नई दिल्ली: सीबीएसई का OSM विवाद: सवाल केवल एक टेंडर का नहीं, करोड़ों विद्यार्थियों के भरोसे का है

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


सीबीएसई का OSM विवाद: सवाल केवल एक टेंडर का नहीं, करोड़ों विद्यार्थियों के भरोसे का है

भारत में शिक्षा केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है। यह करोड़ों परिवारों के सपनों, आकांक्षाओं और भविष्य का आधार है। इसलिए जब देश के सबसे बड़े स्कूल शिक्षा बोर्ड, सीबीएसई, की मूल्यांकन प्रणाली और उससे जुड़े टेंडर को लेकर गंभीर प्रश्न उठते हैं, तो उन्हें किसी राजनीतिक विवाद या सोशल मीडिया बहस के रूप में नहीं देखा जा सकता।

हाल के दिनों में ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली और उससे जुड़े ठेके की प्रक्रिया को लेकर जो तथ्य, दस्तावेज़ और प्रश्न सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने हैं, उन्होंने शिक्षा प्रशासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर एक व्यापक बहस खड़ी कर दी है।


इस पूरे प्रकरण का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि कई सवाल किसी राजनीतिक दल, बड़े मीडिया संस्थान या सरकारी जांच एजेंसी ने नहीं, बल्कि एक छात्र और स्वतंत्र शोधकर्ताओं द्वारा उठाए गए। लोकतंत्र में यह स्वयं एक महत्वपूर्ण संदेश है कि नागरिक, विशेषकर युवा, सार्वजनिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को समझने और प्रश्न पूछने की क्षमता रखते हैं। लेकिन इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह नहीं है कि टेंडर में क्या बदलाव हुए। सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या उन बदलावों का पर्याप्त औचित्य, पारदर्शिता और सार्वजनिक स्पष्टीकरण उपलब्ध कराया गया?


यदि किसी निविदा की शर्तें बार-बार बदली जाती हैं, यदि पात्रता मानदंडों में संशोधन होते हैं, यदि पूर्व में विवादों से जुड़ी किसी कंपनी को नया अवसर मिलता है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन निर्णयों का विस्तृत और सार्वजनिक औचित्य प्रस्तुत किया जाना चाहिए। ऐसा न होने पर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।


यह स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि किसी भी कंपनी, अधिकारी या मंत्री को दोषी ठहराना जांच एजेंसियों और सक्षम संस्थाओं का कार्य है, न कि सार्वजनिक विमर्श का। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि सार्वजनिक धन और सार्वजनिक संस्थाओं से जुड़े निर्णयों पर सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार है। यही वह बिंदु है जहाँ इस विवाद को व्यक्तिगत आरोपों से ऊपर उठाकर संस्थागत जवाबदेही के संदर्भ में देखना आवश्यक हो जाता है।


यदि किसी नई मूल्यांकन प्रणाली के लागू होने के बाद बड़ी संख्या में तकनीकी शिकायतें सामने आती हैं, यदि छात्रों को अपनी उत्तरपुस्तिकाओं तक पहुँचने में कठिनाई होती है, यदि पोर्टल समय पर कार्य नहीं करता, यदि पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया विवादों में घिर जाती है, तो यह केवल तकनीकी समस्या नहीं रह जाती। यह शासन और कार्यान्वयन की समस्या बन जाती है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया का सीधा संबंध विद्यार्थियों के भविष्य से है।


एक सड़क परियोजना में देरी होने पर आर्थिक नुकसान हो सकता है। एक भवन निर्माण परियोजना में त्रुटि होने पर लागत बढ़ सकती है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था में हुई त्रुटि सीधे किसी विद्यार्थी के आत्मविश्वास, करियर, उच्च शिक्षा के अवसरों और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। यही कारण है कि शिक्षा क्षेत्र में जवाबदेही का मानक सामान्य प्रशासनिक मानकों से कहीं अधिक कठोर होना चाहिए।


आज आवश्यकता किसी राजनीतिक विजय या पराजय की नहीं है। आवश्यकता है कि केंद्र सरकार, शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई इस पूरे मामले की स्वतंत्र, पारदर्शी और समयबद्ध जांच सुनिश्चित करें। जांच केवल इस बात की नहीं होनी चाहिए कि टेंडर प्रक्रिया में कौन-से निर्णय लिए गए। जांच यह भी स्पष्ट करे:


* निविदा शर्तों में बदलाव क्यों किए गए?

* उन बदलावों का प्रस्ताव किस स्तर से आया?

* तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन की प्रक्रिया क्या थी?

* जोखिम मूल्यांकन कैसे किया गया?

* OSM प्रणाली लागू करने से पहले पर्याप्त परीक्षण हुआ था या नहीं?

* छात्रों की शिकायतों के निवारण की व्यवस्था पर्याप्त थी या नहीं?


लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता इस बात से नहीं बनती कि वे कभी गलती न करें। विश्वसनीयता इस बात से बनती है कि गलती होने पर वे उसे स्वीकार करें, उसकी जांच कराएँ और सुधारात्मक कदम उठाएँ।


यह भी याद रखा जाना चाहिए कि शिक्षा मंत्रालय, सीबीएसई और सरकार के लिए यह अवसर है—आलोचना से बचने का नहीं, बल्कि पारदर्शिता के माध्यम से विश्वास पुनर्स्थापित करने का। क्योंकि अंततः यह विवाद किसी एक कंपनी, किसी एक अधिकारी या किसी एक मंत्री का नहीं है।


यह विवाद उस भरोसे का है जो करोड़ों विद्यार्थी और उनके परिवार भारत की शिक्षा व्यवस्था पर करते हैं। और किसी भी राष्ट्र के लिए उससे अधिक मूल्यवान पूँजी कोई नहीं हो सकती।


यह संस्करण आरोपों को तथ्यात्मक प्रश्नों में बदलता है, किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं करता, और जवाबदेही, पारदर्शिता तथा विद्यार्थियों के हितों पर केंद्रित रहता है—इसलिए संपादकीय रूप से कड़ा होने के साथ-साथ कानूनी दृष्टि से भी अपेक्षाकृत सुरक्षित है।