पुल गिर रहे हैं, लेकिन नैरेटिव खड़ा है

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

पुल गिर रहे हैं, लेकिन नैरेटिव खड़ा है

## जब इंजीनियरिंग की विफलता को प्रचार की सफलता से ढकने की कोशिश की जाती है

किसी भी राष्ट्र की सभ्यता का स्तर उसके भाषणों से नहीं, उसके पुलों से मापा जाता है। भाषण तालियाँ बटोर सकते हैं, विज्ञापन छवियाँ गढ़ सकते हैं, लेकिन पुल झूठ नहीं बोलते। वे या तो खड़े रहते हैं, या गिर जाते हैं। और जब पुल गिरते हैं, तो उनके साथ केवल कंक्रीट और स्टील नहीं टूटते, बल्कि शासन की विश्वसनीयता, प्रशासनिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक नैतिकता भी दरकती है।

बिहार में गंगा नदी पर निर्माणाधीन अगुआनी-सुल्तानगंज चार लेन पुल का मामला इसी राष्ट्रीय संकट का प्रतीक बन चुका है। लगभग 1710 करोड़ रुपये की लागत वाली परियोजना। निर्माण पूरा होने से पहले एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन-तीन बड़े हादसे। 2022 में हिस्सा गिरा, 2023 में पूरा सुपर स्ट्रक्चर नदी में समा गया और 2024 में फिर संरचनात्मक विफलता सामने आई। प्रश्न यह नहीं है कि पुल क्यों गिरा। प्रश्न यह है कि इतनी बार गिरने के बाद भी जवाबदेही क्यों नहीं खड़ी हुई?


भारत में आज एक विचित्र राजनीतिक संस्कृति विकसित हो चुकी है। किसी पुल के गिरने, किसी सुरंग के धंसने, किसी बांध में खामी आने या किसी सार्वजनिक परियोजना में भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर सबसे पहले इंजीनियरिंग नहीं, बल्कि राजनीति सक्रिय होती है। दुर्घटना के कारणों पर चर्चा शुरू होने से पहले ही टीवी स्टूडियो में प्रवक्ता पहुँच जाते हैं। सवालों के जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वालों की नीयत पर बहस शुरू हो जाती है।


यह लोकतंत्र का सबसे खतरनाक क्षण होता है—जब तथ्यों का स्थान प्रचार ले लेता है और जवाबदेही का स्थान निष्ठा।


विडंबना देखिए। जिन परियोजनाओं को जनता के करों से बनाया जाता है, उनके बारे में सवाल पूछना आज कुछ लोगों की नजर में अपराध बन गया है। यदि कोई नागरिक पूछे कि हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद पुल बार-बार क्यों गिर रहा है, तो उसे विकास विरोधी कहा जाता है। यदि कोई पत्रकार निर्माण गुणवत्ता पर प्रश्न उठाए, तो उसे राजनीतिक एजेंडा चलाने वाला बताया जाता है। यदि कोई विशेषज्ञ डिजाइन संबंधी खामियों की ओर संकेत करे, तो उसकी बात को अनदेखा कर दिया जाता है।


क्या यही लोकतंत्र है? क्या करदाता का धन केवल सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करने के लिए है, या उसकी गुणवत्ता की जांच करने के लिए भी?


इतिहास की ओर देखना इसलिए आवश्यक है क्योंकि वह हमें एक असुविधाजनक सत्य याद दिलाता है। स्वतंत्र भारत में अनेक पुल ऐसे बने जो आज भी दशकों बाद खड़े हैं। राजेंद्र सेतु, जवाहर सेतु, कोलिया भोमोरा सेतु, फरक्का बैराज का रेल-सड़क ढांचा, विद्यासागर सेतु—इन सबकी अपनी चुनौतियाँ थीं, अपनी सीमाएँ थीं। उस समय न आज जैसी डिजिटल तकनीक थी, न सुपरकंप्यूटर आधारित डिजाइन प्रणाली, न चौबीस घंटे चलने वाला प्रचारतंत्र। फिर भी निर्माण का अर्थ निर्माण था, उद्घाटन का अर्थ उपलब्धि नहीं बल्कि उपयोगिता थी।


आज स्थिति उलटती दिखाई देती है। परियोजना की आधारशिला का प्रचार, उद्घाटन का उत्सव और विज्ञापन का शोर निर्माण प्रक्रिया से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया है। परिणाम यह है कि कभी पुल निर्माण के दौरान गिर जाता है, कभी उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद त्रासदी में बदल जाता है, और कभी विशेषज्ञों की वर्षों पुरानी चेतावनियों के बावजूद प्रशासन तब तक नहीं जागता जब तक कोई हिस्सा टूट न जाए।


गुजरात के मोरबी पुल हादसे में 135 से अधिक लोगों की जान चली गई। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में निर्माणाधीन पुल का हिस्सा गिरने से मजदूरों की मौत हुई। बिहार में विक्रमशिला सेतु को लेकर लंबे समय से चेतावनियाँ दी जाती रहीं। कई राज्यों में दुर्घटनाओं के बाद आपातकालीन ऑडिट कराए गए। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही है—हमारे यहाँ ऑडिट हादसे के बाद क्यों होते हैं? दुर्घटना से पहले क्यों नहीं?


यह केवल तकनीकी विफलता नहीं है। यह शासन की सोच की विफलता है।


और इस विफलता को छिपाने में सबसे बड़ी भूमिका उस राजनीतिक-मीडिया गठजोड़ की है जो सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसका बचाव करने को अपना धर्म मान बैठा है। लोकतंत्र में मीडिया का कार्य सरकार का प्रवक्ता बनना नहीं, जनता का प्रहरी बनना होता है। लेकिन जब मीडिया का एक हिस्सा सत्ता के हर निर्णय को उपलब्धि और हर आलोचना को षड्यंत्र घोषित करने लगे, तब भ्रष्टाचार और लापरवाही के लिए सबसे सुरक्षित वातावरण तैयार होता है।


भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने वाला व्यक्ति नहीं करता। भ्रष्टाचार का संरक्षक वह भी होता है जो सवालों को दबाता है, जांच को कमजोर करता है, जिम्मेदारों को बचाता है और जनमत को भ्रमित करता है। किसी परियोजना में यदि निर्माण गुणवत्ता पर प्रश्न उठते हैं और उसके बावजूद कोई उत्तरदायित्व तय नहीं होता, तो समझना चाहिए कि समस्या केवल इंजीनियरिंग की नहीं है; समस्या पूरी जवाबदेही व्यवस्था की है।


लोकतंत्र में सरकारें आलोचना से मजबूत होती हैं, चाटुकारिता से नहीं। कोई भी राष्ट्र केवल राष्ट्रवाद के नारों से विश्वस्तरीय अवसंरचना नहीं बना सकता। उसके लिए ईमानदार इंजीनियरिंग, कठोर निगरानी, स्वतंत्र मीडिया और निर्भीक संस्थाएँ चाहिए।


देशभक्ति का अर्थ यह नहीं कि गिरते हुए पुल को भी उपलब्धि घोषित कर दिया जाए। देशभक्ति का अर्थ है कि जनता के एक-एक रुपये का हिसाब माँगा जाए। देशभक्ति का अर्थ है कि किसी हादसे के बाद श्रद्धांजलि से पहले जवाबदेही की मांग की जाए। देशभक्ति का अर्थ है कि नागरिक यह पूछ सके कि आखिर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद परियोजनाएँ असफल क्यों हो रही हैं।


पुलों की मजबूती केवल कंक्रीट से नहीं बनती। वह पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और ईमानदारी से बनती है। जब ये तीनों कमजोर पड़ जाते हैं, तब पुल गिरने लगते हैं। और जब पुलों के गिरने पर भी सवाल पूछना अपराध बना दिया जाए, तब समझ लेना चाहिए कि संकट केवल निर्माण का नहीं, लोकतंत्र की आत्मा का है।


इतिहास में सरकारों का मूल्यांकन उनके विज्ञापनों से नहीं, उनके कार्यों की स्थायित्व से होता है। पोस्टर कुछ दिनों में उतर जाते हैं, भाषण भूल दिए जाते हैं, लेकिन पुल दशकों तक गवाही देते हैं कि सत्ता ने राष्ट्र का निर्माण किया था या केवल उसका प्रचार।