तेहरान की शोकयात्रा और पश्चिम एशिया की नई भू-रेखाएँ
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
तेहरान की शोकयात्रा और पश्चिम एशिया की नई भू-रेखाएँ
ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम यात्रा आज सिर्फ़ एक शोक-समारोह नहीं है; यह तेहरान की सड़कों पर खिंची एक राजनीतिक रेखा है। रॉयटर्स के अनुसार, उनकी हत्या 28 फ़रवरी को अमेरिकी-इज़रायली हमलों में हुई, और उसके बाद तेहरान में विशाल जनसमूह सड़कों पर उतर आया—कफन, झंडे, नारों और अश्रुओं के साथ। मज़हबी शोक की इस सार्वजनिक भाषा में एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी था: ईरानी राज्य टूटा नहीं है, और समाज ने अपने नेतृत्व के इर्द-गिर्द एक नए प्रतिरोध की मुद्रा अपनाई है। अंतिम संस्कार के कार्यक्रमों का विस्तार तेहरान से मशहद तक तय था, और रॉयटर्स ने इसे न केवल जनशोक, बल्कि “नए क्षेत्रीय क्रम” के संकेत के रूप में पढ़ा है।
वाशिंगटन की भाषा, इसके बरअक्स, अब भी दबाव और धमकी की है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर कहा कि अमेरिका या तो ईरान के साथ समझौता करेगा या “काम पूरा” करेगा—यानी सैन्य दबाव का विकल्प खुला रखेगा। लेकिन यही बयान यह भी दिखाता है कि वॉशिंगटन की दृष्टि अब भी ईरानी समाज की जटिलता को सरल रेखाओं में देखने की भूल कर रही है। जिस देश की सड़कों पर भारी जनसमूह अपने नेता की विदाई में इकट्ठा हो, उसे “कमज़ोर” मान लेना राजनीतिक अंधापन है। रॉयटर्स के अनुसार, इस शोक-प्रदर्शन ने, अपेक्षित अस्थिरता के बजाय, ईरान के भीतर एकजुट और चुनौतीपूर्ण सार्वजनिक मनोभाव को उजागर किया है।
भूराजनीतिक स्तर पर यह संकट केवल ईरान-अमेरिका या ईरान-इज़रायल की भिड़ंत नहीं है। यह ऊर्जा-सुरक्षा, समुद्री मार्गों, आपूर्ति-श्रृंखलाओं और पश्चिम एशिया के शक्ति-संतुलन का प्रश्न है। रॉयटर्स ने पहले ही रेखांकित किया था कि इस संघर्ष ने भारत को “तंग रस्सी” पर चलने की स्थिति में ला दिया है—ईरान से सांस्कृतिक-सामरिक निकटता, इज़रायल से रणनीतिक साझेदारी, और अरब देशों से गहरे संबंध, इन सबके बीच। भारत ने उस समय खुलकर कहा था कि खाड़ी क्षेत्र की घटनाएँ उसके लिए “great anxiety” का कारण हैं, क्योंकि लगभग एक करोड़ भारतीय खाड़ी में रहते और काम करते हैं, और भारत की व्यापार, ऊर्जा तथा आपूर्ति-श्रृंखलाएँ वहाँ की स्थिरता पर निर्भर हैं।
यही वह जगह है जहाँ भारत की विदेश-नीति की असली कसौटी सामने आती है। भारत की कूटनीति का आधार “camp follower” होना नहीं, बल्कि “strategic autonomy” रहा है—यह बात स्वयं विदेश मंत्रालय की पृष्ठभूमि में दर्ज है। MEA के एक आधिकारिक वक्तव्य में स्पष्ट कहा गया है कि भारत अपनी स्वतंत्र निर्णय-क्षमता और रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखना चाहता है। इसी स्वायत्तता की परीक्षा पश्चिम एशिया में बार-बार होती है, क्योंकि भारत ने एक ओर ईरान के साथ सभ्यतागत, मानवीय और भू-रणनीतिक संबंधों को बनाए रखा है, और दूसरी ओर इज़रायल के साथ रक्षा-तकनीक, नवाचार और मुक्त व्यापार की दिशा में सहयोग को आगे बढ़ाया है। रॉयटर्स के अनुसार, भारत और इज़रायल ने हाल में रक्षा प्रौद्योगिकी के संयुक्त विकास, उत्पादन और हस्तांतरण तथा मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में काम आगे बढ़ाया है।
इसी संदर्भ में भारत का खामेनेई के अंतिम संस्कार में प्रतिनिधिमंडल भेजना केवल औपचारिक संवेदना नहीं, एक कूटनीतिक संकेत है। रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया कि भारत ने अपने विदेश राज्य मंत्री और बिहार के राज्यपाल को समारोह में भेजा, और विदेश मंत्रालय ने इसे भारत-ईरान के “civilizational ties” और “people-to-people connection” का प्रतिबिंब बताया। यह कदम बताता है कि भारत किसी एक ध्रुव की भाषा में नहीं, अपने राष्ट्रीय हितों, ऐतिहासिक रिश्तों और क्षेत्रीय यथार्थ के आधार पर बोलना चाहता है। इसीलिए भारत के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता न तो भावनात्मक अधीनता है, न नाटकीय मौन; बल्कि संतुलित, सुस्पष्ट और बहुस्तरीय कूटनीति है।
ईरान के इस शोक-समारोह का संदेश एक और है: किसी देश की राजनीति केवल व्यक्तियों से नहीं, स्मृतियों, प्रतीकों और संस्थागत निरंतरता से चलती है। खामेनेई का नाम आज भी उस प्रतिरोध का प्रतीक है, जिसे ईरान की जनता ने सड़कों पर, नारों में और शोक में अभिव्यक्त किया। पर इस प्रतीक की व्याख्या भी किसी एक वाशिंगटन या तेल अवीव के बयान से पूरी नहीं हो सकती। पश्चिम एशिया अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ सैन्य दबाव, ऊर्जा-राजनीति, धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृति और कूटनीतिक पुनर्संयोजन—सब एक साथ काम कर रहे हैं। इस भू-नक्शे पर भारत को अपनी भूमिका याद रखनी होगी: पुल बनने की, पक्ष चुनने की नहीं; संवाद बनाए रखने की, टकराव का अनुगामी बनने की नहीं।
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सबक है। ईरान की शोकयात्रा ने यह दिखा दिया कि जनता के मनोविज्ञान को केवल बम, धमकी या तंज़ से नहीं समझा जा सकता। और भारत के लिए यह याद रखना और भी ज़रूरी है कि उसकी पश्चिम एशिया नीति का आधार भावुक प्रतिक्रियाएँ नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता, ऊर्जा-सुरक्षा, प्रवासी नागरिकों की चिंता और सभ्यतागत विवेक होना चाहिए। तेज़ होते संकटों के बीच यही धीमी, संतुलित और आत्मनिर्भर कूटनीति भारत की सबसे बड़ी पूँजी है।
