लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट: जब असहमति पर भीड़ का शासन हावी होने लगे

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट: जब असहमति पर भीड़ का शासन हावी होने लगे

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता, असहमति को स्वीकार करने की क्षमता और राजनीतिक विरोध को वैधानिक सम्मान देने की परंपरा रही है। किंतु जब किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे वैचारिक संघर्ष से निकलकर सामाजिक वैमनस्य, भीड़ की आक्रामकता और संस्थागत मौन में बदलने लगे, तब यह केवल किसी दल विशेष का संकट नहीं रह जाता; वह पूरे गणतंत्र के चरित्र पर प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा हो जाता है।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी पर हुए हमले इसी व्यापक चिंता की एक गंभीर अभिव्यक्ति हैं। चुनावोत्तर हिंसा से प्रभावित परिवारों से मिलने जा रहे जनप्रतिनिधियों पर भीड़ द्वारा अंडे, पत्थर और अन्य वस्तुएँ फेंकना केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं है; यह उस राजनीतिक संस्कृति के क्षरण का संकेत है जिसमें विरोधी विचारधारा के लोगों को लोकतांत्रिक प्रतिद्वंद्वी के बजाय शत्रु के रूप में देखा जाने लगा है।


लोकतंत्र में जनता का असंतोष स्वाभाविक है। विरोध प्रदर्शन भी लोकतांत्रिक अधिकार है। किंतु हिंसा किसी भी परिस्थिति में जनमत की वैध अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। यदि किसी निर्वाचित सांसद को जनता के बीच जाने पर शारीरिक हमले का सामना करना पड़े, तो यह केवल उस सांसद की सुरक्षा का प्रश्न नहीं है; यह उस संवैधानिक व्यवस्था का प्रश्न है जिसके अंतर्गत जनता और जनप्रतिनिधि के बीच संवाद संभव होता है।


और भी चिंताजनक बात यह है कि ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर राजनीतिक दल अपने-अपने पक्ष के अनुसार औचित्य खोजने लगते हैं। कोई अतीत की हिंसा का हवाला देता है, कोई प्रतिशोध की राजनीति को उचित ठहराने की कोशिश करता है। किंतु लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि दो गलतियाँ मिलकर कभी एक सही व्यवस्था नहीं बनातीं। यदि अतीत में किसी दल ने हिंसा की हो, तो वह वर्तमान में हिंसा को वैध नहीं बना सकता।


भारत के राजनीतिक विमर्श में पिछले कुछ वर्षों से एक ऐसी भाषा विकसित हुई है जिसमें विरोधी दलों को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि राष्ट्र-विरोधी, समाज-विरोधी अथवा पूर्णतः अस्वीकार्य तत्व के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए अत्यंत घातक है। लोकतंत्र का अर्थ ही यह है कि हम उस व्यक्ति के अधिकारों की भी रक्षा करें जिससे हम गहरी असहमति रखते हों। यदि असहमति को देशद्रोह और विरोध को दुश्मनी में बदल दिया जाए, तो लोकतांत्रिक संस्थाएँ धीरे-धीरे केवल औपचारिक ढाँचे बनकर रह जाती हैं।


पश्चिम बंगाल की घटनाएँ इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं कि उन्होंने विपक्षी दलों को एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के प्रश्न पर एकजुट होने का अवसर दिया है। राजनीतिक गठबंधन चुनावी गणित का विषय हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की रक्षा केवल चुनावी अंकगणित से संभव नहीं होती। इसके लिए आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दल इस सिद्धांत पर सहमत हों कि हिंसा, चाहे वह किसी भी पक्ष से हो, अस्वीकार्य है; और संविधान, चाहे सत्ता में कोई भी हो, सर्वोच्च रहेगा।


दुर्भाग्य यह है कि भीड़ की हिंसा अब केवल राजनीतिक नेताओं तक सीमित नहीं रही। पिछले वर्षों में देश के अनेक हिस्सों में सामान्य नागरिक भी अफवाहों, पहचान-आधारित घृणा, सांप्रदायिक तनाव और सामाजिक उन्माद के कारण हिंसा का शिकार हुए हैं। जब समाज बार-बार ऐसी घटनाओं का साक्षी बनता है और धीरे-धीरे उन्हें सामान्य मानने लगता है, तब लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा नैतिक संकट उत्पन्न होता है। कानून का शासन तब कमजोर पड़ने लगता है और भीड़ स्वयं न्यायाधीश बनने का भ्रम पाल लेती है।


ऐसे समय में राजनीतिक नेतृत्व, संवैधानिक संस्थाओं और सार्वजनिक जीवन के प्रभावशाली व्यक्तियों की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। हिंसा की घटनाओं पर स्पष्ट और निर्भीक प्रतिक्रिया केवल राजनीतिक औपचारिकता नहीं होती; वह समाज को यह संदेश देती है कि लोकतंत्र में असहमति स्वीकार्य है, लेकिन हिंसा नहीं। मौन कभी-कभी तटस्थता नहीं, बल्कि एक खतरनाक संकेत भी बन सकता है।


भारत का संविधान हमें केवल मतदान का अधिकार नहीं देता; वह हमें असहमति का अधिकार भी देता है। संसद केवल बहुमत की संस्था नहीं, बल्कि विपक्ष की आवाज़ की भी संरक्षक है। यदि निर्वाचित प्रतिनिधियों की सुरक्षा, सम्मान और अभिव्यक्ति पर भीड़ का भय हावी होने लगे, तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है।


आज आवश्यकता किसी एक दल की जीत या हार पर बहस करने की नहीं है। आवश्यकता इस बात पर राष्ट्रीय सहमति बनाने की है कि राजनीतिक हिंसा, भीड़तंत्र और वैचारिक घृणा को किसी भी परिस्थिति में लोकतांत्रिक स्वीकृति नहीं मिलनी चाहिए। क्योंकि इतिहास साक्षी है कि लोकतंत्र प्रायः एक झटके में नहीं मरता; वह धीरे-धीरे तब कमजोर होता है जब समाज हिंसा को सामान्य और असहमति को अपराध मानने लगता है।


भारत को यदि एक परिपक्व, संवैधानिक और आधुनिक लोकतंत्र बने रहना है, तो उसे चुनावी विजय से अधिक लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा करनी होगी। सत्ता बदलती रहती है, दल आते-जाते रहते हैं, लेकिन संविधान और लोकतांत्रिक संस्कृति ही वह स्थायी आधार हैं जिन पर राष्ट्र का भविष्य निर्मित होता है।