मतदाता-नामांकन, डिजिटल बाधाएँ और लोकतंत्र की विश्वसनीयता

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


मतदाता-नामांकन, डिजिटल बाधाएँ और लोकतंत्र की विश्वसनीयता

भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की तकनीकी व्यवस्था नहीं है; वह नागरिकों की समान राजनीतिक भागीदारी, निष्पक्ष अवसर और संवैधानिक भरोसे पर टिका हुआ एक जीवित वादा है। इसी कारण मतदाता सूची की शुचिता जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक यह भी है कि किसी भी नागरिक—विशेषकर नए और युवा मतदाता—के लिए नामांकन की प्रक्रिया पारदर्शी, सरल, समान और भेदभावरहित बनी रहे। संविधान का अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार के आधार पर यह स्पष्ट करता है कि 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का प्रत्येक भारतीय नागरिक, यदि वह अन्यथा अयोग्य नहीं है, तो मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का अधिकारी है; न्यायालयों ने भी मताधिकार को पूर्ण “मौलिक अधिकार” नहीं, बल्कि संविधान-समर्थित और वैधानिक अधिकार माना है।

इसी पृष्ठभूमि में मतदाता सूची से जुड़ी हालिया प्रशासनिक कार्रवाइयों पर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद draft electoral roll से 65 लाख नाम हटाए जाने की सूचना आधिकारिक रूप से प्रकाशित की गई थी, और अब देश के 12 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया के दौरान नया enumeration form लागू किया गया है, जिसमें मतदाता या उसके माता-पिता/निकट संबंधी के पुराने SIR रोल में नाम का पता लगाने की शर्त जोड़ी गई है। भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार ऑनलाइन प्रणाली में भी यह विवरण भरना अपेक्षित है, जबकि Election Commission के अधिकारियों ने यह भी कहा है कि Form 6 स्वयं संशोधित नहीं हुआ; प्रशासनिक निर्देशों के माध्यम से एक declaration जोड़ा गया है। यही वह बिंदु है जहाँ लोकतांत्रिक सावधानी आवश्यक हो जाती है: नामांकन की सहजता यदि डिजिटल चरणों में अनावश्यक रूप से जटिल बना दी जाए, तो उसका प्रभाव समान रूप से सब पर नहीं पड़ता; उसका सबसे कठोर असर पहली बार मतदाता बनने वाले, मोबाइल/डिजिटल माध्यम से आवेदन करने वाले और शहरी-ग्रामीण असमानताओं से जूझ रहे युवाओं पर पड़ता है।


कानूनी रूप से यह प्रश्न केवल प्रक्रिया का नहीं, वैधता का भी है। Representation of the People Act, 1950 की धारा 19 यह कहती है कि 18 वर्ष से अधिक आयु और ordinarily resident व्यक्ति मतदाता सूची में दर्ज होने का अधिकारी है; धारा 23 नाम शामिल करने की प्रक्रिया देती है; और धारा 28 केंद्र सरकार को, Election Commission से परामर्श के बाद, Official Gazette में अधिसूचना द्वारा नियम बनाने की शक्ति देती है। यही नहीं, धारा 28(2) में “electoral rolls में दर्ज किए जाने वाले particulars” और धारा 23/22 के तहत verification procedure जैसे विषयों पर नियम-निर्माण का स्पष्ट आधार भी मौजूद है। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी नई शर्त या declaration को लागू किया गया है, तो उसकी वैधता का मूल्यांकन इस आधार पर होगा कि वह अधिनियम और अधीनस्थ नियमों के भीतर है या नहीं, क्या वह विधिवत अधिसूचित है, और क्या वह संसद में नियमों के lay-before प्रावधान के अनुरूप है। इसलिए “संसद ने पारित किया या नहीं” का प्रश्न महत्त्वपूर्ण होते हुए भी अकेला निर्णायक प्रश्न नहीं है; निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या नई शर्त विधिसम्मत, अधिसूचित, समान और अनुपातिक है।


यहाँ मूल संवैधानिक कसौटी समानता और गैर-अनियमनशीलता की है। एक ही प्रकार के तथ्य के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन प्रक्रिया में अलग-अलग व्यवहार, यदि वास्तविक रूप से भिन्न वैधानिक आधार के बिना किया जाए, तो वह अनुच्छेद 14 की आत्मा को चोट पहुँचा सकता है। लोकतांत्रिक राज्य का कर्तव्य केवल नाम जोड़ना या हटाना नहीं है; उसका कर्तव्य यह भी है कि वह इस कार्यवाही को इस तरह संचालित करे कि कोई पात्र नागरिक केवल तकनीकी अड़चन, सूचना-असमानता या डिजिटल असुविधा के कारण मताधिकार से बाहर न हो। Election Commission स्वयं यह मानता रहा है कि electoral roll free and fair election की बुनियाद है और वह Article 324, RP Act 1950 और Registration of Electors Rules, 1960 के ढाँचे में काम करता है। इसलिए किसी भी नए निर्देश की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि क्या वह roll को “pure” बनाने के नाम पर eligible citizens को बाहर करने का साधन तो नहीं बन रहा।


युवा मतदाताओं के संदर्भ में यह चिंता और अधिक गंभीर हो जाती है। देश की नई पीढ़ी के लिए मतदान केवल औपचारिक अधिकार नहीं, बल्कि राजनीतिक उपस्थिति, सामाजिक स्वीकृति और भविष्य-निर्माण का माध्यम है। जब उनकी भागीदारी के रास्ते पर अतिरिक्त डिजिटल शर्तें, जटिल घोषणाएँ या संदिग्ध असमानताएँ रखी जाती हैं, तो संदेह पैदा होता है कि कहीं व्यवस्था नागरिकों को आसान पहुँच देने के बजाय उन्हें थका कर पीछे तो नहीं धकेल रही। यह केवल चुनाव आयोग की तकनीकी परीक्षा नहीं, बल्कि सरकार और संस्थाओं की लोकतांत्रिक संवेदनशीलता की परीक्षा है। खासकर तब, जब बिहार SIR जैसे अभियानों के बाद बड़े पैमाने पर नाम हटने की चर्चा पहले से सार्वजनिक विमर्श में हो, और अब नए आवेदनकर्ताओं पर माता-पिता के SIR विवरण की शर्त जोड़ी जाए, तो यह आशंका और प्रबल होती है कि rollback नहीं, बल्कि exclusion की मनोवृत्ति कहीं संस्थागत रूप न ले रही हो।


वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा किसी संस्था के सर्वशक्तिमान होने के दावे से नहीं, बल्कि उसकी जवाबदेही से होती है। Chief Election Commissioner का पद भी इसी कारण Article 324(5) के तहत विशेष संवैधानिक सुरक्षा से घिरा है; उसे Supreme Court के न्यायाधीश की तरह हटाया जा सकता है, और सेवा-शर्तें भी प्रतिकूल रूप से बदली नहीं जा सकतीं। इसलिए किसी भी गंभीर शिकायत का समाधान न तो नारेबाज़ी है, न व्यक्तिगत आरोप; समाधान है—संवैधानिक प्रक्रिया, सार्वजनिक स्पष्टीकरण, न्यायिक समीक्षा और संसदीय निगरानी। यदि कोई नई मतदाता-प्रक्रिया वास्तव में असमान, अपारदर्शी या मनमानी है, तो उसका प्रतिवाद भी संविधान के भीतर ही होना चाहिए; और यदि वह वैध है, तो उसे ऐसी भाषा और ऐसी कार्यवाही में स्पष्ट किया जाना चाहिए कि नागरिक का भरोसा कमजोर न पड़े। एक लोकतांत्रिक राज्य का सबसे बड़ा बल उसके मतदाता की आश्वस्ति में होता है—और मतदाता का भरोसा तब बनता है, जब नियम सरल हों, प्रक्रिया समान हो, और संस्थाएँ अपने निर्णय के कारण खुलकर बताएं।


इसलिए यह प्रकरण केवल एक फॉर्म, एक declaration या एक तकनीकी digital step का नहीं है। यह इस प्रश्न का है कि भारत का लोकतंत्र आने वाली पीढ़ी को भागीदार मानता है या संदिग्ध; उसे जोड़ना चाहता है या प्रक्रियागत बोझ के नीचे दबाना चाहता है। यदि चुनावी सुधार नागरिकों को अधिक सहज, अधिक सुरक्षित और अधिक समावेशी बनाते हैं, तो उनका स्वागत होना चाहिए। लेकिन यदि वही सुधार युवाओं, नए मतदाताओं और पहली बार नाम जुड़वाने वालों के लिए अवरोध बन जाएँ, तो लोकतंत्र को सजग होकर पूछना होगा: क्या हम मतदाता बना रहे हैं, या चुपचाप उन्हें बाहर कर रहे हैं? यही प्रश्न आज भारत के संवैधानिक विवेक के सामने खड़ा है।