संविधान, पारदर्शिता और संगठनात्मक शक्ति: RSS को लेकर उठे प्रश्नों की लोकतांत्रिक पड़ताल

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


संविधान, पारदर्शिता और संगठनात्मक शक्ति: RSS को लेकर उठे प्रश्नों की लोकतांत्रिक पड़ताल

कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खड़गे का मोहन भागवत को लिखा गया पत्र इस समय केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में जवाबदेही की बुनियादी बहस बन गया है। पत्र में उन्होंने RSS से उसके कानूनी दर्जे, पदाधिकारियों, दान-स्रोतों, आय-व्यय, कर-भुगतान, सार्वजनिक कार्यक्रमों की अनुमति और औपचारिक पंजीकरण के आधार जैसी जानकारियाँ सार्वजनिक करने को कहा। द इंडियन एक्सप्रेस और डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्टों के अनुसार, खड़गे ने यह तर्क भी रखा कि जो संगठन हज़ारों शाखाओं और व्यापक सार्वजनिक गतिविधियों का दावा करता है, उसे पारदर्शिता के मानकों से बाहर नहीं रखा जा सकता। इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए मोहन भागवत ने कहा कि RSS “secretive” नहीं है, उसे पंजीकरण की जरूरत नहीं, और “Hindu religion is not registered” जैसी दलील भी दी। यह उनका पक्ष है; लेकिन यही पक्ष बहस को और स्पष्ट करता है कि मामला केवल कानूनी औपचारिकता का नहीं, संगठनात्मक पारदर्शिता का भी है। 

इस प्रश्न की जड़ समझने के लिए RSS की अपनी आधिकारिक व्याख्या देखना जरूरी है। संगठन की FAQ कहती है कि उसकी कोई formal membership enrolment प्रक्रिया नहीं है; न कोई शुल्क, न आवेदन-पत्र, और शाखा ही उसकी मूल इकाई है। यही नहीं, RSS स्वयं अपने को एक विस्तृत स्वयंसेवी नेटवर्क के रूप में प्रस्तुत करता है। यानी यह सामान्य सोसाइटी, ट्रस्ट या कंपनी की तरह संचालित होने वाली संरचना नहीं है, बल्कि शाखा-आधारित, विकेंद्रीकृत और नेटवर्क-जैसी व्यवस्था है। यह व्यवस्था अपने आप में अवैध नहीं है, लेकिन जब ऐसा संगठन सार्वजनिक जीवन, सामाजिक अनुशासन, शिक्षा और राजनीति पर व्यापक प्रभाव डालता है, तब उसके वित्त, निर्णय-प्रणाली और जवाबदेही पर प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है।

भारतीय कानून भी यह संकेत देता है कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय संगठनों के लिए पारदर्शिता कोई असाधारण माँग नहीं है। Societies Registration Act, 1860 पंजीकरण, memorandum of association और annual list of managing body जैसी औपचारिकताओं का ढाँचा देता है। दूसरी ओर, आयकर विभाग की आधिकारिक व्याख्या बताती है कि Association of Persons (AOP) या Body of Individuals (BOI), चाहे incorporated हो या नहीं, आयकर कानून के तहत “person” माने जाते हैं और अलग इकाई के रूप में कर-आकलन के दायरे में आते हैं। इसलिए यह तर्क कि कोई संगठन “सरकारी फंड नहीं लेता” तो उसे किसी भी प्रकार की पहचान, वित्तीय सूचना या कर-स्पष्टता की जरूरत नहीं, कानूनी बहस का अंतिम उत्तर नहीं माना जा सकता। 


प्रियांक खड़गे के पत्र में जिस एक और पहलू को उभारने की कोशिश की गई, वह RSS की सार्वजनिक पहुँच का पैमाना है। इंडियन एक्सप्रेस और NDTV की रिपोर्टों के अनुसार, खड़गे ने अपने पत्र में RSS के 2025–26 ABPS रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कर्नाटक में 4,127 दैनिक शाखाएँ, 1,389 साप्ताहिक मिलन, 60 मासिक मंडलियाँ, 2,194 समाजोत्सव, 19.61 लाख प्रतिभागियों वाले आयोजन और 562 रूट मार्चों का उल्लेख है। यह आँकड़ा चाहे संगठन की अपनी रिपोर्टिंग से आया हो या उसके हवाले से सार्वजनिक किया गया हो, इसका अर्थ साफ है: यह कोई छोटा, निजी और सीमित प्रभाव वाला समूह नहीं है, बल्कि एक विशाल जन-संगठन है। ऐसे संगठन के लिए “हम सार्वजनिक नहीं हैं” जैसी स्थिति लोकतांत्रिक दृष्टि से पर्याप्त नहीं लगती। 

यहीं मोहन भागवत की आपत्ति और खड़गे की माँग के बीच असली टकराव दिखाई देता है। भागवत का कहना है कि RSS किसी सरकारी अनुदान पर नहीं चलता, इसलिए पंजीकरण आवश्यक नहीं; वे यह भी कहते हैं कि 1950 के दशक में संगठन ने अपना लिखित संविधान सरकार को सौंपा था और सरकार उसे जानती है। लेकिन यह दलील राजनीतिक रूप से सशक्त हो सकती है, फिर भी पारदर्शिता की पूरी माँग का उत्तर नहीं देती। किसी संगठन का अस्तित्व-स्वीकार और उसकी वित्तीय-संस्थागत पारदर्शिता दो अलग बातें हैं। संवैधानिक लोकतंत्र में किसी भी संगठन को, चाहे वह कितना ही पुराना या प्रभावशाली क्यों न हो, अपने संसाधनों, प्रतिनिधियों और सार्वजनिक गतिविधियों के आधार स्पष्ट करने पड़ते हैं।

इस बहस को पार्टी-राजनीति के चश्मे से पूरी तरह देख लेना भी गलत होगा। अगर प्रश्न केवल RSS का होता तो यह सीमित बहस रहती; लेकिन मुद्दा उससे बड़ा है। सवाल यह है कि भारत में क्या किसी भी बड़े सामाजिक-वैचारिक नेटवर्क को बिना औपचारिक सार्वजनिक जवाबदेही के वर्षों तक चलने दिया जा सकता है? और दूसरी ओर, क्या राज्य की माँगें भी केवल राजनीतिक प्रतिशोध का रूप न ले लें? लोकतांत्रिक मर्यादा यही है कि न तो कोई संगठन कानून से ऊपर हो, न कोई सरकार कानून को राजनीतिक हथियार बनाए। इसलिए सबसे उचित रास्ता यही है कि RSS अपने कानूनी, वित्तीय और संगठनात्मक ढाँचे पर तथ्यात्मक स्पष्टता दे, और राज्य इस स्पष्टता की माँग को केवल शोर नहीं, नियमों की भाषा में रखे।


अंततः, यह प्रश्न किसी संगठन की प्रतिष्ठा का नहीं, भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का है। जो संस्था स्वयं अनुशासन, राष्ट्रवाद और कर्तव्य की बात करती है, उससे जनता यह अपेक्षा रखने का अधिकार रखती है कि वह पारदर्शिता, कर-पालन और सार्वजनिक जवाबदेही में भी उतनी ही अनुशासित हो। किसी संगठन का शताब्दी वर्ष उत्सव का अवसर हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय लोकतंत्र के लिए वह आत्म-परीक्षण का भी क्षण होना चाहिए। यही इस विवाद की सबसे स्वस्थ परिणति होगी।