जय श्रीमन्नारायण "मोहिनी लीला: जब शिव भी शरणागत बने – भगवान की माया और भक्ति की परीक्षा"
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जय श्रीमन्नारायण
"मोहिनी लीला: जब शिव भी शरणागत बने – भगवान की माया और भक्ति की परीक्षा"
जब अनादि, अनंत, सर्वज्ञ और संन्यासी रूप शिव भी भगवान नारायण की मोहिनी माया में मोहित हो जाएँ, तो यह घटना केवल एक पुरातन पौराणिक कथा नहीं रह जाती, बल्कि यह मानव चेतना की सबसे गूढ़ आध्यात्मिक परीक्षा का रूप ले लेती है। यह कथा केवल शिव और नारायण की नहीं है—यह हमारी, आपके, हर साधक की कथा है, जो माया के द्वार पर खड़ा है, भीतर श्रीहरि हैं, बाहर मोहिनी।
1. शिव की जिज्ञासा: अनादि का अद्वैत से प्रश्न
शिवजी, जो स्वयं पूर्ण ज्ञानस्वरूप हैं, जिनके शीश पर ज्ञानगंगा बहती है, जिनका वाहन नंदी 'धैर्य' का प्रतीक है, जिनकी दासी 'बुद्धि' रूप पार्वती है—वे भगवान विष्णु से कहते हैं, “मैंने आपके सभी अवतार देखे हैं, पर इस मोहिनी रूप को देखने की इच्छा है।”
यह कोई साधारण इच्छा नहीं, यह पूर्ण ज्ञान के द्वारा लीला के रहस्य में प्रवेश करने की प्यास है। शिव कोई विषयासक्त जीव नहीं, वे परम तपस्वी हैं, कामदहनकर्ता हैं, परन्तु जब वे भी इस मोह के रहस्य को जानना चाहें, तो समझना चाहिए कि यह कोई सांसारिक इच्छा नहीं, यह लीला का आध्यात्मिक अन्वेषण है।
प्रभु उत्तर देते हैं— “आपने तो काम को भस्म कर दिया था, फिर यह मोह कैसा?”
शिव उत्तर देते हैं— “मैं जानना चाहता हूँ कि वह कौन-सी माया है, जो आपकी इच्छा से रूप धारण कर सकती है और समस्त ब्रह्मांड को मोहित कर सकती है।”
2. भगवान की लीला: माया की परीक्षा भूमि
एक दिव्य उद्यान रचा गया। वहाँ पुष्पगुच्छों से खेलती हुई एक अपूर्व रूपवती युवती थी। शिवजी ने जैसे ही उस रूप को देखा, वे पार्वती की उपस्थिति भी भूल गए।
यहीं आता है लीला का रहस्य — क्या शिव मोहग्रस्त हुए? या वे जान-बूझकर उस माया में प्रविष्ट हुए, जिससे वह लोकशिक्षा दे सकें?
उत्तर यह है कि शिव स्वयं माया से परे हैं, पर वे मनुष्य को दिखाना चाहते हैं कि “दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।”
3. देहभान का विस्मरण: दर्शन से मिलन तक की यात्रा
माया ने शिवजी को ऐसा मोहित किया कि देह का भान जाता रहा।
शिव सोचने लगे—“जब केवल दर्शन से इतना आनंद मिल रहा है, तो मिलन कितना माधुर्यपूर्ण होगा!”
यही भक्ति का उत्कर्ष है—जहाँ साधक को प्रभु की झलक ही समाधि में पहुँचा देती है।
शिवजी उस मोहिनी रूप की ओर प्रेमातुर होकर दौड़ पड़े। पर जैसे ही उन्होंने आलिंगन करना चाहा, वहाँ चतुर्भुज नारायण प्रकट हो गए।
यह दृश्य स्वयं में अद्वैत का उद्घोष है — हरि और हर एक ही हैं। पर जब हर, हरि की माया के आगे नतमस्तक होते हैं, तो यह समस्त सृष्टि को एक गहन चेतावनी देता है।
4. माया का रहस्य: कौन पार कर सकता है?
शिवजी कैलाश पर ऋषियों को उपदेश देते हैं— “मेरे श्रीकृष्ण की माया बहुत बलवती है। इससे कोई नहीं बच सकता यदि वह हरि की शरण में न हो।”
* मन पर कभी भरोसा मत करना।
* मैं जितेन्द्रिय हूँ, ऐसा गर्व मत करना।
* विषय वासना मन में सूक्ष्म रूप से छिपी रहती है।
* माया का पर्दा केवल कृष्णमय हो जाने से हटता है।
यह कोई धर्मोपदेश नहीं, यह एक अनुभवजन्य सत्य है—शिव के अनुभव से निकला हुआ।
5. कलियुग की चेतावनी: मनुष्य के लिए मार्ग एक ही है
शिव आगे कहते हैं— “बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी भटक गए थे, फिर कलियुग में मनुष्य तो ‘काम का कीड़ा’ है। उसके लिए हरि-स्मरण और हरि-कीर्तन ही एकमात्र रक्षा है।”
यह लीला केवल माया की शक्ति नहीं दिखाती, यह हरि-शरण की अपरिहार्यता को सिद्ध करती है। ‘दैवी माया’ से केवल ‘दैविक स्मरण’ से ही पार हुआ जा सकता है। ज्ञान, योग, तप, व्रत – ये सभी तब तक अधूरे हैं, जब तक वे कृष्णमय न हो जाएँ।
6. लीला का तात्त्विक रहस्य:
यह मोहिनी लीला हमें सिखाती है कि—
* भगवत माया केवल देखने की वस्तु नहीं, समर्पण से पार होने वाली शक्ति है।
* शिव जैसे पूर्ण ज्ञानस्वरूप भी लीला में उतरकर हमें दिखाते हैं कि ‘गर्व’ नहीं, ‘शरण’ ही मुक्तिपथ है।
* माया मोहिनि है, पर हरि माया के स्वामी हैं।
* प्रेम, भक्ति, और कृष्णमयता ही माया के तंतु काट सकते हैं।
जब शिव जैसे महायोगी भी हरि की माया के सामने नतमस्तक होते हैं, तब यह हमारे लिए एक अंतिम संदेश है— “हरिस्मरण ही माया का परिहार है।”
जय श्रीहरिः । जय श्रीकृष्ण । हर हर महादेव।
