सुरक्षा का आधुनिकीकरण और जवाबदेही की कठोर संस्कृति भी जरूरी है। जो व्यवस्था केवल बाद में दंड देती है, वह पहले ही विफल हो चुकी होती है; जो व्यवस्था पहले से रोकती है, वही सचमुच सक्षम कहलाती है।
भारत के छात्र किसी दया के पात्र नहीं हैं। वे अधिकार के पात्र हैं। और लोकतंत्र का सबसे बड़ा कर्तव्य यह है कि वह अपने युवाओं के अधिकारों को सुरक्षित रखे। राजनीतिक बयानबाज़ी अपने स्थान पर रहे, पर देश की प्राथमिकता स्पष्ट होनी चाहिए: परीक्षा निष्पक्ष हो, भविष्य सुरक्षित हो, और राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी शब्दों से नहीं, कर्मों से सिद्ध हो।
"जब सरकार सज़ा की बात करे और विपक्ष जवाबदेही की, तब देश को दोनों से ऊपर उठकर केवल एक सवाल पूछना चाहिए—छात्रों का भविष्य आखिर सुरक्षित कब होगा?"
