छात्रों की पुकार, संस्थाओं की परीक्षा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


छात्रों की पुकार, संस्थाओं की परीक्षा

भारत में छात्र-आंदोलन कोई साधारण दृश्य नहीं है। यह वह क्षण है जब किताबों के पन्नों से निकली पीड़ा सड़क पर उतरती है, जब परिवारों की जमा-पूँजी, बच्चों की मेहनत और वर्षों की तैयारी एक ही प्रश्न में सिमट आती है—आख़िर हमारी परीक्षा कौन लेगा: व्यवस्था या भविष्य? प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक का संकट इसी पीढ़ीगत चोट का नाम है। यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास की क्षति है। जब मेहनत का परिणाम संदेह के घेरे में आ जाए, तब छात्र का आक्रोश स्वाभाविक है; और उस आक्रोश को सुनना लोकतंत्र की पहली जिम्मेदारी।

जंतर-मंतर से संसद तक उठ यह आवाज़ अब किसी एक संगठन, किसी एक नेता या किसी एक दिन के प्रदर्शन तक सीमित नहीं रही। देश के कई हिस्सों में विरोध फैल रहा है। जले हुए सपनों की यह आग इस बात का संकेत है कि समस्या परीक्षा-पत्र के लीक होने तक सीमित नहीं, बल्कि उस पूरी परीक्षा-व्यवस्था में है जिसे बार-बार “सुधार” का आश्वासन दिया गया, पर उसके भीतर की छिद्रता जस की तस रही। लाखों युवा यह पूछ रहे हैं कि बार-बार वही गलती क्यों दोहराई जाती है; हर बार वही वादा क्यों किया जाता है; और हर बार नुकसान केवल छात्र क्यों उठाते हैं।

सरकार की पहली जिम्मेदारी थी कि वह इस संकट को समझती, स्वीकार करती और पारदर्शी जांच के साथ जवाब देती। लेकिन जब सत्ता का पहला उत्तर भी राजनीतिक आरोप बन जाए—जब प्रश्नपत्र लीक के सवाल पर बहस की जगह विपक्ष पर निशाना साधा जाए—तब अविश्वास और गहरा होता है। छात्र यह नहीं पूछ रहे कि कौन किस दल से है; वे यह पूछ रहे हैं कि परीक्षा निष्पक्ष क्यों नहीं है। उनकी माँग बहुत सीधी है: सुरक्षित भर्ती, निष्पक्ष परीक्षा, जवाबदेही और भविष्य के साथ खिलवाड़ बंद हो। यह कोई असंभव माँग नहीं। यह तो एक सभ्य राज्य का न्यूनतम नैतिक वादा है।


इस आंदोलन को समझने के लिए उसकी राजनीति से पहले उसकी पीड़ा को देखना होगा। यह उन परिवारों का प्रतिरोध है जिन्होंने बच्चों की पढ़ाई के लिए घर-ज़मीन तक दाँव पर लगा दी; उन माताओं का प्रतिरोध है जिन्होंने अपने बच्चों की आँखों में सपने बचाए रखे; उन छात्रों का प्रतिरोध है जिन्होंने दिन-रात की मेहनत को जीवन का एकमात्र रास्ता माना। जब उनकी मेहनत के सामने पेपर लीक, भ्रष्टाचार, टालमटोल और लाचारी खड़ी हो जाती है, तब प्रदर्शन कोई विकल्प नहीं, मजबूरी बन जाता है।


इसी बीच लोकतंत्र की दूसरी बड़ी संस्था—न्यायपालिका—भी प्रश्नों के घेरे में आई। सार्वजनिक जीवन में न्यायालय केवल आदेशों से नहीं, अपनी संवेदनशीलता से भी पहचाना जाता है। जब देश के युवा अपने अधिकारों के लिए अदालत की ओर देखते हैं, तो वे केवल कानूनी राहत नहीं, नैतिक सहारा भी चाहते हैं। यह सही है कि न्यायालय की अपनी प्रक्रिया होती है; हर याचिका पर तत्काल सुनवाई संभव नहीं होती। लेकिन जब सार्वजनिक बहस में अदालत की भाषा असंवेदनशील प्रतीत होने लगे, तब यह केवल एक वाक्य का विवाद नहीं रह जाता। वह उस भरोसे का प्रश्न बन जाता है, जिस पर न्यायिक व्यवस्था टिकी है।


यह भी सच है कि किसी भी जनांदोलन का नैतिक मूल्य इस बात से तय होता है कि वह अपनी पीड़ा को कितनी गरिमा से रखता है। छात्र-आंदोलन का बल उसकी शुचिता में है, उसकी अनुशासनशीलता में है। यदि आंदोलन के भीतर राजनीतिक अवसरवाद प्रवेश करे, तो मूल प्रश्न धुँधला पड़ जाता है। लेकिन इसका उलटा भी उतना ही खतरनाक है: यदि सत्ता हर आंदोलन को राजनीतिक षड्यंत्र कहकर नकार दे, तो असली सवाल ही गायब हो जाता है। लोकतंत्र का सार यही है कि सरकार विरोध को सुने, और विरोध समाधान की भाषा में बदले।


आज भारत की तस्वीर यही है—एक तरफ़ युवा हैं, जो यह मानते हैं कि उनका भविष्य लूटा जा रहा है; दूसरी तरफ़ एक ऐसी व्यवस्था है, जो जवाब देने की बजाय थकाने की रणनीति अपनाती दिखती है। संसद में बहस टलती है, सड़क पर प्रदर्शन बढ़ता है, अदालतों में संवेदना पर बहस होती है, और मीडिया में सत्य से अधिक शोर बिकने लगता है। यह केवल छात्र-आंदोलन नहीं; यह संस्थागत संकट का दर्पण है।


इसीलिए इस आंदोलन की तुलना इतिहास के बड़े जनप्रतिरोधों से की जा सकती है, लेकिन उसकी अपनी विशिष्टता भी है। यह कोई सत्ता-परिवर्तन का सीधा आह्वान नहीं, यह व्यवस्था-परिवर्तन की नैतिक मांग है। यह युवाओं की वह पीढ़ी है जिसने महामारी देखी, अनिश्चितता देखी, परीक्षा रद्द होते देखी, भर्ती लटकते देखी, और अब यह तय कर लिया है कि वह केवल “सब्र” के उपदेश से संतुष्ट नहीं होगी। वह जवाब चाहती है। वह सम्मान चाहती है। वह ऐसा भविष्य चाहती है जिसमें मेहनत का अर्थ बचा रहे।


यहाँ मीडिया की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। पत्रकारिता का काम सत्ता की प्रतिध्वनि बनना नहीं, जनपीड़ा को दर्ज करना है। यदि मीडिया छात्रों की पीड़ा को राजनीतिक रंग में बदल देता है, यदि वह मुद्दे की गहराई की जगह दृश्यता और सनसनी पर टिक जाता है, तो समाज और अधिक भ्रमित होगा। आंदोलनकारियों की संख्या से अधिक जरूरी उनकी मांगों की वैधता है। और इस प्रश्न पर मीडिया को स्पष्ट होना चाहिए: क्या परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता टूट रही है? क्या छात्रों के जीवन के साथ अन्याय हो रहा है? यदि हाँ, तो यह खबर है, शोर नहीं।


राहुल गांधी और विपक्ष की सक्रियता ने इस आंदोलन को राजनीतिक दृश्यता अवश्य दी है, पर यही दृश्यता कई बार सरकारों को जवाबदेह बनाती है। लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व केवल भाषण देना नहीं, संस्थागत असफलताओं को उजागर करना भी है। फिर भी विपक्ष को भी याद रखना होगा कि छात्र किसी दल की पूँजी नहीं हैं। उनका दर्द चुनावी सामग्री नहीं, राष्ट्रीय चिंता है। यदि राजनीतिक दल इस संघर्ष को अपनी-अपनी जीत-हार में बदल देंगे, तो छात्र फिर बीच में छूट जाएंगे।


वास्तविक प्रश्न यही है कि क्या भारत अपनी अगली पीढ़ी को न्याय दे पाएगा? क्या परीक्षा प्रणाली इतनी पारदर्शी हो सकती है कि छात्र को हर बार नए सिरे से शक न करना पड़े? क्या भर्ती प्रक्रिया इतनी सुरक्षित बन सकती है कि मेहनत और प्रतिभा को दलालों, लीक और संरक्षण की दीवारों से न टकराना पड़े? क्या संसद इस मुद्दे को राष्ट्रीय प्राथमिकता मानेगी? क्या न्यायपालिका इस पर संवेदनशील, संतुलित और भरोसा जगाने वाली उपस्थिति बनाए रखेगी? और क्या सरकार यह स्वीकार करेगी कि बार-बार की विफलता अब “दुर्भाग्य” नहीं, संरचनात्मक समस्या है?


यह आंदोलन केवल छात्रों का नहीं, पूरे समाज का है। यह उन अभिभावकों का भी है जिन्होंने बच्चों की पढ़ाई के लिए अपनी भौतिक सुरक्षा खो दी। यह उन शिक्षकों का भी है जो चाहते हैं कि ज्ञान का रास्ता निष्पक्ष रहे। यह उन नागरिकों का भी है जो समझते हैं कि यदि छात्रों के भविष्य पर हमला होगा, तो राष्ट्र के भविष्य पर भी हमला होगा। यह उस भारत का सवाल है जो अपने युवाओं से कहता है—पढ़ो, बढ़ो, आगे बढ़ो—लेकिन यदि वही भारत उनकी मेहनत की रक्षा न कर सके, तो उसके शब्द खोखले साबित होंगे।


इसीलिए आज आवश्यकता किसी एक नेता को बचाने या गिराने की नहीं है। आवश्यकता है उस नैतिक साहस की, जिसमें सरकार अपनी विफलता स्वीकार करे, न्यायपालिका संवेदनशीलता दिखाए, मीडिया प्रश्नों को सही रूप में रखे, और समाज अपने बच्चों की आवाज़ को अपमान नहीं, चेतावनी समझे। छात्र सड़क पर इसलिए नहीं हैं कि वे व्यवस्था से नफरत करते हैं; वे इसलिए हैं क्योंकि वे अभी भी व्यवस्था से अपेक्षा रखते हैं। और यही उनकी सबसे बड़ी देशभक्ति है।


यह आंदोलन हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र का मूल्य केवल चुनावों से नहीं, संस्थाओं की सुनवाई से तय होता है। जब छात्र न्याय माँगें और जवाब में केवल संदेह, टालमटोल या दमन मिले, तब संकट शिक्षा का नहीं, राज्य की संवेदनशीलता का होता है। भारत को अपने युवाओं से डरना नहीं चाहिए; उनके प्रश्नों को सुनना चाहिए। क्योंकि वही प्रश्न कल इस राष्ट्र की अदालत, संसद, प्रयोगशाला, अस्पताल और प्रशासन को चलाएँगे।


"जिस देश में छात्र अपने भविष्य के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर हों, वहाँ सबसे बड़ा मुद्दा परीक्षा का नहीं, व्यवस्था की परीक्षा का होता है।"