जब अर्थव्यवस्था कुछ हाथों में सिमटने लगे: लोकतंत्र, निजीकरण और आर्थिक शक्ति के केंद्रीकरण का प्रश्न

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


जब अर्थव्यवस्था कुछ हाथों में सिमटने लगे: लोकतंत्र, निजीकरण और आर्थिक शक्ति के केंद्रीकरण का प्रश्न

# राष्ट्र का भविष्य बाजार तय करेगा या नागरिक?

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। लोकतंत्र का वास्तविक आधार राजनीतिक बहुलता, आर्थिक अवसरों की समानता और सार्वजनिक संसाधनों पर जनता के अधिकार की भावना है। जब सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण राजनीति में दिखाई देता है, तो उसे अधिनायकवाद कहा जाता है। किंतु इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि अधिनायकवाद केवल राजनीतिक संस्थाओं को नियंत्रित करके नहीं आता; वह आर्थिक संरचनाओं के माध्यम से भी धीरे-धीरे स्थापित होता है।

जब किसी राष्ट्र की बंदरगाहें, हवाई अड्डे, ऊर्जा क्षेत्र, खनिज संसाधन, संचार तंत्र और वित्तीय परिसंपत्तियाँ क्रमशः कुछ चुनिंदा समूहों के नियंत्रण में सिमटने लगती हैं, तब प्रश्न केवल निजीकरण का नहीं रह जाता। तब प्रश्न यह बन जाता है कि क्या लोकतंत्र की आर्थिक आत्मा सुरक्षित है?

भारत में पिछले वर्षों में सार्वजनिक परिसंपत्तियों के निजीकरण को विकास, दक्षता और निवेश आकर्षित करने के नाम पर प्रस्तुत किया गया है। समर्थकों का तर्क है कि निजी क्षेत्र बेहतर प्रबंधन, तेज निर्णय क्षमता और आधुनिक सुविधाएँ प्रदान कर सकता है। यह तर्क अपने आप में असंगत नहीं है। दुनिया के अनेक देशों में सार्वजनिक-निजी साझेदारी के सफल उदाहरण मौजूद हैं।

लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मूल प्रश्न यह नहीं होता कि निजीकरण हुआ या नहीं। मूल प्रश्न यह होता है कि निजीकरण किस प्रकार हुआ, किन शर्तों पर हुआ, किसके हित में हुआ और उससे प्राप्त लाभ समाज में किस प्रकार वितरित हुए।

यदि सार्वजनिक संपत्तियों के हस्तांतरण की प्रक्रिया ऐसी हो जिसमें प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ जाए, कुछ चुनिंदा समूह असाधारण लाभ की स्थिति में पहुँच जाएँ और राज्य की नियामक भूमिका धीरे-धीरे कमजोर होती जाए, तो यह मुक्त बाजार नहीं बल्कि आर्थिक शक्ति के केंद्रीकरण की प्रक्रिया बन जाती है।

इतिहास गवाह है कि आर्थिक शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण अंततः राजनीतिक शक्ति के केंद्रीकरण को भी जन्म देता है। यही कारण है कि आधुनिक लोकतंत्रों में एकाधिकार-विरोधी कानून, प्रतिस्पर्धा आयोग और नियामक संस्थाएँ स्थापित की गईं। उनका उद्देश्य केवल व्यापार नियंत्रित करना नहीं था; उनका उद्देश्य लोकतंत्र को आर्थिक प्रभुत्व से बचाना था।


आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत की अर्थव्यवस्था व्यापक उद्यमिता की ओर बढ़ रही है या कुछ विशाल कॉर्पोरेट संरचनाओं के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है?


यदि किसी देश में छोटे और मध्यम उद्योग संघर्ष कर रहे हों, युवा उद्यमियों के लिए अवसर सीमित हों और रणनीतिक क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा घटती दिखाई दे, तो लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था की बुनियाद कमजोर होने लगती है। ऐसी स्थिति में नागरिकों का विश्वास भी प्रभावित होता है। उन्हें यह महसूस होने लगता है कि आर्थिक अवसर प्रतिभा और नवाचार से नहीं, बल्कि सत्ता के निकट होने से निर्धारित हो रहे हैं।


यह धारणा स्वयं में लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।


आर्थिक दृष्टि से भी अत्यधिक केंद्रीकरण जोखिमपूर्ण है। जब महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसंरचना कुछ सीमित संस्थाओं पर निर्भर हो जाती है, तो किसी एक क्षेत्र में संकट पूरे आर्थिक तंत्र को प्रभावित कर सकता है। विविधता केवल राजनीति में ही आवश्यक नहीं होती; वह अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए भी अनिवार्य होती है।


सामाजिक स्तर पर इसका प्रभाव और भी व्यापक होता है। जब जनता को यह प्रतीत होने लगे कि सार्वजनिक संपत्तियाँ निजी लाभ का माध्यम बन रही हैं जबकि महंगाई, करों और जीवन-यापन की लागत का बोझ सामान्य नागरिक उठा रहा है, तब सामाजिक असंतोष जन्म लेता है। लोकतंत्र में असंतोष का समाधान संवाद और पारदर्शिता से होता है। लेकिन यदि आलोचना को राष्ट्र-विरोध, प्रश्नों को षड्यंत्र और जवाबदेही की मांग को विकास-विरोधी करार दिया जाने लगे, तो लोकतांत्रिक विमर्श सिकुड़ने लगता है।


यहीं से अधिनायकवादी प्रवृत्तियों का वास्तविक खतरा शुरू होता है।


अधिनायकवाद केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध नहीं है। अधिनायकवाद वह स्थिति भी है जिसमें नागरिक धीरे-धीरे यह मानने लगते हैं कि सत्ता से प्रश्न पूछना अनुचित है। जब मीडिया का एक हिस्सा निगरानीकर्ता के बजाय प्रशंसक बन जाए, जब संस्थागत आलोचना को हतोत्साहित किया जाए और जब आर्थिक नीतियों पर गंभीर बहस की जगह प्रचार हावी हो जाए, तब लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ने लगता है।


राष्ट्रहित का अर्थ किसी सरकार, दल, उद्योगपति या विचारधारा का हित नहीं होता। राष्ट्रहित का अर्थ है कि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग अधिकतम सार्वजनिक कल्याण के लिए हो। राष्ट्रहित का अर्थ है कि प्रतिस्पर्धा निष्पक्ष हो, संस्थाएँ स्वतंत्र हों और नीति निर्माण पारदर्शी हो। राष्ट्रहित का अर्थ यह भी है कि कोई भी आर्थिक शक्ति इतनी बड़ी न हो जाए कि वह स्वयं राज्य के समान प्रभावशाली प्रतीत होने लगे।


भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का सबसे बड़ा सबक यही है कि राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक न्याय एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि आर्थिक शक्ति अत्यधिक केंद्रित हो जाए तो राजनीतिक समानता धीरे-धीरे खोखली होने लगती है। और यदि राजनीतिक सत्ता पर पर्याप्त लोकतांत्रिक नियंत्रण न रहे तो आर्थिक अवसर भी सीमित हाथों में सिमटने लगते हैं।


इसलिए आज आवश्यकता निजीकरण बनाम राष्ट्रीयकरण की वैचारिक बहस से आगे बढ़ने की है। आवश्यकता इस बात की है कि देश यह सुनिश्चित करे कि विकास का मॉडल प्रतिस्पर्धी हो, पारदर्शी हो और जनता के प्रति जवाबदेह हो। क्योंकि लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा चुनावों में नहीं, बल्कि इस प्रश्न में होती है कि राष्ट्र की संपत्ति, राष्ट्र की संस्थाएँ और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था अंततः किसके लिए काम कर रही हैं—कुछ शक्तिशाली समूहों के लिए या 140 करोड़ नागरिकों के लिए।


यदि यह प्रश्न पूछना बंद हो गया, तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी सुरक्षा-दीवार कमजोर पड़ जाएगी। और यदि यह प्रश्न जीवित रहा, तो लोकतंत्र स्वयं अपने भीतर सुधार की शक्ति पैदा करता रहेगा।