पश्चिम एशिया का नया संकट और भारत की कूटनीतिक परीक्षा
पश्चिम एशिया का नया संकट और भारत की कूटनीतिक परीक्षा
"शक्ति-संतुलन, ऊर्जा-सुरक्षा और बदलती विश्व-व्यवस्था के बीच एक वैश्विक विमर्श"
पश्चिम एशिया एक बार फिर उस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ क्षेत्रीय संघर्ष और वैश्विक राजनीति के बीच की रेखाएँ लगभग समाप्त होती दिखाई दे रही हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल दो देशों के बीच सैन्य टकराव नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा-भूगोल, वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय विधि-व्यवस्था की विश्वसनीयता की व्यापक परीक्षा भी है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य के इर्द-गिर्द बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ, खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति, ईरान की प्रतिरोध-नीति तथा इज़रायल की सुरक्षा रणनीति—इन सबने मिलकर ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित कर दी हैं जिनका प्रभाव पश्चिम एशिया की सीमाओं से बहुत आगे तक जाता है।
विश्व राजनीति के समकालीन परिदृश्य में पश्चिम एशिया केवल भूगोल नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-समीकरण का सबसे संवेदनशील केंद्र बन चुका है। यही वह क्षेत्र है जहाँ अमेरिका की सामरिक उपस्थिति, ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएँ, इज़रायल की सुरक्षा-चिंताएँ, खाड़ी देशों की ऊर्जा-राजनीति, रूस और चीन की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता तथा यूरोप की ऊर्जा-निर्भरता एक-दूसरे से टकराती हैं। परिणामस्वरूप यहाँ उत्पन्न प्रत्येक संकट वैश्विक वित्तीय बाज़ारों, समुद्री व्यापार, ऊर्जा कीमतों तथा बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रभावशीलता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील बिंदु है। विश्व के समुद्री मार्गों में यह केवल एक जलमार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा-आपूर्ति की जीवनरेखा है। विश्व के समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल और एलएनजी व्यापार का बड़ा भाग इसी मार्ग से होकर गुजरता है। यदि इस जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न होता है, तो उसका प्रभाव केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहता; बल्कि वैश्विक मुद्रास्फीति, समुद्री बीमा, आपूर्ति-श्रृंखलाओं, विनिर्माण लागत, खाद्य मूल्यों और वित्तीय बाज़ारों तक फैल जाता है। इसलिए होर्मुज़ की स्थिरता वस्तुतः वैश्विक आर्थिक स्थिरता का पर्याय बन चुकी है।
इसी संदर्भ में अमेरिका और ईरान के बीच हालिया घटनाक्रम अत्यंत गंभीर हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर युद्धविराम तथा पूर्व सहमत व्यवस्थाओं के उल्लंघन के आरोप लगा रहे हैं। समुद्री सुरक्षा, वाणिज्यिक जहाज़ों की आवाजाही तथा प्रतिबंधों की नीति को लेकर अविश्वास का वातावरण गहरा हुआ है। यह स्पष्ट संकेत है कि किसी भी अस्थायी युद्धविराम की सफलता केवल सैन्य संयम पर नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास और संस्थागत संवाद पर निर्भर करती है। जब विश्वास समाप्त होता है, तब युद्धविराम केवल अगली सैन्य कार्रवाई के बीच का अंतराल बनकर रह जाता है।
यह संकट अंतरराष्ट्रीय विधि की सीमाओं को भी उजागर करता है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर बल-प्रयोग को केवल सीमित परिस्थितियों में वैधता प्रदान करता है, जबकि समुद्री कानून सभी देशों को अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर सुरक्षित और निर्बाध आवागमन का अधिकार देता है। दूसरी ओर, प्रत्येक राष्ट्र अपनी सुरक्षा के अधिकार का भी दावा करता है। यही वह बिंदु है जहाँ अंतरराष्ट्रीय कानून और भू-राजनीतिक शक्ति-राजनीति के बीच तनाव उत्पन्न होता है। व्यवहारिक राजनीति में अक्सर वही व्याख्या प्रभावी होती है जिसके पीछे अधिक सामरिक शक्ति होती है। यह प्रवृत्ति नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था (Rules-Based International Order) की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
इस पूरे परिदृश्य में इज़रायल की भूमिका भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इज़रायल अपनी सुरक्षा-नीति को पूर्व-प्रतिरोध (Pre-emptive Defence) के सिद्धांत के आधार पर उचित ठहराता है, जबकि अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी सैन्य कार्रवाइयों की वैधता को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। दूसरी ओर, ईरान स्वयं को क्षेत्रीय प्रतिरोध (Axis of Resistance) का नेतृत्वकर्ता मानते हुए अपनी सुरक्षा रणनीति को वैध बताता है। परिणामस्वरूप पश्चिम एशिया में सुरक्षा की अवधारणा स्वयं संघर्ष का विषय बन चुकी है—जहाँ प्रत्येक पक्ष अपनी कार्रवाई को रक्षात्मक और विरोधी की कार्रवाई को आक्रामक घोषित करता है।
अमेरिका की दृष्टि से यह संघर्ष केवल ईरान तक सीमित नहीं है। यह उसकी व्यापक इंडो-पैसिफिक रणनीति, वैश्विक ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा, डॉलर-आधारित वित्तीय व्यवस्था, समुद्री वर्चस्व तथा अपने पारंपरिक सहयोगियों के प्रति सुरक्षा-प्रतिबद्धता का प्रश्न भी है। वहीं ईरान के लिए यह केवल सैन्य प्रतिरोध नहीं, बल्कि अपनी सामरिक स्वायत्तता, क्षेत्रीय प्रभाव और राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा का विषय है। इसलिए दोनों पक्षों के बीच अविश्वास का स्तर इतना गहरा हो चुका है कि केवल युद्धविराम स्थायी समाधान का आधार नहीं बन सकता।
इस पूरे संकट में भारत की स्थिति अत्यंत विशिष्ट और जटिल है। भारत अमेरिका के साथ व्यापक रणनीतिक साझेदारी विकसित कर चुका है; वहीं ईरान भारत की ऊर्जा-सुरक्षा, मध्य एशिया तक संपर्क, चाबहार बंदरगाह तथा अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का महत्त्वपूर्ण साझेदार है। इसके अतिरिक्त खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय नागरिक रहते और कार्य करते हैं, जिनकी सुरक्षा, प्रेषण (Remittances) तथा व्यापारिक हित भारत की विदेश नीति के केंद्रीय तत्व हैं। इसलिए भारत के लिए किसी एक पक्ष के साथ पूर्णतः खड़ा होना न तो व्यावहारिक है और न ही उसके दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के अनुकूल।
भारतीय विदेश नीति की वास्तविक शक्ति उसकी "रणनीतिक स्वायत्तता" (Strategic Autonomy) में निहित है। यही वह सिद्धांत है जिसने शीत युद्ध से लेकर वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व तक भारत को स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रदान की है। आज आवश्यकता है कि भारत इसी सिद्धांत को नए संदर्भों में और अधिक सक्रिय रूप से लागू करे। केवल संयम की अपील करना पर्याप्त नहीं होगा; भारत को बहुपक्षीय मंचों—संयुक्त राष्ट्र, जी-20, ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन और हिंद महासागर क्षेत्रीय व्यवस्थाओं—के माध्यम से संवाद, विश्वास-निर्माण तथा समुद्री सुरक्षा के लिए ठोस पहल करनी चाहिए।
यह अवसर भारत के लिए केवल नैतिक नेतृत्व का नहीं, बल्कि कूटनीतिक नेतृत्व का भी है। यदि भारत ऊर्जा-सुरक्षा, समुद्री संपर्क, मानवीय सहायता, संकट-प्रबंधन और क्षेत्रीय संवाद के बीच संतुलन स्थापित कर पाता है, तो वह स्वयं को एक उत्तरदायी वैश्विक शक्ति (Responsible Global Power) के रूप में और अधिक विश्वसनीय बना सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि भारत किसी सैन्य ध्रुव का हिस्सा बनने के बजाय "विश्वसनीय संवादकर्ता" (Credible Interlocutor) की भूमिका निभाए।
पश्चिम एशिया का वर्तमान संकट अंततः हमें यह स्मरण कराता है कि इक्कीसवीं सदी में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते; वे ऊर्जा बाज़ारों, समुद्री मार्गों, मुद्रा-व्यवस्थाओं, प्रौद्योगिकी, कूटनीति और वैश्विक जनमत के स्तर पर भी समानांतर रूप से संचालित होते हैं। किसी भी सैन्य विजय का वास्तविक मूल्य तभी है जब वह स्थायी राजनीतिक समाधान का मार्ग प्रशस्त करे। यदि शक्ति का प्रयोग संवाद का विकल्प बन जाता है, तो संघर्ष विराम केवल अगली लड़ाई की प्रस्तावना बनकर रह जाता है।
भारत के लिए यह समय प्रतिक्रियात्मक कूटनीति का नहीं, बल्कि दूरदर्शी रणनीतिक नेतृत्व का है। एक ऐसे विश्व में जहाँ शक्ति-संतुलन निरंतर बदल रहा है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रही हैं, भारत की सबसे बड़ी पूँजी उसकी विश्वसनीयता, संतुलित विदेश नीति और संवाद-आधारित दृष्टिकोण है। यदि नई दिल्ली इस संकट को केवल पश्चिम एशिया की समस्या न मानकर वैश्विक स्थिरता और राष्ट्रीय हितों की साझा चुनौती के रूप में देखती है, तो वह न केवल अपने रणनीतिक हितों की रक्षा कर सकेगी, बल्कि उभरती बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था में एक निर्णायक और उत्तरदायी शक्ति के रूप में भी अपनी भूमिका को सुदृढ़ कर सकेगी।
