जब राज्य अपने ही नागरिक को प्रमाणित करने लगे
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जब राज्य अपने ही नागरिक को प्रमाणित करने लगे"नागरिकता, मताधिकार, दस्तावेज़ीकरण और लोकतांत्रिक भरोसे पर एक संवैधानिक विमर्श"
भारत का गणराज्य इस मूल विश्वास पर खड़ा है कि राज्य अपने नागरिकों को पहचानेगा, उनकी वैध उपस्थिति को मानेगा और उन्हें राजनीतिक समुदाय का स्वाभाविक हिस्सा समझेगा। अनुच्छेद 326 के अनुसार वयस्क नागरिकों को मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का अधिकार है, और निर्वाचन-व्यवस्था की बुनियाद अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को दी गई संवैधानिक ज़िम्मेदारी पर टिकी है। इसलिए मतदाता-सूची का शुद्धिकरण लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, पर वह शुद्धिकरण नागरिकों को संदेह की निगाह से देखने का औज़ार नहीं बन सकता।
यहीं से भारतीय नागरिकता के प्रश्न का सबसे संवेदनशील आयाम शुरू होता है। भारत में नागरिकता का कानूनी ढाँचा संविधान और Citizenship Act, 1955 से निर्मित है; आधार अपने आप में नागरिकता या domicile का प्रमाण नहीं है, बल्कि पहचान का साधन है। UIDAI की आधिकारिक स्थिति भी यही है कि Aadhaar number proof of identity है, पर वह citizenship या domicile का अधिकार नहीं देता। Ministry of External Affairs भी passport को primary travel document बताती है, नागरिकता का सार्वभौम प्रमाणपत्र नहीं। इसीलिए राज्य यदि नागरिक से वही माँगने लगे जिसे उसने स्वयं कभी सर्वमान्य, सार्वदेशिक और समान रूप से प्रमाणित नहीं किया, तो यह प्रशासनिक सुविधा नहीं, संस्थागत असंतुलन बन जाता है।
इस बहस का सबसे कठोर पक्ष यह है कि भारत ने लंबे समय तक जन्म-पंजीकरण को वह संस्थागत गंभीरता नहीं दी जिसके वह योग्य था। Registration of Births and Deaths Act, 1969 ने जन्म और मृत्यु पंजीकरण को वैधानिक रूप दिया, और सरकारी अभिलेख यह मानते हैं कि जन्म के 21 दिनों के भीतर पंजीकरण की व्यवस्था है। आज स्थिति बेहतर है, लेकिन यह सुधार उन करोड़ों वयस्क भारतीयों की ऐतिहासिक वास्तविकता नहीं बदल देता जिनके जन्म घर पर हुए, जिनके परिवारों के पास जन्म-प्रमाण नहीं है, और जिनकी उम्र, निवास या परिवार-इतिहास ग्राम्य स्मृति, पंचायत-रिपोर्ट, राशन, स्कूल-त्यागपत्र, या वर्षों से सरकारी संपर्क के ज़रिए ही पहचाने जाते हैं। जब एक प्रशासनिक तंत्र अब उन्हीं नागरिकों से जन्म-सम्बंधी “शुद्ध” दस्तावेज़ माँगता है, तो वह सुधार नहीं, पिछली राज्य-लापरवाही का दंड जनता पर थोपता है।
इस सन्दर्भ में मतदाता-पंजीकरण की व्यवस्था को अत्यंत सावधानी से देखना होगा। Representation of the People Act, 1950 में electoral rolls, ordinary residence, claims and objections तथा rule-making का स्पष्ट वैधानिक ढाँचा है; इसमें नियम बनाने की शक्ति केंद्र सरकार को Election Commission से परामर्श के बाद Official Gazette में अधिसूचना के माध्यम से दी गई है। Registration of Electors Rules, 1960 के अंतर्गत Form 6 जैसे प्रपत्र मौजूद हैं। इसका अर्थ यह है कि कोई भी नई शर्त, यदि वह नागरिकों की व्यापक श्रेणी पर लागू होती है, तो उसे वैधानिक आधार, पारदर्शी अधिसूचना, और समान अनुप्रयोग के मानदंडों पर कसना होगा। डिजिटल प्रक्रिया और ऑफ़लाइन प्रक्रिया में अनावश्यक भेद यदि वैध कारण के बिना पैदा किया जाए, तो समानता और गैर-मनमानापन की संवैधानिक भावना आहत होती है।
यहाँ लोकतंत्र का सबसे चिंताजनक प्रश्न “दस्तावेज़” नहीं, “विश्वास” है। राज्य यदि बार-बार नागरिक से यह साबित कराने लगे कि वह विदेशी नहीं है, जबकि राज्य ने ही उसके जन्म, निवास, उम्र और नागरिकता के प्रमाण का सार्वभौमिक ढाँचा पर्याप्त रूप से निर्मित नहीं किया, तो यह प्रशासनिक नासमझी भर नहीं रहती। यह उस राजनीतिक दर्शन की ओर झुकाव है जिसमें नागरिक पहले संदेह के घेरे में रखा जाता है और फिर काग़ज़ी सबूतों की ऐसी दीवार खड़ी की जाती है जिसे समाज का सबसे कमज़ोर हिस्सा पार न कर सके। देश की लोकतांत्रिक संस्कृति को यह याद रखना चाहिए कि मतदाता-सूची का उद्देश्य नागरिक को बाहर करना नहीं, बल्कि उसे बराबरी से शामिल करना है। चुनाव आयोग स्वयं कहता है कि electoral roll free, fair and credible elections की बुनियाद है; इसलिए “pure” roll का अर्थ “exclusive” roll नहीं हो सकता।
युवा भारत के संदर्भ में यह प्रश्न और भी गहरा हो जाता है। जो पीढ़ी डिजिटल माध्यमों पर निर्भर है, वही सबसे अधिक यह महसूस करती है कि तकनीक यदि समान रूप से उपलब्ध न हो, तो वह सुविधा कम और बाधा अधिक बन जाती है। यदि आवेदन-प्रणाली में ऐसे प्रश्न जोड़े जाएँ जो नागरिकों को अनुचित रूप से छाँटते हों, तो प्रशासनिक भाषा में यह “verification” कहलाएगा, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवहार में यह exclusion का जोखिम पैदा करेगा। यह जोखिम केवल किसी एक आयु-वर्ग का नहीं, बल्कि उस व्यापक भारतीय समाज का है जहाँ शिक्षा, दस्तावेज़ीकरण, माइग्रेशन, घरेलू जन्म, गरीबी और डिजिटल असमानता अभी भी समानता की राह में बाधाएँ हैं। नागरिकों को नागरिक बने रहने के लिए बार-बार कठोरतम प्रमाण-पत्रों से गुज़रना पड़े, तो यह लोकतंत्र की परिपक्वता नहीं, उसकी असुरक्षा का संकेत है।
इसलिए समाधान कठोरता नहीं, संवैधानिक व्यावहारिकता है। राज्य को उन दस्तावेज़ों की वास्तविकता स्वीकार करनी होगी जो लोग सचमुच रखते हैं; उसे Aadhaar, निवास, जन्म-पंजीकरण और electoral rolls के बीच समन्वय इस तरह बनाना होगा कि पात्र नागरिक बाहर न हों। साथ ही, जहाँ नागरिकता पर वास्तविक संदेह हो, वहाँ निर्णय का अधिकार सक्षम विधिक प्राधिकरणों के पास रहना चाहिए, न कि सामान्य नागरिकों पर असंभव बोझ के रूप में। भारत की लोकतांत्रिक शक्ति इसी में है कि वह अपने नागरिक को पहले संदिग्ध नहीं, पहले स्वीकृत माने। एक गणराज्य का कर्तव्य अपने लोगों को बार-बार यह साबित करने के लिए विवश करना नहीं होता कि वे इसी देश के हैं; उसका कर्तव्य उन्हें मानना, सुरक्षा देना और भागीदारी का अधिकार सुनिश्चित करना होता है। यही भारतीय नागरिकता की संवैधानिक गरिमा है, और यही भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा भी।
