होर्मुज़ की धमक और भारत की कूटनीतिक परीक्षा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


होर्मुज़ की धमक और भारत की कूटनीतिक परीक्षा

पश्चिम एशिया एक बार फिर उस चौराहे पर खड़ा है जहाँ हर सैन्य निर्णय, हर बयान और हर पलटवार केवल क्षेत्रीय नहीं, वैश्विक परिणाम पैदा करता है। 28 फ़रवरी 2026 के अमेरिकी-इज़राइली हमलों से शुरू हुए संघर्ष—जिसमें Reuters के अनुसार ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की मृत्यु हुई—के बाद जो नाज़ुक विराम बना था, वह अब फिर टूटता दिखाई दे रहा है। ताज़ा रिपोर्टों के मुताबिक़ अमेरिका और ईरान के बीच फिर से तेज़ सैन्य टकराव हुआ है; ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद करने का दावा किया, जबकि अमेरिकी सेंटकॉम ने कहा कि जलमार्ग खुला है। उसी तनाव के बीच ब्रेंट कच्चा तेल 3 प्रतिशत से अधिक चढ़ गया। यह केवल युद्ध का दृश्य नहीं, ऊर्जा-सुरक्षा का वैश्विक संकट है।

होर्मुज़ कोई साधारण समुद्री रास्ता नहीं है। EIA इसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल-परिवहन chokepoints में गिनता है। ऐसे जलडमरूमध्य पर किसी भी तरह की बाधा, धमकी या “बंदी” का दावा तुरंत बीमा, शिपिंग, आपूर्ति-श्रृंखला और मुद्रास्फीति को झकझोर देता है। इसलिए इस क्षेत्र में गोलियों की आवाज़ केवल खाड़ी तक सीमित नहीं रहती; उसका कंपन एशिया, यूरोप, अमेरिका और भारत—सभी की अर्थव्यवस्थाओं में सुनाई देता है।


क़ानूनी दृष्टि से भी यह संघर्ष केवल सैन्य प्रतिशोध का नहीं, वैधता के संकट का प्रश्न है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने 28 फ़रवरी 2026 की हिंसा के बाद स्पष्ट किया था कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर बल-प्रयोग को संकीर्ण और कठोर सीमा में रखता है। दूसरी ओर, ईरान ने संयुक्त राष्ट्र में अपने हमलों को self-defense बताने की कोशिश की। यही वह जगह है जहाँ “आत्मरक्षा” और “आक्रामकता” की परिभाषा प्रचार-युद्ध का औज़ार बन जाती है। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब शक्ति, तर्क और विधि—तीनों को सोशल मीडिया के नारों में घोल दिया जाए।


यह भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी हिंसा का असर केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है। Reuters के अनुसार ताज़ा झड़पों में ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया, और टैंकरों व जहाज़ों की आवाजाही पर दबाव बढ़ा। ऐसे समय में “कौन पहले बोला” से अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि नागरिकों, समुद्री मार्गों और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को कैसे बचाया जाए। युद्ध के पक्षधर अक्सर अपनी कार्रवाई को नैतिक आवरण देते हैं, पर समुद्र में डूबती आपूर्ति-व्यवस्था किसी नैतिक भाषण की नहीं, व्यावहारिक कूटनीति की माँग करती है।


भारत के लिए यह संकट दूर की आग नहीं है। विदेश मंत्रालय ने मार्च 2026 में स्पष्ट कहा था कि भारत पश्चिम एशिया में संघर्ष को लेकर “deep concern” रखता है और बातचीत तथा कूटनीति के रास्ते पर ज़ोर देता है। जून 2026 में मंत्रालय ने यह भी कहा कि यह संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर “debilitating impact” डाल रहा है। Reuters के अनुसार भारत के तेल आयात में मध्य-पूर्व का हिस्सा मार्च 2026 में ऐतिहासिक रूप से नीचे आ गया, जबकि रूसी तेल की हिस्सेदारी तेज़ी से बढ़ी। इसका अर्थ साफ़ है: भारत के लिए ऊर्जा-सुरक्षा अब केवल खरीद नीति नहीं, भू-राजनीतिक जोखिम-प्रबंधन है।


यही वह जगह है जहाँ भारत की विदेश नीति की असली कसौटी शुरू होती है। भारत को किसी एक पक्ष का प्रवक्ता बनना नहीं, बल्कि स्थिरता का भरोसेमंद निर्माता बनना है। भारत की ऐतिहासिक भूमिका, उसकी ऊर्जा-आवश्यकताएँ, उसकी बड़ी प्रवासी आबादी, और समुद्री व्यापार पर उसकी निर्भरता—इन सबके बीच संतुलन साधना केवल बयान देने से नहीं होगा। उसे ऐसी कूटनीति चाहिए जो सार्वजनिक रूप से संयम, निजी रूप से संवाद और बहुपक्षीय मंचों पर निष्पक्षता का संकेत दे। भारत यदि इस समय ठोस, शांत और विश्वसनीय भाषा में बोलता है, तो वह केवल अपना हित नहीं, अंतरराष्ट्रीय भरोसा भी मज़बूत करेगा।


यह भी महत्त्वपूर्ण है कि इस संकट ने बहुपक्षीय मंचों की दरारें उजागर कर दी हैं। Reuters के अनुसार मई 2026 में भारत की मेज़बानी में हुई BRICS बैठक ईरान युद्ध पर सहमति से संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं कर सकी, और मतभेद खुले तौर पर सामने आ गए। इसका अर्थ यह है कि वैश्विक दक्षिण के मंच भी अब पश्चिम एशिया की आग से अछूते नहीं रहे। ऐसे माहौल में भारत की भूमिका केवल औपचारिक अध्यक्षता तक सीमित नहीं हो सकती; उसे वह देश बनना होगा जो विभाजित दुनिया में संवाद की भाषा बचाए रखे।


इस पूरे परिदृश्य में सबसे खतरनाक बात यह है कि नेतृत्व अपने-अपने घरेलू संकटों से ध्यान हटाने के लिए बाहरी युद्ध को राजनीतिक पूँजी की तरह इस्तेमाल करने लगता है। जब तेल बढ़ता है, शेयर बाज़ार डगमगाता है, जहाज़ रास्ता बदलते हैं और लोगों के जीवन पर महँगाई की चोट पड़ती है, तब युद्ध केवल मोर्चे पर नहीं लड़ा जाता—वह रसोई, बंदरगाह, मुद्रा-बाज़ार और कूटनीतिक मेज़ पर भी लड़ा जाता है। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि किसी भी देश की रणनीति बदले हुए वैश्विक हालात को समझे, न कि केवल आक्रोश की भाषा में प्रतिक्रिया दे।


भारत के लिए संदेश स्पष्ट है: होर्मुज़ की हर लहर में उसके तेल बिल की गूंज है, हर गोली में उसके व्यापार की चुनौती है, और हर युद्धविराम-भंग में उसकी कूटनीतिक क्षमता की परीक्षा। इस परीक्षा में सफल होने का रास्ता युद्ध के शोर से नहीं, संयम, मध्यस्थता, ऊर्जा-विविधीकरण और अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रति प्रतिबद्धता से होकर जाता है। पश्चिम एशिया को आज एक ऐसे संतुलित हस्तक्षेप की ज़रूरत है जो आग को हवा न दे, बल्कि पानी दे; और भारत, यदि वह सचमुच एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति बनना चाहता है, तो उसे यही भूमिका निभानी होगी।