नागरिकता का संकट, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और ‘स्टेटलेसनेस’ की आशंका का सच
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
नागरिकता का संकट, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और ‘स्टेटलेसनेस’ की आशंका का सच
भारतीय लोकतंत्र और इसका संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमा, समानता और सुरक्षा की गारंटी देता है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया, वैश्विक मंचों और कुछ राजनीतिक विमर्शों में भारत के भीतर नागरिकता, सरकारी योजनाओं की पात्रता और प्रशासनिक कार्रवाइयों को लेकर अत्यधिक तीखी और चिंताजनक बहसें छिड़ी हैं। जब किसी लोकतांत्रिक समाज में 'अल्पसंख्यकों के अस्तित्व', 'नागरिक अधिकार छीनने' या 'संस्थागत उपेक्षा' जैसे अत्यंत गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो देश के सजग नागरिकों, न्यायपालिका और बुद्धिजीवियों का यह दायित्व बनता है कि वे इन दावों का संवैधानिक, विधिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में निष्पक्ष व तथ्यपरक विश्लेषण करें।
1. संवैधानिक और विधिक ढांचा: नागरिकता छीनने का सच क्या है?
भारतीय संविधान का भाग II (अनुच्छेद 5 से 11) और नागरिकता अधिनियम, 1955 भारत में नागरिकता के निर्धारण और उसकी समाप्ति को विनियमित करते हैं।
* कानूनी वस्तुस्थिति: भारत के विधिक ढांचे के तहत किसी भी वैध भारतीय नागरिक की नागरिकता को बिना किसी ठोस कानूनी प्रक्रिया के महज प्रशासनिक आदेश या राजनीतिक बयानों के आधार पर नहीं छीना जा सकता।
* वोटर लिस्ट से नाम कटना बनाम नागरिकता: मतदाता सूची (Voter List) में नाम का न होना या तकनीकी कारणों से नाम कट जाना एक प्रशासनिक प्रक्रियागत त्रुटि या संशोधन का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ कानूनी रूप से 'नागरिकता का अंत' या 'विदेशी घोषित होना' कतई नहीं है।
* योजनाओं का लाभ और विधिक संरक्षण: भारत का संविधान (विशेषकर अनुच्छेद 14 और 21) देश के भीतर रह रहे हर व्यक्ति (चाहे वह नागरिक हो या गैर-नागरिक) को कानून के समक्ष समानता और जीवन की सुरक्षा का अधिकार देता है। किसी भी राज्य सरकार या मुख्यमंत्री का यह अधिकार नहीं है कि वह मनमाने ढंग से किसी व्यक्ति को पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस या उसकी वैध निजी संपत्ति से सिर्फ इसलिए वंचित कर दे क्योंकि उसका नाम मतदाता सूची में नहीं है। ऐसे किसी भी असंवैधानिक कदम को देश की उच्च अदालतें पहली ही नजर में खारिज करने की विधिक शक्ति रखती हैं।
2. न्यायपालिका और जनहित याचिकाओं (PIL) का सिद्धांत
जब अदालतों द्वारा कुछ याचिकाओं पर 'लोकस स्टैंडाई' (Locus Standi - याचिकाकर्ता का मामले से सीधा संबंध) के अभाव में विचार करने से इनकार किया जाता है, तो उसे 'अदालतों द्वारा नागरिकों को न बचाना' कहना न्यायिक प्रक्रिया की अधूरी समझ को दर्शाता है।
# विधिक विमर्श: भारतीय न्यायपालिका ने हमेशा नागरिक अधिकारों की रक्षा की है। यदि कोई जनहित याचिका तकनीकी आधार पर खारिज होती है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि पीड़ित व्यक्ति के लिए रास्ते बंद हो गए हैं। जो व्यक्ति सीधे तौर पर प्रभावित है, वह अनुच्छेद 226 या अनुच्छेद 32 के तहत सीधे न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। भारतीय न्यायप्रणाली इतनी कमजोर नहीं है कि वह किसी भी सरकार को अपने नागरिकों के मौलिक अधिकारों का खुलेआम दमन करने की छूट दे।
3. सामाजिक परिप्रेक्ष्य: भय का मनोविज्ञान बनाम जमीनी हकीकत
जर्मनी के नाजी शासन या ऐतिहासिक जनसंहारों से आज के भारत की तुलना करना एक अत्यधिक अतिरंजित (Exaggerated) और भयावह विमर्श पैदा करने की कोशिश है। लोकतंत्र में आलोचना और सरकार की नीतियों का विरोध करना एक वैध अधिकार है, लेकिन तथ्यों से परे जाकर समाज में सामूहिक असुरक्षा और 'नस्लीय सफाए' जैसी अफवाहें फैलाना सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करता है।
* बुलडोजर कार्रवाई और पूंजीपति विमर्श: विभिन्न राज्यों में अवैध संपत्तियों या दंगों के आरोपियों के खिलाफ 'बुलडोजर कार्रवाई' पर न्यायपालिका ने स्वतः संज्ञान लिया है और इसके लिए सख्त दिशा-निर्देश (Guidelines) तय किए हैं। कानून के शासन (Rule of Law) में किसी भी सरकार को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया (Due Process of Law) के किसी का घर गिराने या जमीन जब्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
* अंतरराष्ट्रीय मंचों की भूमिका: संयुक्त राष्ट्र (UN) के विशेष दूतों (Rapporteurs) द्वारा मानवाधिकारों या नागरिकता के मुद्दों पर देशों से स्पष्टीकरण मांगना एक वैश्विक कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। भारत एक संप्रभु राष्ट्र है, जो अपनी आंतरिक समस्याओं को सुलझाने के लिए अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं और संसद के प्रति जवाबदेह है।
## अति-उत्साह और अति-भय दोनों घातक
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत इसकी बहुलतावादी संस्कृति और मजबूत संस्थाएं हैं। सरकार की नीतियों, एनआरसी (NRC) या प्रशासनिक त्रुटियों पर सवाल उठाना न केवल जायज है, बल्कि एक जीवंत लोकतंत्र के लिए आवश्यक भी है। लेकिन इन बहसों को 'जनसंहार' या 'आधिकारिक नागरिकता हरण' जैसे अतिवादी शब्दों से जोड़ना विमर्श को भटका देता है। देश के अल्पसंख्यकों और प्रत्येक नागरिक के अधिकार सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी जितनी सरकार की है, उतनी ही जिम्मेदारी न्यायपालिका और सजग विपक्ष की भी है।
"आलोचना लोकतंत्र की संजीवनी है, लेकिन भय और अफवाहों का अतिवाद उस बुनियाद को ही कमजोर करता है जिस पर हमारे अधिकार टिके हैं।"
