शब्दब्रह्म का वृषभ: ऋग्वेद की प्राचीनतम पहेली और वाक्-चेतना का आध्यात्मिक अनुशीलन

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


शब्दब्रह्म का वृषभ: ऋग्वेद की प्राचीनतम पहेली और वाक्-चेतना का आध्यात्मिक अनुशीलन 

## ऋग्वैदिक प्रहेलिका और ब्रह्मोद्य की परंपरा

सनातन वांग्मय में सत्य को अभिव्यक्त करने के दो मार्ग रहे हैं—एक प्रत्यक्ष तार्किक प्रतिपादन, और दूसरा परोक्ष सांकेतिक विमर्श। प्राचीन काल में ऋषियों ने जब परम गूढ़ रहस्यों को जनमानस के लिए सुरक्षित करना चाहा, तो उन्होंने 'ब्रह्मोद्य' (आध्यात्मिक शास्त्रार्थ) और 'प्रहेलिका' (पहेली) की शैली को चुना। पहेली केवल मनोरंजन की लोक-विधा नहीं, बल्कि चेतना के कपाट खोलने वाली एक संपुटित चाबी है।

इसका प्राचीनतम और सर्वाधिक विस्मयकारी उदाहरण ऋग्वेद (मण्डल ४, सूक्त ५८, मन्त्र ३) में मिलता है। ऋषि वामदेव द्वारा द्रष्टव्य यह मंत्र एक ऐसे 'विलक्षण बैल' (वृषभ) का चित्र खींचता है, जो अपनी संरचना में संपूर्ण ब्रह्मांड और मानव चेतना को समेटे हुए है:


"च॒त्वारि॒ शृंगा॒ त्रयो॑ अस्य॒ पादा॒ द्वे शी॒र्षे स॒प्त हस्ता॑सो अस्य।

त्रिधा॑ ब॒द्धो वृ॑ष॒भो रो॑रवीति म॒हो दे॒वो मर्त्याँ॒ आ वि॑वेश।।"


इस अलौकिक पहेली का समाधान सामान्य भौतिक धरातल पर असंभव है। यद्यपि विभिन्न आचार्यों ने इसे आत्मा, यज्ञ और अग्नि के रूप में बुझाया है, किंतु महर्षि पतंजलि ने अपने 'व्याकरण महाभाष्य' में इसका जो भाषावैज्ञानिक और आध्यात्मिक समाधान किया है, वह मानव चेतना के उच्चतम सोपान को उद्घाटित करता है। यह बैल कोई पशु नहीं, बल्कि साक्षात् 'शब्दब्रह्म' (The Cosmic Sound/Speech) है।


1. दार्शनिक अधिष्ठान: 'वृषभ' ही 'शब्दब्रह्म' क्यों है?


भारतीय दर्शन में 'वृषभ' (बैल) को केवल एक जीव नहीं माना गया। व्युत्पत्ति के अनुसार— "वर्षणात् वृषभः" अर्थात् जो वर्षण करे, जो इच्छाओं और ज्ञान की वर्षा करे, वह वृषभ है।


जगत की उत्पत्ति के मूल में 'नाद' या 'शब्द' है। उपनिषद कहते हैं— "शब्दब्रह्मणि निष्णात पराब्रह्माधिगच्छति"। जब पराशक्ति सृष्टि की रचना की कामना करती है, तो वह सबसे पहले 'वाक्' (वाणी) के रूप में बरसती है। ज्ञान, बोध और जीवन का सिंचन करने के कारण ही शब्द को 'वृषभ' की उपमा दी गई है। यह वृषभ जब 'रोरवीति' (गर्जना) करता है, तो अज्ञान का अंधकार छंट जाता है और सृष्टि चेतनावान हो उठती है।


2. शब्द-वृषभ का अध्यात्म-व्याकरणिक विग्रह


ऋषि वामदेव ने इस शब्द-रूपी वृषभ के अंगों का जो गणितीय और रूपात्मक वर्गीकरण किया है, वह अध्यात्म और व्याकरण का ऐसा अद्वैत है जिसे देखकर आधुनिक भाषाविद् भी चकित रह जाते हैं:


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                      [ शब्दब्रह्म रूपी वृषभ ]

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        ┌───────────────┬───────┴───────┬───────────────┐

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   [४ सींग] [३ पैर] [२ सिर] [७ हाथ]

  (पद-चतुष्टय) (काल-त्रय) (प्रत्यय-द्वय) (विभक्तियां)

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   ├─ नाम ├─ भूत ├─ सुप् ├─ प्रथमा से

   ├─ आख्यात ├─ वर्तमान └─ तिङ् └─ सप्तमी तक

   ├─ उपसर्ग └─ भविष्य

   └─ निपात


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(क) चत्वारि शृंगा (चार सींग)


सींग रक्षा और शक्ति के प्रतीक हैं। शब्द की शक्ति उसके चार पद-भेदों (Parts of Speech) में निहित है:


1. नाम (Noun/Pronoun): जो स्थिर सत्ता का बोध कराए (संज्ञा)।

2. आख्यात (Verb): जो गति और क्रिया का संचार करे (धातु/क्रिया)।

3. उपसर्ग (Prefix): जो क्रिया के मूल अर्थ को मोड़ दे या विशिष्ट बना दे।

4. निपात (Particle/Invariable): अव्यय, जो काल और लिंग से परे रहकर वाक्य को स्थिरता दें।


(ख) त्रयो अस्य पादा (तीन पैर)


बैल जिन तीन पैरों पर खड़ा होकर काल के प्रवाह में गति करता है, वे हैं—भूत, वर्तमान और भविष्य। शब्द समय की छाती पर चलता है। भाषा के बिना हम काल का खंडन या संकलन नहीं कर सकते। चेतना इन तीनों कालों को लांघकर ही त्रिकालदर्शी बनती है।


(ग) द्वे शीर्षे (दो सिर)


सिर चेतना का नियंत्रक केंद्र है। शब्द-शास्त्र में दो प्रकार के प्रत्यय ही संपूर्ण वाक्-सृष्टि को नियंत्रित करते हैं:


1. सुप् प्रत्यय: जो प्रातिपदिक (संज्ञा) को पद बनाते हैं (जैसे- रामः)।

2. तिङ् प्रत्यय: जो धातुओं को क्रियापद का रूप देते हैं (जैसे- भवति)।

व्याकरण दर्शन के अनुसार, संसार में केवल दो ही तत्व हैं—एक 'सत्' (जो है—संज्ञा) और दूसरा 'भाव' (जो घटित हो रहा है—क्रिया)। ये दोनों ही इस वृषभ के दो सिर हैं।


(घ) सप्त हस्तासो अस्य (सात हाथ)


हाथ कर्म और विस्तार के सूचक हैं। शब्द अपनी शक्ति का विस्तार सात विभक्तियों (प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी) के माध्यम से करता है। ये सात विभक्तियां ही चेतना के सात स्तर (Seven Planes of Consciousness) हैं, जिनसे मनुष्य संसार के व्यवहार को साधता है।


3. त्रिधा बद्धो: तीन स्थानों का बंधन और वाक्-उत्पत्ति का रहस्य


यह अद्भुत बैल तीन जगहों से बंधा हुआ है—"त्रिधा बद्धो वृषभः"। योग और तंत्र शास्त्र के अनुसार, जब मानव शरीर में आत्मा की प्रेरणा से बुद्धि और प्राण का संयोग होता है, तो ध्वनि का प्रकटीकरण तीन मुख्य ग्रन्थियों या केंद्रों से होकर होता है:


1. उरस् (हृदय/मूलाधार से अनाहत तक): यहाँ शब्द 'परा' और 'पश्यन्ती' अवस्था में होता है, जहाँ वह केवल एक स्पंदन या इच्छा मात्र है।

2. कण्ठ (गला/विशुद्धि चक्र): यहाँ शब्द 'मध्यमा' अवस्था में आता है, जहाँ वह विचारों का सूक्ष्म मानसिक ढांचा ग्रहण करता है।

3. शिरस् (मुख/मूर्धा/आज्ञा चक्र): यहाँ जिव्हा, ओष्ठ और तालु के संघात से शब्द 'वैखरी' होकर बाहर गूंजता है।


इन तीन स्थानों (हृदय, कण्ठ, शिर) पर बंधकर ही वह अनहद नाद (अनाहत) हम मरणशील मनुष्यों के लिए 'आहत नाद' यानी श्रवणीय वाणी बनता है।


4. आध्यात्मिक फलश्रुति: "महो देवो मर्त्याँ आ विवेश"


मन्त्र का अंतिम चरण इस पहेली का परम सत्य उद्घाटित करता है:



"म॒हो दे॒वो मर्त्याँ॒ आ वि॑वेश॥" अर्थात्, वह महान् देव (शब्दब्रह्म) हम मरणशील मनुष्यों (मर्त्यों) के भीतर प्रविष्ट हुआ है।


पशुओं के पास ध्वनि है, पर 'शब्द' नहीं। केवल मनुष्य ही वह सौभाग्यशाली जीव है जिसके भीतर यह शब्द-रूपी ईश्वर चैतन्य होकर प्रविष्ट हुआ है। ऋषियों का मानना है कि जो व्यक्ति वाणी के इस रहस्य को जान लेता है, वह केवल अपनी भाषा को शुद्ध नहीं करता, बल्कि अपनी आत्मा को शुद्ध कर लेता है। जब मनुष्य अपशब्दों, झूठ और निंदा का त्याग कर सात्विक, सत्य और कल्याणकारी वाणी बोलता है, तो उसके भीतर बंधा हुआ यह वृषभ (देवता) मुक्त हो जाता है।


## जीवन-साधना के रूप में शब्द की आराधना


ऋग्वेद की यह प्राचीन पहेली हमें बताती है कि हम प्रतिदिन जिस वाणी का प्रयोग करते हैं, वह कोई साधारण भौतिक साधन नहीं है। हमारी जीभ पर साक्षात् परमेश्वर (महो देवः) विराजमान हैं।


जब हम व्याकरण और विवेक के माध्यम से शब्दों के शुद्ध स्वरूप को पहचानते हैं, तो हमारा जीवन एक यज्ञ बन जाता है। इस शब्द-रूपी बैल को अपने भीतर जाग्रत करना ही सायुज्य मुक्ति है। यह आलेख केवल एक पहेली का उत्तर नहीं है, बल्कि यह इस सत्य का स्मरण है कि हमारे भीतर छिपी वाक्-शक्ति ही ब्रह्मांड को संचालित करने वाली परम चेतना है।