जन-आंदोलन, निष्पक्षता का पाखंड और 'उत्तर कोरियाई' राजनीति का आघात
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जन-आंदोलन, निष्पक्षता का पाखंड और 'उत्तर कोरियाई' राजनीति का आघात
# समाज का नैतिक संकट और राजनीति की मर्यादा
भारतीय लोकतंत्र आज सत्ता के दंभ से कहीं अधिक अपनी जन-चेतना के दोहरे मानदंडों से जूझ रहा है। संकट केवल सत्ता में बैठे लोगों या उनके आक्रामक विरोधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि समस्या उन तथाकथित 'निष्पक्ष' नागरिकों और समर्थकों से है, जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में संघर्ष करने वालों के लिए नैतिकता के ऐसे तराजू तय कर दिए हैं जिन पर कोई खरा नहीं उतर सकता। सोनम वांगचुक जैसे विचारकों और कार्यकर्ताओं के लंबे अनशन, त्याग और सत्याग्रह को जिस तरह राजनीतिक विश्लेषणात्मक षड्यंत्रों, समझौतों और 'डील्स' के संकीर्ण चश्मे से देखा जा रहा है, वह यह बताने के लिए काफ़ी है कि एक समाज के तौर पर हमारी संवेदनाएँ कितनी बंजर हो चुकी हैं।
1. सोनम वांगचुक और 'डील्स' का विकृत आख्यान
लद्दाख की स्वायत्तता और पर्यावरण की रक्षा के लिए भीषण धूप, गर्मी और सड़क किनारे हफ़्तों भूखा रहकर अनशन करने वाले व्यक्ति पर जब किसी सत्ताधारी नेता (जैसे जेपी नड्डा) के हाथों जूस पीकर अनशन तोड़ने मात्र से 'समझौते' का ठप्पा लगा दिया जाता है, तो यह हमारी वैचारिक जल्दबाज़ी और मानसिक नीचता को उजागर करता है।
"सोनम वांगचुक के शब्दों में छिपे उस दर्द और आक्रोश को महसूस करने की ज़रूरत है, जब वे पूछते हैं कि क्या एसी कमरों को छोड़कर भीषण गर्मी में सड़क किनारे भूखे रहकर 'डील्स' की जाती हैं? क्या एक सत्याग्रही से ऐसी पारदर्शिता और निष्पक्षता की उम्मीद की जानी चाहिए जो किसी भी जीवित मनुष्य के लिए संभव ही नहीं है?"
जो लोग बिना ज़मीनी हक़ीक़त जाने, बिना 22 मिनट के उनके उस बयान को सुने, केवल अनुमानों के आधार पर आलोचना का बाज़ार सजाते हैं, वे और सत्ता का अनर्गल गुणगान करने वाले चाटुकार—दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। किसी भी व्यक्ति के जोखिम, कष्ट और त्याग का सम्मान किए बिना उसे ख़ारिज कर देना उस नागरिक चेतना पर धब्बा है, जो दिल्ली के सत्ता-गलियारों को 'उत्तर कोरिया' जैसी संवेदनहीन बना रही है।
2. निष्पक्षता का पाखंड और राजनीति का गिरता स्तर
यही विसंगति देश की मुख्यधारा राजनीति में भी साफ़ दिखाई देती है। आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की आलोचना में पूरा मीडिया और समर्थकों का धड़ा दिन-रात जुटा रहता है—यह सवाल उठाते हुए कि उन्होंने किसे बढ़ावा दिया और किसे नहीं। लेकिन जब सत्ताधारी दल (भाजपा) की बात आती है, तो उसकी रणनीति पर चुप्पी साध ली जाती है कि उसके यहाँ हर तरह के नेताओं और राजनीतिक अवसरवादिता का स्वागत है।
* वैकल्पिक राजनीति का संघर्ष: राहुल गांधी जिस तरह की वैचारिक और सैद्धांतिक राजनीति का प्रयास कर रहे हैं, वह पार पारंपरिक चुनावी दांव-पेचों से अलग हो सकती है। लोग चाहते हैं कि वे केवल सत्ता पाने के लिए वही सब करें जो चुनाव जीतने की मशीनरी करती है। लेकिन जो प्रयास सत्ता के मोह से परे हटकर जन-सरोकारों से जुड़ने का है, उसकी सराहना न सही, तो कम से कम बिना सोचे-समझे नीचा दिखाने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।
* काम करने की स्वतंत्रता: हर व्यक्ति का अपना तरीका, अपनी प्राथमिकता और अपना दृष्टिकोण होता है। यदि आप स्वयं सड़कों पर उतरकर जोखिम उठाने का साहस नहीं रखते, तो जो व्यक्ति अपने तरीके से संघर्ष कर रहा है, उसकी नीयत पर सवाल उठाने से पहले सौ बार सोचना चाहिए।
3. 'अच्छे लोगों' का राजनीति से पलायन: भविष्य का ख़तरा
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे डरावना और दूरगामी पहलू यह है कि यदि समाज और समर्थकों का रवैया इतना अनुदार और पूर्वाग्रही रहा, तो देश के संवेदनशील और अच्छे लोग सार्वजनिक जीवन और राजनीति से पूरी तरह किनारा कर लेंगे।
* स्वतंत्र विचारों का दमन: यदि किसी पार्टी द्वारा किसी बुद्धिजीवी या सामाजिक कार्यकर्ता को संसद (राज्यसभा) भेजा भी जाएगा, तो वे केवल पार्टी लाइन तक सीमित होकर रह जाएँगे। देश को उनकी स्वतंत्र सोच, ईमानदारी और अच्छाई का लाभ कभी नहीं मिल सकेगा।
* वोट और सत्ता का विरोधाभास: हमारे राजनीतिक तंत्र की त्रासदी यह है कि 'अच्छे लोगों' को सत्ता तो रोकती ही है, आम जनता भी उन्हें वोट नहीं देती। और जो थोड़े-बहुत समर्थक बचते हैं, वे उनसे ऐसी अलौकिक पवित्रता की उम्मीद करते हैं जो व्यावहारिक राजनीति में संभव नहीं है।
## प्रतिनिधि बदलने से पहले नागरिक को बदलना होगा
देश और समाज किसी एक नेता या दल से नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले नागरिकों की सामूहिक चेतना से बनते हैं। सत्ता में बैठे प्रतिनिधि उसी जनता का प्रतिबिंब हैं, जिसमें आप और हम शामिल हैं। यदि हम अपने भीतर हमदर्दी, संवेदना और तर्कसंगत सोच को जगह नहीं देंगे, तो हमारा प्रतिनिधित्व करने वाले चेहरे भी कभी नहीं बदलेंगे।
सोनम वांगचुक का यह सवाल पूरे देश के विवेक पर एक करारा तमाचा है कि आखिर हम कैसे समाज में तब्दील होते जा रहे हैं, जहाँ संघर्ष करने वालों के लिए हमारे दिलों में रहम और सम्मान के बजाय सिर्फ़ शक और नीच ख़याल उपजते हैं? समय आ गया है कि हम बिना जाने-समझे न्यायधीश बनने की जल्दबाज़ी छोड़ें, अपने भीतर की संवेदना को जगाएँ और सत्ता के सम्मोहन व निष्पक्षता के पाखंड से बाहर निकलकर सत्य का साथ दें।
