जल, जंगल, ज़मीन और जनादेश: विकास किसका, संसाधन किसके लिए?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


जल, जंगल, ज़मीन और जनादेश: विकास किसका, संसाधन किसके लिए?

भारत का संविधान केवल शासन चलाने का दस्तावेज़ नहीं है; वह प्राकृतिक संसाधनों पर जनता के न्यायसंगत अधिकार और राज्य की जवाबदेही का भी घोषणापत्र है। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39(b) राज्य को यह दायित्व देता है कि समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार संचालित हो कि उनका लाभ व्यापक जनहित तक पहुँचे। यह प्रावधान किसी सरकार को संसाधनों का निरंकुश स्वामी नहीं बनाता, बल्कि उसे जनता की ओर से कार्य करने वाला संवैधानिक न्यासी (Constitutional Trustee) बनाता है।

यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न जन्म लेता है—क्या भारत की खनिज नीति वास्तव में जनकल्याण के लिए संचालित हो रही है, या प्राकृतिक संपदा का लाभ क्रमशः कुछ सीमित आर्थिक शक्तियों के हाथों केंद्रित होता जा रहा है?


मध्य प्रदेश इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। देश के सबसे समृद्ध खनिज प्रदेशों में शामिल यह राज्य कोयला, हीरा, चूना-पत्थर, ताँबा, डोलोमाइट, मैंगनीज़, बॉक्साइट और अनेक अन्य खनिजों से सम्पन्न है। विडंबना यह है कि जिन जिलों से देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था को ऊर्जा और खनिज मिलते हैं, वहीं बड़ी आबादी आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल, रोजगार और आधारभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करती दिखाई देती है। यदि प्राकृतिक संपदा विकास का इंजन है, तो सबसे पहले उसका लाभ उसी भूभाग और उन समुदायों तक क्यों नहीं पहुँचता जहाँ से वह संपदा निकाली जाती है?


यह प्रश्न किसी एक उद्योग समूह का नहीं है। यह पूरे शासन मॉडल का प्रश्न है। पिछले तीन दशकों में भारत ने खनन, ऊर्जा, बंदरगाह, बिजली, परिवहन और अधोसंरचना के क्षेत्रों में निजी निवेश को व्यापक रूप से प्रोत्साहित किया है। निजी निवेश विकास का शत्रु नहीं है; लेकिन लोकतंत्र में विकास की वैधता केवल निवेश से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व, पुनर्वास, स्थानीय सहमति और सार्वजनिक लाभ से तय होती है।


जब हजारों एकड़ भूमि अधिग्रहित होती है, जंगल कटते हैं, गाँव विस्थापित होते हैं और संसाधन दशकों के लिए पट्टों पर दिए जाते हैं, तब यह पूछना लोकतांत्रिक अधिकार है कि उस संसाधन से राज्य को कितना राजस्व मिला, स्थानीय समुदाय को कितना लाभ मिला, कितने स्थायी रोजगार बने, पर्यावरणीय क्षति की भरपाई कैसे हुई और भविष्य की पीढ़ियों के लिए क्या बचाया गया।


भारत के संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों ने स्थानीय स्वशासन को केवल औपचारिक संस्था नहीं बनाया। विशेषकर अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA) और वनाधिकार कानून ने यह स्वीकार किया कि आदिवासी और स्थानीय समुदाय प्राकृतिक संसाधनों के प्रश्न में केवल दर्शक नहीं हो सकते। विकास की कोई भी परियोजना तभी लोकतांत्रिक कहलाएगी जब उसमें स्थानीय समाज की सार्थक भागीदारी और न्यायपूर्ण पुनर्वास सुनिश्चित हो।


आज आवश्यकता किसी व्यक्ति या किसी एक कंपनी के विरुद्ध नारों की नहीं, बल्कि एक नए "संसाधन उत्तरदायित्व मॉडल" की है। प्रत्येक खनन परियोजना की सामाजिक ऑडिट हो; प्रत्येक खनिज पट्टे का आर्थिक मूल्य सार्वजनिक हो; रॉयल्टी, DMF और CSR की राशि का ग्रामसभा स्तर तक खुला लेखा-जोखा उपलब्ध कराया जाए; विस्थापित परिवारों को परियोजना के पूरे जीवनकाल में साझेदारी आधारित लाभ मिले; और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर संसद तथा विधानसभाओं में नियमित श्वेतपत्र प्रस्तुत किए जाएँ।


भारत की प्राकृतिक संपदा किसी सरकार की राजनीतिक पूँजी नहीं है और न ही किसी निजी संस्था की स्थायी जागीर। यह राष्ट्र की सामूहिक धरोहर है। लोकतंत्र का अर्थ यही है कि विकास का लाभ ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर तक पहुँचे।


यदि संसाधनों से समृद्ध प्रदेशों के नागरिक आज भी गरीबी, विस्थापन और असमानता से जूझ रहे हैं, तो प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, संवैधानिक भी है। लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी यही है कि वह अपने सबसे समृद्ध भूभाग के सबसे कमजोर नागरिक के जीवन में कितना परिवर्तन ला पाता है।


समय आ गया है कि भारत में संसाधनों की राजनीति नहीं, संसाधनों की जवाबदेही राष्ट्रीय विमर्श का विषय बने। जल, जंगल, जमीन और खनिज केवल आर्थिक परिसंपत्तियाँ नहीं हैं; वे आने वाली पीढ़ियों की साझी विरासत हैं। उनका उपयोग विकास के लिए हो, लेकिन विकास का अर्थ कुछ हाथों में संपदा का केंद्रीकरण नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों के जीवन में न्यायपूर्ण समृद्धि होना चाहिए। यही संविधान की भावना है, और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी मांग।