वे कहते हैं—देश बदल रहा है...
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
वे कहते हैं—देश बदल रहा है...
वे कहते हैं—
देश बदल रहा है।
मैं पूछता हूँ—
क्या सचमुच देश बदल रहा है,
या केवल
सत्ता के रंग बदल रहे हैं?
दीवारों पर चिपके पोस्टरों की तरह
चेहरे बदलते हैं,
नारे बदलते हैं,
झंडों का रंग बदलता है,
लेकिन...
भूख की शक्ल
आज भी वैसी ही है।
बेरोज़गारी की आँखों में
अब भी वही खालीपन है।
किसान की हथेलियों पर
अब भी कर्ज़ की दरारें हैं।
मज़दूर के पैरों में
अब भी शहर की धूल है,
पर शहर में
उसके नाम की कोई ज़मीन नहीं।
लोकतंत्र...
अब चुनावों से कम,
प्रबंधन से ज़्यादा चलता है।
जनमत
धीरे-धीरे
डेटा में बदल गया है।
नागरिक
दर्शक बना दिया गया है।
और जनता...
तालियों की आवाज़ में
अपनी ही ख़ामोशी सुनना भूल गई है।
हर शाम
एक नया शत्रु गढ़ लिया जाता है।
कभी सीमा के उस पार,
कभी विचार के इस पार,
कभी भाषा,
कभी भोजन,
कभी पहनावे,
कभी नाम,
कभी पहचान।
बस...
भूख की चर्चा मत होने दो।
महँगाई को
राष्ट्रवाद के पर्दे के पीछे खड़ा रहने दो।
बेरोज़गारी को
देशभक्ति के नारों में दबा दो।
युवा...
उसकी जेब में डिग्रियाँ हैं,
मोबाइल में प्रेरक भाषण,
और ईमेल में
"क्षमा करें, आप चयनित नहीं हुए।"
अब वह परीक्षा से नहीं डरता।
उसे डर है—
कि कहीं
उसकी मेहनत फिर
किसी व्हाट्सऐप ग्रुप में बिक न जाए।
कहीं उसकी रातें
किसी दलाल की मुस्कान में
सुबह होने से पहले हार न जाएँ।
यह देश
प्रतिभाओं की कमी से नहीं,
ईमानदार अवसरों की कमी से हार रहा है।
किसान
अब बादलों को कम देखता है,
सरकारी फ़ाइलों को ज़्यादा।
मज़दूर
अब इमारतें नहीं बनाता,
दूसरों के सपनों की ऊँचाई गढ़ता है,
और अपनी झोपड़ी में
हर बरसात टपकती हुई छत गिनता है।
जाति...
अब भी चुनाव जीतती है।
धर्म...
अब भी सत्ता बनाता है।
इंसान...
अब भी हार जाता है।
सवाल पूछना
धीरे-धीरे
सबसे बड़ा अपराध घोषित किया जा रहा है।
और ताली बजाना
सबसे बड़ा राष्ट्रधर्म।
सच बोलना
अब साहस नहीं,
लगभग जोखिम का दूसरा नाम है।
लेकिन...
इतिहास की स्मृति
बहुत लंबी होती है।
उसे न आईटी सेल भूलवा सकती है,
न प्रचार,
न ट्रेंड,
न ट्रोल,
न कैमरे,
न खरीदे हुए शीर्षक।
इतिहास
हमेशा वहीं लौटता है
जहाँ एक अकेला आदमी
पूरी भीड़ के विरुद्ध खड़ा होकर कहता है—
"नहीं,
यह सच नहीं है।"
याद रखना—
हर सत्ता
अपने समय में
अमर दिखाई देती है।
हर दरबार
अपने जयकारों को
जनमत समझ बैठता है।
हर चाटुकार
अपने स्वामी को
इतिहास से बड़ा मान लेता है।
लेकिन समय...
किसी सिंहासन का कर्मचारी नहीं होता।
वह
न मुकुट पहचानता है,
न झंडा,
न दल,
न विचारधारा।
वह केवल कर्म लिखता है।
एक दिन
जनता फिर लौटेगी।
वह पूछेगी—
मेरे बच्चों के हिस्से की नौकरियाँ कहाँ गईं?
मेरे खेतों की हरियाली किसने गिरवी रखी?
मेरे संविधान की आत्मा को
किसने नारों के बाज़ार में बेच दिया?
मेरे लोकतंत्र को
किसने तालियों के शोर में डुबो दिया?
और उस दिन...
न कैमरे बचेंगे,
न बहसें,
न प्रवक्ता,
न ट्रोलों की फ़ौज,
न सत्ता के दरबार।
सिर्फ़ जनता होगी।
उसकी स्मृतियाँ होंगी।
उसके आँसू होंगे।
और समय की वह अदालत—
जहाँ कोई वकील नहीं होता,
कोई अपील नहीं होती,
कोई प्रचार नहीं चलता।
वहाँ
हर झूठ
अपने ही शब्दों से हारता है।
हर सत्ता
अपने ही वादों से कटघरे में खड़ी होती है।
और हर चाटुकार...
इतिहास के हाशिए पर
बिना नाम,
बिना आवाज़,
बिना स्मृति के
धूल की तरह उड़ जाता है।
क्योंकि अंततः
राजसिंहासन नहीं,
जनता बचती है।
प्रचार नहीं,
सत्य बचता है।
और समय...
समय कभी किसी का प्रवक्ता नहीं होता।
