सत्ता की परीक्षा, छात्रों की अग्निपरीक्षा
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
सत्ता की परीक्षा, छात्रों की अग्निपरीक्षा
भारत का लोकतंत्र केवल मतदान से नहीं, उत्तरदायित्व से चलता है। जब सड़क पर खड़ा छात्र यह पूछे कि उसकी मेहनत का हिसाब कौन देगा, तब सरकार का सबसे बड़ा कर्तव्य होता है—सुनना, समझना और जवाब देना। लेकिन जब उत्तर के स्थान पर टालमटोल, प्रतीकात्मक घोषणाएँ और राजनीतिक आडंबर सामने आएँ, तब प्रश्न केवल एक आंदोलन का नहीं रहता; प्रश्न शासन की संवैधानिक विश्वसनीयता का बन जाता है।
जंतर-मंतर पर चल रहा छात्र आंदोलन इसी गहरे संकट की अभिव्यक्ति है। यह कोई क्षणिक असंतोष नहीं है। यह उस पीढ़ी का आक्रोश है, जिसने अपने भविष्य को परीक्षा-व्यवस्था, संस्थागत ईमानदारी और प्रशासनिक निष्पक्षता के भरोसे छोड़ा था, और जिसे बदले में संदेह, असमानता और अपमान मिला। छात्र सड़क पर इसलिए नहीं उतरे कि उन्हें राजनीति करनी थी; वे इसलिए उतरे क्योंकि उनके पास अब और चुप रहने की गुंजाइश नहीं बची।
आज दोपहर केंद्रीय नेतृत्व और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत हुई। यह तथ्य अपने-आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोकतंत्र में संवाद ही तनाव का सबसे बड़ा उपचार होता है। लेकिन संवाद तभी अर्थवान होता है, जब वह औपचारिकता नहीं, समाधान की दिशा में बढ़े। यदि बातचीत केवल समय खरीदने का माध्यम बन जाए, तो वह समझौता नहीं, संकट-प्रबंधन बन जाती है।
छात्र प्रतिनिधियों ने तीन बातें स्पष्ट रखीं—शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी तय हो, आंदोलन के दौरान टूटे भरोसे की मरम्मत के लिए ठोस मुआवजा और नैतिक स्वीकारोक्ति हो, तथा आंदोलन के संदर्भ में हुई दमनात्मक कार्रवाइयों की निष्पक्ष समीक्षा हो। ये तीनों मांगें किसी एक दल की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा के लिए हैं। कोई भी सरकार, चाहे वह कितनी ही मजबूत क्यों न हो, तब तक स्थिर नहीं कही जा सकती, जब तक वह युवाओं के प्रश्नों का सम्मानपूर्वक उत्तर न दे।
यह पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पक्ष है—राज्य और छात्र के संबंध में विश्वास का टूटना। लोकतंत्र में छात्र-आंदोलन अस्वाभाविक नहीं, बल्कि आवश्यक चेतावनी है। इतिहास गवाह है कि विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और युवा आंदोलनों ने अनेक बार समाज को उसकी संवेदनशीलता लौटाई है। छात्र जब व्यवस्था से उत्तर माँगते हैं, तो वे राष्ट्र-विरोध नहीं करते; वे राष्ट्र को उसके आदर्शों के करीब लाने की कोशिश करते हैं।
सवाल यह भी है कि क्या सरकार इस संकट को केवल कानून-व्यवस्था की दृष्टि से देख रही है, या उसे शिक्षा-प्रशासन, संवैधानिक दायित्व और सामाजिक विश्वास के संकट के रूप में समझ रही है? यदि आंदोलनरत छात्रों के प्रति बल प्रयोग, कठोर भाषा और अवमाननापूर्ण रवैया अपनाया गया है, तो यह केवल राजनीतिक भूल नहीं, संवैधानिक चूक भी है। राज्य की शक्ति का प्रयोग सुरक्षा के लिए होता है, भय के लिए नहीं। बल का उपयोग अनुशासन के लिए होता है, अपमान के लिए नहीं।
शिक्षा व्यवस्था का संकट भारत में नया नहीं है, लेकिन उसका राजनीतिक बोझ आज पहले से अधिक भारी है। परीक्षा, भर्ती और प्रवेश—इन तीनों क्षेत्रों में बार-बार उठे प्रश्नों ने करोड़ों युवाओं के मन में यह आशंका बैठा दी है कि उनकी मेहनत कहीं किसी तंत्र की लापरवाही या मिलीभगत की भेंट न चढ़ जाए। यही आशंका जब आंदोलन में बदलती है, तब सरकार के सामने सबसे बड़ा परीक्षण यह होता है कि वह इसे दबाती है या सुधार का अवसर बनाती है।
सत्ता को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि केवल बैठकों और अल्पकालिक घोषणाओं से संकट शांत हो जाएगा। छात्र आज सजग हैं, राजनीतिक रूप से भी, और नैतिक रूप से भी। वे समझते हैं कि जब तक जिम्मेदारी का चेहरा स्पष्ट नहीं होगा, तब तक कोई भी घोषणा अधूरी रहेगी। यदि सरकार वास्तव में समाधान चाहती है, तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि समस्या केवल परिणामों की नहीं, प्रक्रिया की भी है; केवल परीक्षा की नहीं, भरोसे की भी है; केवल आंदोलन की नहीं, शासन-संस्कृति की भी है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण बिंदु है—राजनीतिक नेतृत्व का अहंकार। लोकतंत्र में अहंकार अक्सर संकट को बढ़ाता है, समाधान नहीं देता। जो सरकारें प्रश्नों को चुनौती समझती हैं, वे संवाद को देर से शुरू करती हैं और फिर आंदोलन को तीखा पाती हैं। इसके विपरीत, जो सरकारें समय रहते जिम्मेदारी लेती हैं, वे केवल टकराव टालती नहीं, संस्थाओं को भी मजबूत बनाती हैं।
आज की स्थिति में सरकार के सामने विकल्प स्पष्ट है। वह इस आंदोलन को प्रशासनिक समस्या मानकर आगे खिसका सकती है, या इसे लोकतांत्रिक आत्मपरीक्षण का अवसर बना सकती है। पहला रास्ता सुविधा का है, दूसरा रास्ता उत्तरदायित्व का। पहला रास्ता तात्कालिक शांति दे सकता है, दूसरा रास्ता स्थायी विश्वास। और लोकतंत्र में स्थायी विश्वास ही सबसे बड़ी पूँजी होता है।
यदि आने वाले घंटों में सरकार ने छात्रों की बात सुनकर, उनकी गरिमा को मानकर और उनके प्रश्नों का ठोस उत्तर देकर कदम नहीं उठाया, तो यह असंतोष केवल एक परिसर या एक चौक तक सीमित नहीं रहेगा। यह पूरे राजनीतिक तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल बन जाएगा। और जब युवा यह मानने लगें कि उनकी आवाज़ केवल भीड़ मानी जाती है, तब लोकतंत्र अपनी सबसे कीमती संपत्ति खोने लगता है—भरोसा।
इसलिए आज देश की अपेक्षा स्पष्ट है। सरकार को संवाद को औपचारिकता नहीं, नीति बनाना होगा। शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी, छात्रों के सम्मान की पुनर्स्थापना और बल प्रयोग के आरोपों की निष्पक्ष जांच—यही वे कदम हैं जो इस संकट को दिशा दे सकते हैं। अन्यथा यह आंदोलन किसी एक निर्णय के विरुद्ध नहीं, पूरी राजनीतिक शैली के विरुद्ध जनता की चेतावनी बन जाएगा।
"जब छात्र अपने भविष्य की सुरक्षा माँग रहे हों, तब सत्ता का सबसे बड़ा उत्तर ट्वीट नहीं, जवाबदेही होती है।"
