आस्था की मर्यादा, तंत्र की शुचिता और इतिहास का आईना—राम मंदिर चढ़ावा प्रकरण पर एक वैचारिक विमर्श

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


आस्था की मर्यादा, तंत्र की शुचिता और इतिहास का आईना—राम मंदिर चढ़ावा प्रकरण पर एक वैचारिक विमर्श

भारतीय चेतना में मंदिर केवल ईंट-पत्थरों या वास्तुकला के प्रतीक नहीं हैं; वे 'लोक' की अटूट श्रद्धा, समर्पण और आध्यात्मिक संप्रभुता के जीवंत केंद्र हैं। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण केवल एक अदालती फैसले की परिणति नहीं था, बल्कि इसे देश के बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक पुनर्जागरण की यात्रा के शिखर के रूप में देखा गया। लेकिन जब इसी भव्य मंदिर के गर्भगृह से श्रद्धालुओं के चढ़ावे की चोरी और वित्तीय अनियमितता की खबरें सामने आती हैं, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह जाता। यह हमारी सामूहिक आस्था पर आघात है, व्यवस्था की शुचिता पर कलंक है, और उस राजनीतिक विमर्श के अंतर्विरोधों का प्रकटीकरण है जो धर्म को राष्ट्र का पर्याय मानता आया है।

आज जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसी वैचारिक पितृ-संस्था अपनी ‘अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक’ में इस घटना पर गहरे दुःख और चिंता का इजहार कर रही है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह संकट कितना गहरा और संवेदनशील है।


1. संघ की चिंता और 'तीर्थ क्षेत्र न्यास' की स्वायत्तता पर सवाल


राम मंदिर आंदोलन को वैचारिक और धरातलीय ऊर्जा देने वाले संघ का इस विषय पर सार्वजनिक रूप से अपनी चिंता व्यक्त करना बेहद गंभीर संकेत है। संघ ने उत्तर प्रदेश सरकार की एसआईटी जांच पर भरोसा तो जताया है, लेकिन साथ ही 'श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास' को सख्त ताकीद की है कि वह भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोके।


# बौद्धिक विमर्श: यहाँ प्रश्न यह उठता है कि जिस न्यास का गठन सीधे केंद्र सरकार की देखरेख और प्रधानमंत्री की प्रत्यक्ष रुचि के साथ हुआ था, वहाँ ऐसी अक्षम्य लापरवाही और दुस्साहस की गुंजाइश कैसे बनी? न्यास के ट्रस्टी और प्रधानमंत्री के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक अनुभवों वाले व्यक्तित्व की उपस्थिति के बावजूद यदि चढ़ावे की गिनती में इस स्तर की धांधली हो सकती है, तो यह तंत्र के भीतर गहरे बैठे संस्थागत बिखराव और निगरानी के पूर्ण अभाव को दर्शाता है।


2. राजनीतिक लाभ का 'क्रेडिट' और संकट पर 'मौन' की राजनीति


इस पूरे विमर्श का सबसे संवेदनशील और राजनीतिक पक्ष वर्तमान नेतृत्व के मौन से जुड़ा है। सन् 1990 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा में एक रणनीतिक समन्वयक की भूमिका से लेकर, भूमिपूजन और जनवरी 2024 में हुए भव्य प्राण-प्रतिष्ठा समारोह तक—इस पूरे विमर्श का मुख्य चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रहे हैं।


चुनाव-दर-चुनाव जिस मंदिर निर्माण को अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और ऐतिहासिक गारंटी के रूप में प्रस्तुत किया गया, आज उसी पावन स्थल पर हुई वित्तीय धोखाधड़ी पर प्रधानमंत्री का मौन खटकने वाला है।


* विरोधाभास: प्राण-प्रतिष्ठा के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री ने उद्घोष किया था कि "राम राष्ट्र हैं और देव देश हैं।" यदि राम ही राष्ट्र की आत्मा हैं, तो उस आराध्य के दरबार में होने वाली लूट पर राष्ट्र के प्रधान सेवक की चुप्पी को किस रूप में देखा जाए?

* नैतिक उत्तरदायित्व: राजनीति का यह स्थापित नियम है कि जब आप किसी बड़ी सफलता का श्रेय (Credit) अपने खाते में दर्ज करते हैं, तो उसकी विफलता या उसमें होने वाली विकृतियों की नैतिक जिम्मेदारी (Accountability) से भी आप मुंह नहीं मोड़ सकते।


3. इतिहास की कसौटी: जवाहरलाल नेहरू बनाम नरेंद्र मोदी


आज जब प्रधानमंत्री की तुलना देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल की दीर्घायु से की जा रही है, तो इतिहास हमें नैतिकता और प्रशासनिक कड़ाई का एक बड़ा ही प्रासंगिक उदाहरण याद दिलाता है।


# श्रीनाथद्वारा मंदिर प्रकरण (1958) और नेहरू का कड़ा रुख:

13 नवंबर 1958 को जब राजस्थान के श्रीनाथजी मंदिर से सोने-चांदी और नकदी की हेराफेरी (जिसे वहां के संरक्षक महाराज द्वारा गुप्त रूप से ले जाया गया था) की जानकारी नेहरूजी को मिली, तो उन्होंने राजनीतिक नफा-नुकसान से ऊपर उठकर तत्कालीन गृह मंत्री गोविंद वल्लभ पंत और राजस्थान के मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया को अत्यंत कड़े शब्दों में पत्र लिखे थे।


| ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (नाथद्वारा - 1958) v/s वर्तमान परिप्रेक्ष्य (अयोध्या - 2026) |


# नेहरू का दृष्टिकोण: इसे सार्वजनिक धन की खुली 'लूट' और गबन माना। 

# वर्तमान रुख: केंद्र के स्तर पर एक रहस्यमयी और असहज करने वाला मौन। 


* प्रशासनिक हस्तक्षेप: मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर ढिलाई बरतने पर नाराजगी जताई और जांच समिति के ठप होने पर सवाल खड़े किए। 

* वर्तमान कार्रवाई: राज्य सरकार द्वारा एसआईटी गठित (सराहनीय कदम), परंतु केंद्रीय नेतृत्व द्वारा कोई सार्वजनिक कड़ा संदेश नहीं। 


# मूल प्रश्न: नेहरू ने पूछा था कि मंदिर की आय का उपयोग क्या मुख्यतः 'राजनीतिक उद्देश्यों' के लिए हो रहा है? इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। 

# यक्ष प्रश्न: आज जब मंदिर के नाम पर सीधे वोट मांगे गए, तो श्रद्धालुओं के साथ हुए इस धोखे पर शीर्ष स्तर से वैसी ही राजनीतिक इच्छाशक्ति क्यों नहीं दिखती? 


नेहरूजी का वह पत्र आज की सत्ता के लिए एक दर्पण है। यदि तत्कालीन प्रधानमंत्री एक मंदिर के भीतर की वित्तीय अनियमितता को 'सार्वजनिक धन का दुरुपयोग' मानकर सीधे हस्तक्षेप कर सकते थे, तो आज के नेतृत्व को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ऐसा ही एक दिशा-निर्देश देने वाला पत्र लिखने या सार्वजनिक वक्तव्य जारी करने से कौन सी विवशता रोक रही है?


4. न्यायपालिका पर टिकीं उम्मीदें: 20 जुलाई की परीक्षा


यह देश का सौभाग्य है कि जब भी कार्यपालिका अपनी राजनीतिक सीमाओं या संकोच के कारण मौन धारण कर लेती है, तब देश की नजरें देश की सर्वोच्च अदालत की ओर उठती हैं। सुप्रीम कोर्ट, जिसने वर्षों पुराने इस ऐतिहासिक विवाद का सर्वसम्मति से निपटारा कर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया था, अब उसी मंदिर की पवित्रता और उसके कोष की सुरक्षा की निगरानी कर रहा है।


अगले सोमवार (20 जुलाई) को होने वाली सुनवाई और एसआईटी की स्टेटस रिपोर्ट पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं। न्यायालय को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि:


* मंदिर में चढ़ने वाला एक-एक पैसा, जो देश के गरीब से गरीब श्रद्धालु की गाढ़ी कमाई और अगाध श्रद्धा का प्रतीक है, वह पूरी तरह सुरक्षित रहे।

* इस चोरी के पीछे जो भी 'सफेदपोश' या रसूखदार चेहरे हैं, उनका पूरी तरह पर्दाफाश हो।


## आस्था के नाम पर राजनीति का अंत होना चाहिए


धर्म जब तक व्यक्तिगत और सामाजिक शुचिता का साधन रहता है, वह समाज को जोड़ता है। लेकिन जब धर्म को पूरी तरह से राजनीति के रथ का पहिया बना दिया जाता है, तो ऐसी ही विसंगतियां जन्म लेती हैं।


बीजेपी और उसके शीर्ष नेतृत्व को यह समझना होगा कि 'हिंदू चेतना' को केवल चुनावों के समय जागृत करना और उनकी गाढ़ी कमाई के चढ़ावे की सुरक्षा के प्रति उदासीन रहना एक आत्मघाती दृष्टिकोण है। यदि राम मंदिर जैसी पावन और संवेदनशील जगह पर भी चोरों के हौसले बुलंद हैं, तो यह सीधे तौर पर हमारी शासन व्यवस्था की धमक पर एक करारा तमाचा है।


अब समय आ गया है कि प्रधानमंत्री अपने शब्दों "राम राष्ट्र हैं" को चरितार्थ करते हुए सामने आएं, इस महापाप की भर्त्सना करें और यह सुनिश्चित करें कि राम के नाम पर श्रद्धा सौंपने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास इस तंत्र से न डिगे। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, वह होते हुए दिखना भी चाहिए।