शिक्षा मंत्रालय की कुर्सी नहीं, शिक्षा-तंत्र का भरोसा दाँव पर है

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला

शिक्षा मंत्रालय की कुर्सी नहीं, शिक्षा-तंत्र का भरोसा दाँव पर है

किसी भी लोकतंत्र में शिक्षा मंत्रालय केवल एक प्रशासनिक विभाग नहीं होता। वह राष्ट्र के भविष्य का संवाहक होता है, सामाजिक गतिशीलता का माध्यम होता है और उन करोड़ों परिवारों की उम्मीदों का केंद्र होता है जो अपने बच्चों को केवल नौकरी के लिए नहीं, जीवन में सम्मानजनक नागरिक बनने के लिए पढ़ाते हैं। इसलिए जब शिक्षा मंत्रालय से जुड़े विवाद बार-बार सामने आते हैं, जब परीक्षा-प्रणाली पर सवाल उठते हैं, जब विश्वविद्यालयों के वातावरण में असुरक्षा, अनिश्चितता और अविश्वास बढ़ता है, तब बहस केवल किसी एक मंत्री की दक्षता या अक्षमता तक सीमित नहीं रह सकती। वह बहस राज्य की प्राथमिकताओं, शासन की दृष्टि और सार्वजनिक शिक्षा के भविष्य पर होनी चाहिए।

हालिया छात्र आंदोलन और उसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा इसी व्यापक विमर्श का तात्कालिक राजनीतिक परिणाम है। लेकिन यह मान लेना कि किसी एक इस्तीफ़े से संकट समाप्त हो गया, सरासर भूल होगी। असली प्रश्न यह है कि पिछले एक दशक में शिक्षा मंत्रालय ने कौन-सा रास्ता चुना, उस रास्ते में छात्रों, शिक्षकों और संस्थानों की भूमिका क्या रही, और क्या सरकार ने शिक्षा को एक सार्वजनिक निवेश की तरह देखा या उसे एक प्रबंधनीय, नियंत्रित और कभी-कभी बाज़ारीकृत क्षेत्र की तरह?

मोदी सरकार के दौरान शिक्षा मंत्रालय की कमान चार अलग-अलग मंत्रियों के हाथों में रही। स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और धर्मेंद्र प्रधान—इन चारों के कार्यकाल अलग-अलग रहे, लेकिन एक साझा धुरी साफ़ दिखाई देती है: शिक्षा को लेकर दृष्टि का निरंतर केंद्रीकरण, संस्थागत स्वायत्तता पर बढ़ता दबाव, और सार्वजनिक बहस में परीक्षा, पाठ्यक्रम, भाषा, इतिहास-बोध तथा विश्वविद्यालयों की भूमिका को लेकर तीखे वैचारिक संघर्ष।


यह सच है कि किसी भी सरकार के समय शिक्षा व्यवस्था में बहसें होती हैं, विवाद होते हैं, और सुधार भी किए जाते हैं। लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि बहस हुई या नहीं। प्रश्न यह है कि बहस किस दिशा में ले जाई गई। क्या शिक्षा का उद्देश्य व्यापक, समावेशी, वैज्ञानिक और संवैधानिक हुआ? या उसे वैचारिक अनुकूलन, प्रशासनिक नियंत्रण और राजनीतिक संदेश-प्रेषण का उपकरण बना दिया गया? यही वह बिंदु है जहाँ आज की समीक्षा अनिवार्य हो जाती है।


एक विश्वविद्यालय में यदि उत्कृष्ट लाइब्रेरी हो, पढ़ने का समृद्ध माहौल हो, डिजिटल संसाधन हों, छात्र अध्ययनरत हों, तो शिक्षा मंत्री से अपेक्षा यह होती है कि वह ऐसे संस्थान को और सक्षम बनाए। वहाँ नए शोध-कोष, बेहतर छात्रवृत्ति, अधिक शिक्षक, उन्नत प्रयोगशालाएँ, बेहतर आवासीय सुविधाएँ और पाठ्यक्रम-समर्थन की आवश्यकता देखी जाए। यदि मंत्री की दृष्टि वहाँ रेस्टोरेंट तक सिमट जाए, तो यह केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरी शासन-दृष्टि का प्रतीक बन जाती है। सार्वजनिक शिक्षा का परिसर भोजनालय नहीं, बौद्धिक निर्माण का स्थल है। राज्य का काम वहाँ उपभोग नहीं, अध्ययन को बढ़ावा देना है।


इसी तरह, परीक्षा-प्रणाली का प्रश्न केवल तकनीकी नहीं है। भारत जैसे देश में जहाँ करोड़ों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं पर अपना भविष्य टिका देते हैं, वहाँ परीक्षा का निष्पक्ष होना सामाजिक न्याय का मूल प्रश्न बन जाता है। नीट, जेईई और अन्य राष्ट्रीय परीक्षाओं को लेकर बार-बार उठे विवाद इस बात का संकेत हैं कि समस्या केवल किसी एक पेपर-लीक या किसी एक भर्ती-अनियमितता की नहीं है। समस्या एक ऐसी प्रणाली की है जिसमें युवा अपनी मेहनत को सुरक्षित महसूस नहीं करते। जब परीक्षा का भरोसा टूटता है, तो केवल एक परीक्षा नहीं टूटती; परिवारों का विश्वास, सामाजिक गतिशीलता और राष्ट्र की प्रतिभा-व्यवस्था टूटती है।


इसलिए जब छात्र सड़क पर उतरते हैं, भूख हड़ताल करते हैं, जंतर-मंतर पर बैठते हैं, और मंत्रियों से जवाब माँगते हैं, तो यह किसी एक राजनीतिक संगठन का शोर नहीं, बल्कि एक पीढ़ी की बेचैनी का सार्वजनिक रूप है। ऐसे समय में सरकार का कर्तव्य केवल संवाद करना नहीं, बल्कि आत्मपरीक्षण करना होता है। क्या उसने विश्वविद्यालयों के साथ न्याय किया? क्या उसने सार्वजनिक शिक्षा में पर्याप्त निवेश किया? क्या उसने परीक्षा-तंत्र की विश्वसनीयता बनाए रखी? क्या उसने राज्यों के साथ संघीय संतुलन को सम्मान दिया? क्या उसने शिक्षा को “नीति” की जगह “नैरेटिव” बनाने की कोशिश की?


एक और गंभीर प्रश्न शिक्षा के बजट का है। यदि पिछले वर्षों में शिक्षा मंत्रालय की हिस्सेदारी घटती रही, तो यह केवल वित्तीय आंकड़ा नहीं, प्राथमिकताओं का बयान है। कोई भी सरकार अपने संसाधन वहीं लगाती है जहाँ उसकी प्रतिबद्धता होती है। शिक्षा पर कम खर्च, विश्वविद्यालयों पर दबाव, शिक्षक-संख्या का अपर्याप्त विस्तार, शोध-अनुदान की कमी और सार्वजनिक संस्थानों में बढ़ती अनिश्चितता—ये सब मिलकर एक ही तस्वीर बनाते हैं: राज्य अपनी सबसे महत्वपूर्ण पूँजी, यानी युवाओं, में अपेक्षित निवेश नहीं कर रहा।


शिक्षा मंत्रालय की राजनीतिक संवेदनशीलता इस कारण भी अधिक रही है कि यह मंत्रालय केवल प्रशासन नहीं, विचारधारा से भी जुड़ा रहा है। आलोचकों का यह कहना कि इन वर्षों में सुधार से अधिक वैचारिक दिशा-निर्धारण पर बल रहा, पूरी तरह अनदेखा नहीं किया जा सकता। पाठ्यक्रम, इतिहास-पाठ, भाषाई नीति, विश्वविद्यालयों की नेतृत्व-नियुक्तियाँ और कैंपस की बहसें—इन सबमें यह प्रश्न बार-बार उठा कि क्या शिक्षा स्वतंत्र विवेक के लिए है या सांस्कृतिक-राजनीतिक अनुरूपता के लिए। एक लोकतांत्रिक राज्य में शिक्षा का कार्य नागरिक बनाना है, अनुयायी नहीं।


इसी संदर्भ में केंद्र और राज्य के बीच तनाव भी महत्वपूर्ण है। विशेषकर भाषा, पाठ्यचर्या और तीन-भाषा सूत्र जैसे प्रश्न केवल तकनीकी विवाद नहीं हैं। वे संवैधानिक संघवाद की परीक्षा हैं। भारत की शिक्षा व्यवस्था तभी स्वस्थ रह सकती है जब केंद्र राष्ट्रीय मानकों को सुनिश्चित करे, लेकिन राज्यों की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता का सम्मान भी करे। शिक्षा का उद्देश्य एकरूपता थोपना नहीं, विविधता के भीतर समान अवसर सुनिश्चित करना है।


धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा इस बड़े संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वह किसी एक व्यक्ति की विफलता का अंतिम अध्याय नहीं, बल्कि एक लंबे दौर के असंतोष का राजनीतिक निष्कर्ष है। यह भी सच है कि किसी मंत्री को केवल एक आंदोलन के कारण हटाना पर्याप्त समाधान नहीं होता। यदि संरचनाएँ जस की तस रहें, यदि परीक्षा-प्रणाली में पारदर्शिता न आए, यदि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता सुरक्षित न हो, यदि शिक्षा बजट में पर्याप्त वृद्धि न हो, तो अगला मंत्री भी उसी संकट में फँसेगा।


यही कारण है कि अब आवश्यकता केवल मंत्री बदलने की नहीं, नीति बदलने की है। शिक्षा मंत्रालय को एक बार फिर राष्ट्र-निर्माण के मंत्रालय के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि वैचारिक प्रयोगशाला या राजनीतिक प्रबंधन इकाई के रूप में। उसे यह समझना होगा कि भारत के युवा केवल उपदेश नहीं चाहते; वे निष्पक्षता, अवसर, सुरक्षा और सम्मान चाहते हैं। वे यह नहीं चाहते कि उनकी मेहनत किसी प्रशासनिक चूक, बाज़ारवादी दबाव या राजनीतिक प्राथमिकता की भेंट चढ़ जाए।


आज का मूल प्रश्न बहुत सीधा है: क्या भारत अपनी शिक्षा प्रणाली को ऐसा बनाएगा जहाँ गरीब, ग्रामीण, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और मध्यमवर्गीय छात्र समान अवसर पा सकें? क्या संस्थानों को इतनी शक्ति और स्वायत्तता मिलेगी कि वे ज्ञान के केंद्र बने रहें? क्या परीक्षाएँ भरोसेमंद होंगी? क्या विश्वविद्यालय विचार के खुले स्थल बने रहेंगे? क्या शिक्षा का सार्वजनिक चरित्र बचाया जाएगा? यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक नहीं है, तो किसी भी मंत्री का इस्तीफ़ा केवल राजनीतिक तात्कालिकता बनकर रह जाएगा।


देश को आज एक नए घोषणापत्र से अधिक, एक नए शैक्षिक अनुशासन की आवश्यकता है—ऐसा अनुशासन जिसमें नीति का केंद्र छात्र हो, संस्थान का केंद्र ज्ञान हो, और राज्य का केंद्र जवाबदेही हो। शिक्षा मंत्रालय तभी अपना सम्मान वापस पा सकेगा जब वह सत्ता के दायरे से बाहर निकलकर भविष्य के निर्माण का मंत्रालय बनेगा।


"शिक्षा मंत्रालय की असली परीक्षा मंत्री की कुर्सी नहीं, राष्ट्र के युवाओं का भरोसा है; और यदि वही डगमगा जाए, तो कोई इस्तीफ़ा पर्याप्त नहीं होता।"