जहाँ शिक्षा सेवा नहीं, कारोबार बन जाए

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला

जहाँ शिक्षा सेवा नहीं, कारोबार बन जाए

किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसकी जनता होती है, और जनता की सबसे मूल्यवान संपत्ति उसका विश्वास। जब शासन-व्यवस्था शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, ऊर्जा, परिवहन और सार्वजनिक सेवाओं को राष्ट्र-निर्माण के उपकरण की तरह नहीं, बल्कि आय-स्रोत या बाज़ार-उत्पाद की तरह देखने लगे, तब केवल नीतियाँ नहीं बदलतीं—राज्य की आत्मा बदलने लगती है। यही वह बिंदु है जहाँ राष्ट्रहित और कारोबारी मानसिकता के बीच टकराव शुरू होता है।

एक विश्वविद्यालय का उदाहरण इस समय अत्यंत प्रतीकात्मक है। यदि किसी परिसर में उत्कृष्ट लाइब्रेरी हो, पर्याप्त पाठ्य-संसाधन हों, छात्र अध्ययनरत हों, डिजिटल सुविधाएँ उपलब्ध हों, और अकादमिक वातावरण जीवंत हो, तो एक शिक्षामंत्री से अपेक्षा यह होती है कि वह उस संस्थान को और मजबूत बनाने के उपाय सोचें—नए कोर्स, बेहतर शोध-सुविधाएँ, शिक्षक-भर्ती, छात्रवृत्ति, प्रयोगशालाएँ, ग्रंथालय-विस्तार, या वंचित छात्रों के लिए अतिरिक्त सहायता। लेकिन यदि किसी मंत्री की पहली प्रतिक्रिया यह हो कि वहाँ रेस्टोरेंट खोल दिया जाए, तो यह केवल एक हल्की-फुल्की टिप्पणी नहीं रहती; यह उस वैचारिक संकट का संकेत बन जाती है जिसमें शिक्षा को भी उपभोक्ता-सेवा मान लिया गया है।


यह सोच छोटी नहीं, खतरनाक है। क्योंकि जहाँ शिक्षा केंद्र में न होकर सुविधा-विक्रय केंद्र बन जाए, वहाँ विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिर कम और बाज़ार के आउटलेट अधिक प्रतीत होने लगते हैं। विश्वविद्यालय का उद्देश्य ग्राहकों को रिझाना नहीं, नागरिक तैयार करना है। उसका काम छात्रों को उपभोक्ता बनाना नहीं, विचारशील मनुष्य बनाना है। जब शासक-मानसिकता शिक्षा के परिसर में भी लाभ, आकर्षण और ब्रांडिंग की भाषा खोजने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि सार्वजनिक नीति में व्यापारिक दृष्टि घुस चुकी है।


यही स्थिति केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। जिस तरह सार्वजनिक सेवाओं में मिलावट, अनियमितता, मुनाफ़ाखोरी और निजीकरण का दबाव बढ़ा है, वह एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है। कभी मिलावटखोरी को अपराध माना जाता था। किसी पेट्रोल पंप पर यदि तेल में सॉल्वेंट मिलाने या मात्रा में गड़बड़ी का संदेह होता, तो कार्रवाई होती थी। सेवा की नैतिकता प्राथमिक थी। आज चिंता यह है कि कई क्षेत्रों में जनता को उत्पाद या सेवा से अधिक बिल, वैधता और शुल्क की जटिलताओं से सामना करना पड़ता है। रिचार्ज की वैधता, बढ़ती सेवा-शुल्क संरचना, घटती सार्वजनिक जवाबदेही—ये सब एक ऐसे तंत्र की ओर संकेत करते हैं जिसमें उपभोक्ता पहले नागरिक था, अब ग्राहक बनता जा रहा है।


यह परिवर्तन साधारण नहीं है। यह लोकतंत्र के भीतर एक धीमा संस्थागत क्षरण है। जब राज्य स्वयं को अनुशासनकर्ता के बजाय विक्रेता समझने लगता है, तब जनता का अधिकार धीरे-धीरे क्रय-विक्रय की भाषा में अनूदित होने लगता है। तब शिक्षा “सुविधा” बनती है, स्वास्थ्य “सेवा-उत्पाद” बनता है, सड़क “टोल-प्रणाली” बनती है और बिजली “बिलिंग मॉडल” बन जाती है। अंततः नागरिक यह पूछने को मजबूर होता है कि वह कर किसलिए दे रहा है—अधिकार के लिए, या पहले से महँगे बनाए गए अधिकार को फिर से खरीदने के लिए?


कोयला, बिजली और सार्वजनिक वितरण का उदाहरण भी इसी विमर्श का हिस्सा है। यदि राज्य किसी प्राकृतिक संसाधन को जनता के हित में नियंत्रित करता है, तो उद्देश्य सस्ती ऊर्जा, स्थिर आपूर्ति और व्यापक पहुँच होना चाहिए। लेकिन जब नीलामी, प्रीमियम, ठेके और राजस्व की भाषा हावी हो जाती है, तो सबसे पहला प्रश्न यह उठता है कि जनता को उसका प्रत्यक्ष लाभ कहाँ दिख रहा है। यदि लागत बढ़ती है, टोल बढ़ता है, बिजली महँगी होती है और सार्वजनिक लाभ अस्पष्ट रहता है, तो यह कहना कठिन हो जाता है कि व्यवस्था पारदर्शी ही है। यह तर्क केवल कीमत का नहीं, मूल्य का है। राष्ट्र को केवल पैसा नहीं, मूल्य भी बचाना होता है।


सड़कें हों, पानी हो, ऊर्जा हो, या शिक्षा—हर जगह यदि व्यवस्था की प्रेरणा सेवा के बजाय लाभ हो जाए, तो राज्य और बाजार का अंतर मिटने लगता है। और जब यह अंतर मिटता है, तब सबसे अधिक नुकसान गरीब, निम्न-मध्यमवर्ग और वह परिवार उठाते हैं जो सार्वजनिक संस्थानों पर अंतिम भरोसा करके अपने बच्चों को पढ़ाते हैं, अस्पताल ले जाते हैं, यात्रा करते हैं या परीक्षा देते हैं। उनके लिए बाज़ारीकरण केवल आर्थिक नीति नहीं, जीवन की असुरक्षा है।


यही संकट राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं और मेडिकल शिक्षा में भी दिखाई देता है। यदि कोई व्यवस्था लाखों छात्रों को एक ही परीक्षा के माध्यम से छाँटती है, तो उसका औचित्य तभी है जब वह निष्पक्ष, पारदर्शी, विश्वसनीय और सामाजिक न्याय के प्रति संवेदनशील हो। लेकिन जब परीक्षा-तंत्र पर बार-बार प्रश्न उठते हैं, पेपर लीक की घटनाएँ सामने आती हैं, और निजी कॉलेजों में सीटों की लागत इतनी ऊँची हो जाती है कि शिक्षा प्रतिभा का नहीं, खरीद-शक्ति का मामला बन जाए, तब यह पूछना आवश्यक हो जाता है कि क्या तंत्र वास्तव में समान अवसर दे रहा है या केवल प्रतियोगिता के नाम पर एक नया बाजार बना रहा है।


वन नेशन–वन एग्ज़ाम की अवधारणा अपने आप में अव्यावहारिक नहीं है। राष्ट्रव्यापी मानकीकृत परीक्षा का उद्देश्य समान मापदंड, तुलनात्मक न्याय और पारदर्शिता हो सकता है। लेकिन यदि प्रणाली का वास्तविक लाभ यह हो जाए कि वह निजी संस्थानों की सीटों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धा और अधिक भुगतान-सामर्थ्य पैदा करे, तो फिर उसके सार्वजनिक उद्देश्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। परीक्षा का उद्देश्य छात्रों को छाँटना नहीं, योग्यता की पहचान करना होना चाहिए। यदि योग्यता की पहचान बाजार-भाव से होने लगे, तो यह शिक्षा नहीं, नीलामी है।


यही वह जगह है जहाँ शासन की नीयत की परीक्षा होती है। क्या राज्य शिक्षा को सार्वजनिक निवेश मानता है, या उस क्षेत्र को भी कारोबारी लाभ के अवसर की तरह देखता है? क्या मंत्री का काम संस्थानों को मजबूत करना है, या उनके भीतर व्यावसायिक मॉडल तलाशना? क्या सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरी देखकर पहला प्रश्न यह होना चाहिए कि वहाँ रेस्टोरेंट कहाँ खुल सकता है, या यह कि शोध-संसाधन, छात्र-सुविधा और अकादमिक गुणवत्ता कैसे बढ़ाई जाए?


ऐसा नहीं है कि व्यापार अपने आप में बुरा है। व्यापार समाज की आर्थिक गतिशीलता का एक आवश्यक अंग है। समस्या तब शुरू होती है जब व्यापारिक मानसिकता सरकार में प्रवेश कर जाए और सार्वजनिक निर्णयों की भाषा बदल दे। तब नीति लाभ का हिसाब लगाने लगती है, सेवा का नहीं। तब नागरिक की जगह ग्राहक आ जाता है। तब अधिकारों को पैकेज में बदला जाने लगता है। और तब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग यह भूलने लगते हैं कि वे बाजार के प्रबंधक नहीं, लोकतंत्र के संरक्षक हैं।


आज आवश्यकता इस बात की है कि शासन-व्यवस्था फिर से सेवा-राज्य की अवधारणा की ओर लौटे। सार्वजनिक शिक्षा में निवेश बढ़े, मेडिकल और तकनीकी शिक्षा को महँगा व्यापार न बनने दिया जाए, परीक्षा-प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता बहाल की जाए, संसाधनों के वितरण में पारदर्शिता हो, और ऐसी नीतियों से बचा जाए जिनसे जनता को केवल लागत बढ़े और अधिकार घटें। राष्ट्र निर्माण के लिए सड़कें, अस्पताल, विश्वविद्यालय और ऊर्जा-व्यवस्था आवश्यक हैं; लेकिन उनसे भी अधिक आवश्यक यह है कि उनका संचालन जनता के पक्ष में हो, निजी लाभ के लिए नहीं।


किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल इस बात से नहीं होता कि उसने कितनी योजनाएँ शुरू कीं। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि उन योजनाओं से जनता को कितना वास्तविक लाभ मिला, संस्थाएँ कितनी मजबूत हुईं, और सार्वजनिक जीवन में कितनी ईमानदारी बची रही। यदि हर क्षेत्र में कारोबारी भाषा हावी हो जाए, तो विकास का शोर बढ़ सकता है, पर न्याय कम हो जाता है।


समय आ गया है कि हम यह सवाल स्पष्टता से पूछें: क्या राज्य जनता को बेहतर सेवा दे रहा है, या जनता से बार-बार वही चीज़ फिर से बेच रहा है जो उसका हक़ है?


"जहाँ शिक्षा रेस्टोरेंट में बदलने लगे, बिजली बिल में और सड़क टोल में, वहाँ समझ लीजिए कि विकास नहीं, सार्वजनिक जीवन का बाज़ारीकरण शुरू हो चुका है।"