तंत्र की संवेदनशून्यता और मीडिया का ‘सन्नाटा’—क्या लोकशाही सिर्फ एक चुनावी रस्म रह गई है?
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
तंत्र की संवेदनशून्यता और मीडिया का ‘सन्नाटा’—क्या लोकशाही सिर्फ एक चुनावी रस्म रह गई है?
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आंदोलनों की एक गौरवशाली परंपरा रही है। आंदोलन केवल सड़कों का हुजूम नहीं होते, वे व्यवस्था की सोई हुई अंतरात्मा को जगाने वाली पुकार होते हैं। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में देश ने सत्ता, प्रशासन और मीडिया के चरित्र में जो बुनियादी और डरावना बदलाव देखा है, वह आज हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुका है।
एक तरफ इतिहास का वह पन्ना है जब साल 2011-12 में जनलोकपाल की मांग को लेकर अन्ना हजारे का आंदोलन खड़ा हुआ था। दूसरी तरफ आज का वह मंज़र है जहां लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा पेपर लीक का एक गंभीर मुद्दा सड़क पर दम तोड़ रहा है। इन दोनों तस्वीरों की तुलना केवल दो आंदोलनों की तुलना नहीं है, बल्कि यह इस बात का दस्तावेज़ है कि कैसे हमारी व्यवस्था 'लोक' के प्रति पूरी तरह 'लापरवाह' और संवेदनशून्य हो चुकी है।
1. मीडिया का चरित्र: कल की 'अति-सक्रियता' बनाम आज का 'सन्नाटा'
याद कीजिए वह दौर जब दिल्ली का रामलीला मैदान देश का केंद्र बिंदु बन गया था। कैमरों की चमक, स्टूडियो में जिरह और चौबीसों घंटे की 'ब्रेकिंग न्यूज़' ने एक ऐसे कथित घोटाले (जिसमें बाद में अदालतों से क्लीन चिट तक मिली) को राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बना दिया था। तब की सरकार और आंदोलनकारियों के बीच पल-पल की बातचीत को जनता तक पहुँचाया जा रहा था।
* आज का सच: आज देश के भविष्य यानी हमारे छात्रों का जीवन दांव पर है। एक के बाद एक परीक्षाओं के पेपर लीक हो रहे हैं। युवा सड़कों पर रो रहे हैं, गुहार लगा रहे हैं। लेकिन मुख्यधारा के मीडिया चैनलों के स्टूडियो से यह दर्द गायब है। आज 'टीआरपी' के पैमानों से युवाओं की हताशा को बाहर धकेल दिया गया है। जब मीडिया सत्ता के सवालों को जनता से पूछने लगे और जनता के सवालों पर मौन साध ले, तो समझ जाना चाहिए कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी रीढ़ खो चुका है।
2. शासन और प्रशासन: संवाद की जगह 'निगरानी' और 'दमन'
आंदोलन लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा होते हैं। यूपीए शासन के दौरान तमाम गतिरोधों के बावजूद, सरकार लगातार प्रदर्शनकारियों से संपर्क साधने, मंत्रियों को मध्यस्थ बनाकर भेजने और आखिरकार संसद में प्रस्ताव पास कर अनशन तुड़वाने की हद तक गंभीर दिखी थी।
लेकिन आज की प्रशासनिक मशीनरी का तरीका एकदम उलट और भयावह है:
* संवाद का अंत: आज संवाद की खिड़कियाँ पूरी तरह बंद कर दी गई हैं। एक भी जिम्मेदार मंत्री या नीति-निर्माता आंदोलनरत छात्रों के बीच जाकर उनकी बात सुनने या नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
* निगरानी और जासूसी: छात्रों की जायज मांगों को सुनने के बजाय, तंत्र अपनी पूरी ताकत इस बात में लगा रहा है कि आंदोलन को कुचला कैसे जाए। प्रदर्शनकारियों के पीछे जासूस और पुलिस बल तैनात किए जा रहे हैं ताकि उनके हौसलों को तोड़ा जा सके।
* लाठी और दमन: आज न्याय मांगने की कीमत पुलिस की लाठियां खाकर चुकानी पड़ती है। अपनी परीक्षा की शुचिता चाहने वाले छात्रों को 'अपराधी' या 'उपद्रवी' की तरह खदेड़ दिया जाता है।
3. राजनीति का दोहरा मापदंड: कल के 'दागी' आज के 'माननीय'
अन्ना आंदोलन का सबसे बड़ा नारा भ्रष्टाचार-मुक्त भारत और राजनीति की शुचिता था। उस दौर में जिन नेताओं और मंत्रियों को 'महाभ्रष्ट' घोषित कर चौतरफा घेरा गया था, आज उनमें से अधिकांश सत्ता के समीकरणों में शामिल होकर फिर से 'माननीय' और 'सदाचारी' बन चुके हैं।
यह बदलाव साबित करता है कि राजनीतिक शुचिता का वह पूरा विमर्श महज एक सत्ता परिवर्तन का जरिया था, व्यवस्था परिवर्तन का नहीं। कल के चेहरे बदले हैं, लेकिन कुर्सियों का चरित्र और सत्ता का अहंकार जस का तस है, बल्कि और अधिक क्रूर हो चुका है।
## व्यवस्था से तीखे सवाल
हम देश के नीति-निर्माताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और मीडिया घरानों से कुछ सीधे सवाल पूछना चाहते हैं:
1. सरकार से: जब देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य का सौदा करने वाले पेपर लीक माफिया खुलेआम घूम रहे हैं, तो सरकार की पूरी ऊर्जा छात्रों को डराने और उनके आंदोलन को दबाने में क्यों खर्च हो रही है? क्या कोई एक मंत्री भी नैतिक आधार पर इस्तीफा देने या जिम्मेदारी स्वीकार करने का साहस दिखाएगा?
2. प्रशासन से: पुलिस और खुफिया तंत्र का इस्तेमाल देशद्रोहियों और अपराधियों को पकड़ने के लिए होना चाहिए या अपने हक की लड़ाई लड़ रहे निहत्थे छात्रों की जासूसी के लिए?
3. मीडिया से: यदि देश के युवाओं का भविष्य आपकी प्राइम-टाइम डिबेट का मुख्य विषय नहीं बन सकता, तो आपकी पत्रकारिता की प्रासंगिकता क्या रह जाती है? क्या इतिहास आपको इस 'मौन' के लिए कभी माफ करेगा?
## जब युवा हारेगा, तो देश हारेगा
कोई भी राष्ट्र अपने युवाओं की हताशा पर मजबूत इमारत खड़ी नहीं कर सकता। पेपर लीक सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, यह देश की मेधा (Talent) की सरेआम हत्या है। जब परीक्षाओं से भरोसा उठ जाएगा, तो युवाओं का व्यवस्था से भरोसा उठ जाएगा।
शासन, प्रशासन और मीडिया को यह समझना होगा कि लाठियों के दम पर असंतोष को दबाया तो जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता। यदि आज भी संवाद का रास्ता नहीं चुना गया और युवाओं के साथ न्याय नहीं हुआ, तो आने वाली नस्लें इस दौर को "लोकतंत्र की संवेदनशून्यता का काला काल" घोषित करने में संकोच नहीं करेंगी। अब भी वक्त है—जागिए, सुनिए और संभलिए!
