लोकतंत्र की तस्वीरें, छात्रों का प्रश्न और सत्ता की जवाबदेही
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
लोकतंत्र की तस्वीरें, छात्रों का प्रश्न और सत्ता की जवाबदेही
भारत आज केवल एक राजनीतिक बहस के दौर से नहीं गुजर रहा, वह अपनी लोकतांत्रिक आत्मा की परीक्षा दे रहा है। संसद, सड़क, अदालत, मीडिया और विपक्ष—सभी अपनी-अपनी भूमिकाओं में हैं, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह व्यवस्था अपने नागरिकों, विशेषकर युवाओं, छात्रों और वंचितों की वास्तविक पीड़ा सुनने में सक्षम रह गई है या नहीं। हाल के दिनों में जो दृश्य सामने आए—राहुल गांधी की हिरासत, प्रियंका गांधी को पुलिस बस में बैठाए जाने की तस्वीरें, सोनिया गांधी का देर रात पुलिस स्टेशन के बाहर खड़ा रहना—वे केवल राजनीतिक घटनाएँ नहीं थीं। वे उस समय की प्रतीकात्मक छवियाँ थीं, जिसमें सत्ता और असहमति के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया है।
राजनीति में तस्वीरें अक्सर बहसों से अधिक असर छोड़ती हैं। आपातकाल की स्मृति में जॉर्ज फर्नांडीस की हथकड़ी लगी तस्वीर आज भी क्यों याद की जाती है? इसलिए कि तस्वीरें केवल घटना नहीं दिखातीं, वे सत्ता की प्रकृति भी उजागर करती हैं। इसी तरह, जब देश के छात्र अपनी परीक्षा-व्यवस्था की खामियों, पेपर लीक, भर्ती-घोटालों और शिक्षा की गिरती विश्वसनीयता के खिलाफ़ सड़क पर उतरते हैं, तब उन पर दमन की कार्रवाई केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह जाती। वह लोकतंत्र के चरित्र का प्रश्न बन जाती है।
20 जुलाई को जंतर-मंतर पर जो आंदोलन खड़ा हुआ, वह किसी क्षणिक आक्रोश का परिणाम नहीं था। वह उस गहरे असंतोष का विस्फोट था जो वर्षों से भारतीय शिक्षा व्यवस्था के भीतर जमा हो रहा है। परीक्षा-पत्र लीक होते हैं, प्रतिभा …परीक्षा-पत्र लीक होते हैं, प्रतिभाशाली छात्र वर्षों की तैयारी के बाद भी अनिश्चितता में जीते हैं, परिवार अपनी जमा-पूँजी कोचिंग और शिक्षा पर खर्च कर देते हैं, और फिर एक सूचना आती है—"परीक्षा रद्द"। यह केवल प्रशासनिक भूल नहीं होती; यह लाखों परिवारों की आशाओं पर प्रहार होता है। इसलिए इस आंदोलन को केवल किसी संगठन, किसी दल या किसी नेता की रैली मानना वास्तविकता से आँखें मूँदना होगा। यह उस पीढ़ी की बेचैनी है जिसे बचपन से यह विश्वास दिलाया गया कि मेहनत सफलता की कुंजी है, लेकिन जिसने बार-बार व्यवस्था को उसी मेहनत का मूल्य घटाते देखा।
यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें विपक्ष की भूमिका भी बदलती दिखाई देती है। लोकतंत्र में विपक्ष का संवैधानिक दायित्व केवल चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ को संसद और सड़क—दोनों जगह उठाना भी है। यदि संसद में किसी राष्ट्रीय प्रश्न पर बहस की माँग बार-बार ठुकराई जाए, तो विपक्ष के सामने स्वाभाविक रूप से दो विकल्प बचते हैं—या तो वह औपचारिक विरोध दर्ज कराकर चुप बैठ जाए, या फिर जनता के बीच जाकर उस मुद्दे को जीवित रखे। हाल के घटनाक्रम में विपक्ष ने दूसरा रास्ता चुना।
राहुल गांधी का प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना देना इसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था। इसे केवल राजनीतिक प्रदर्शन कहकर खारिज कर देना आसान है, लेकिन इससे जुड़ा मूल प्रश्न अधिक गंभीर है—क्या संसद वह स्थान बनी हुई है जहाँ शिक्षा, युवाओं और राष्ट्रीय भविष्य जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा हो सकती है? यदि लोकतांत्रिक संस्थाएँ संवाद के अपने स्वाभाविक रास्ते संकुचित कर दें, तो सड़क लोकतंत्र का वैकल्पिक मंच बन जाती है। इतिहास गवाह है कि भारत के अनेक बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन संसद से पहले सड़कों पर जन्मे थे।
यहाँ सरकार का पक्ष भी समझना आवश्यक है। सरकार का कहना है कि विपक्ष छात्रों के आंदोलन का राजनीतिक उपयोग कर रहा है। लोकतंत्र में यह आरोप नया नहीं है। लगभग हर बड़े जनांदोलन पर सत्ता ने यही प्रश्न उठाया है कि उसके पीछे कौन-सी राजनीतिक शक्ति है। लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि यदि छात्रों की मूल माँगें न्यायसंगत हैं—निष्पक्ष परीक्षा, पारदर्शी भर्ती, पेपर लीक पर कठोर कार्रवाई और शिक्षा-व्यवस्था में सुधार—तो क्या उन माँगों पर गंभीर बहस नहीं होनी चाहिए, चाहे उन्हें उठाने वाला कोई भी हो?
दरअसल, किसी भी जनांदोलन की विश्वसनीयता का निर्धारण उसके समर्थकों से अधिक उसके मुद्दों से होता है। यदि मुद्दा वास्तविक है, तो उसे केवल इसलिए नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि विपक्ष भी उसका समर्थन कर रहा है। उसी प्रकार विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह छात्रों की पीड़ा को केवल चुनावी अवसर में परिवर्तित न करे। जनांदोलन का नैतिक बल तभी टिकता है जब उसके केंद्र में जनता का प्रश्न बना रहे, न कि केवल राजनीतिक लाभ।
इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पक्ष लोकतांत्रिक प्रतीकों का है। राहुल गांधी की चोटिल तस्वीरें, प्रियंका गांधी की हिरासत, सोनिया गांधी की उपस्थिति—इन सबने राजनीतिक संदेश को दृश्य रूप दिया। आधुनिक राजनीति में दृश्य अक्सर भाषणों से अधिक प्रभावशाली होते हैं। लेकिन लोकतंत्र का स्वास्थ्य इस बात से तय नहीं होता कि किसकी तस्वीर अधिक वायरल हुई; वह इस बात से तय होता है कि जिन कारणों से वे तस्वीरें बनीं, उनका समाधान हुआ या नहीं। यदि तस्वीरें रह जाएँ और समस्याएँ जस की तस बनी रहें, तो राजनीति केवल प्रतीकों का उत्सव बनकर रह जाएगी।
आज भारत की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि राजनीति कहीं प्रतीकों में सिमटती जा रही है और नीति पीछे छूटती जा रही है। शिक्षा का प्रश्न, युवाओं का भविष्य, रोजगार की गुणवत्ता, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और सामाजिक समानता—ये वे प्रश्न हैं जिन पर राष्ट्रीय सहमति बननी चाहिए थी। दुर्भाग्य से यही प्रश्न अक्सर सबसे अधिक राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार हो जाते हैं।
संवैधानिक दृष्टि से देखें तो यह आंदोलन हमें अनुच्छेद 19 की याद दिलाता है, जो नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है। साथ ही यह अनुच्छेद 14 के समानता के सिद्धांत और अनुच्छेद 21 के गरिमामय जीवन के अधिकार से भी जुड़ता है। निष्पक्ष परीक्षा और समान अवसर केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की बुनियादी शर्त हैं। यदि प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता ही संदिग्ध हो जाए, तो संविधान द्वारा प्रदत्त अवसर की समानता का आदर्श भी कमजोर पड़ने लगता है।
यह संघर्ष केवल छात्रों का नहीं है। यह उन माता-पिता का संघर्ष भी है जिन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए अपनी बचत दाँव पर लगा दी। यह उन शिक्षकों का संघर्ष भी है जो चाहते हैं कि प्रतिभा का सम्मान हो। यह उन लाखों युवाओं का संघर्ष है जो मानते हैं कि लोकतंत्र का अर्थ केवल मतदान नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण अवसर भी है।
आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यदि शिक्षा व्यवस्था में जनता का विश्वास बहाल नहीं हुआ, यदि पेपर लीक और भर्ती अनियमितताओं पर कठोर एवं पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, यदि संसद इन प्रश्नों पर गंभीर विमर्श से बचती रही, और यदि राजनीतिक दल इस संकट को केवल एक-दूसरे पर आरोप लगाने का माध्यम बनाते रहे, तो इसका सबसे बड़ा मूल्य आने वाली पीढ़ियाँ चुकाएँगी।
लोकतंत्र की शक्ति इस बात में नहीं है कि वह विरोध को कितना नियंत्रित कर सकता है; उसकी शक्ति इस बात में है कि वह विरोध को सुनकर स्वयं को कितना सुधार सकता है। सरकारें बहुमत से चलती हैं, लेकिन लोकतंत्र विश्वास से चलता है। और विश्वास तभी बनता है जब नागरिक यह महसूस करें कि उनकी आवाज़ सत्ता के गलियारों तक पहुँचती है, संसद में सुनी जाती है, न्यायपालिका में सम्मान पाती है और नीति में उसका प्रतिबिंब दिखाई देता है।
इसलिए आज प्रश्न किसी एक नेता, किसी एक दल या किसी एक आंदोलन का नहीं है। प्रश्न उस भारत का है जो अपने युवाओं से कहता है कि मेहनत करो, आगे बढ़ो, राष्ट्र निर्माण करो। यदि वही राष्ट्र उनकी मेहनत की रक्षा नहीं कर सके, तो वह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं होगी; वह लोकतांत्रिक नैतिकता की भी विफलता होगी।
यह समय राजनीतिक विजय का नहीं, लोकतांत्रिक आत्ममंथन का है। सत्ता को बहस से नहीं बचना चाहिए। विपक्ष को आंदोलन को समाधान तक पहुँचाने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। संसद को छात्रों के प्रश्न को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना चाहिए। न्यायपालिका को संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के साथ संवेदनशीलता का भी परिचय देना चाहिए। और समाज को यह समझना होगा कि जो युवा आज सड़क पर हैं, वही कल इस राष्ट्र की प्रशासनिक, वैज्ञानिक, चिकित्सकीय, न्यायिक और लोकतांत्रिक रीढ़ बनने वाले हैं।
"किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों और परीक्षा कक्षों में तय होता है; यदि वहाँ विश्वास टूटता है, तो लोकतंत्र की नींव भी दरकने लगती है।"
"जब छात्रों की आवाज़ संसद तक न पहुँचे और सड़क ही उनका सबसे बड़ा मंच बन जाए, तब संकट केवल शिक्षा का नहीं, लोकतंत्र की संवाद-क्षमता का होता है।"
