वैवाहिक उपनिषद: द्वैत के विसर्जन से अद्वैत के महाप्रकाश की ओर
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
वैवाहिक उपनिषद: द्वैत के विसर्जन से अद्वैत के महाप्रकाश की ओर
१. मंगलाचरण: वागर्थ का शाश्वत महावर्तन
भारतीय प्रज्ञा का चरम उत्कर्ष सत्य को सूत्रों में नहीं, बल्कि अनुभूति के रस में खोजना है। महाकवि कालिदास ने जब 'वागर्थाविव सम्पृक्तौ' कहकर शब्द और अर्थ के अविभाज्य मिलन को जगत् के माता-पिता शिव और शक्ति के रूप में वंदित किया, तब उन्होंने अनजाने में ही विवाह के उस सर्वोच्च आध्यात्मिक सोपान का द्वार खोल दिया था जिसे केवल गृहस्थ-धर्म की सीमा में नहीं बांधा जा सकता।
विवाह कोई लौकिक संविदा (Social Contract) नहीं है, न ही यह दो शरीरों का एक छत के नीचे रहने का नाम मात्र है। यह मूलतः चेतना का वह महाप्रस्थान है, जहाँ जीव अपने संकुचित, खंडित और सीमित 'अहंकार' (Ego) से मुक्त होकर 'अनंत' की ओर अपनी पहली उड़ान भरता है। यह आलेख उसी वैवाहिक यात्रा का एक आध्यात्मिक उपनिषद है, जो द्वैत की कँटीली पगडंडियों से शुरू होकर अद्वैत के अखंड शिखर पर विलीन हो जाती है।
२. प्रथम सोपान: द्वैत की सघनता और अस्मिता का क्रंदन
फेरे समाप्त हुए। अग्नि की वेदी पर आहुतियाँ दी जा चुकी थीं। कुंड की भौतिक लौ अब शांत थी, किंतु दोनों जीवों के भीतर एक नई, अदृश्य और अजस्र अग्नि प्रज्वलित हो चुकी थी—चिति-अग्नि, जो दोनों के अतीत को भस्म करने वाली थी।
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[ द्वैत का संकुचित धरातल ]
(दो कुल, दो नाम, दो पृथक संस्कार)
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[ प्रथम स्पर्श का संकल्प ]
(सुख-दुःख के विनिमय का तादात्म्य)
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[ आंतरिक गृहप्रवेश (दहराकाश) ]
(एक आत्मा का दूसरी आत्मा में वास)
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[ अद्वैत की पराकाष्ठा: विलय ]
(नेह नानास्ति किंचन — केवल चैतन्य शेष)
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एक ओर वह थी—अपने पिता के आँगन से बिछुड़ती हुई, स्मृतियों की भारी गठरी बाँधे, आँखों में आंसुओं का जल और भविष्य के स्वप्न लिए। दूसरी ओर वह था—जिसने अभी-अभी अपने एकांत और अकेलेपन का अंतिम संस्कार किया था। दोनों साथ बैठे थे, पर अभी भी 'दो' थे।
यही तो द्वैत (Duality) की प्राथमिक अवस्था है। दो नाम, दो कुल, दो भिन्न इतिहास, दो पृथक जीवन-यात्राएँ और दो भिन्न मानसिक संस्कार। यह सांख्य दर्शन के 'प्रकृति' और 'पुरुष' की भांति दो अलग-अलग ध्रुव थे, जो एक-दूसरे के सम्मुख अजनबी बनकर खड़े थे।
३. द्वितीय सोपान: स्पर्श की उद्घोषणा और द्वैत का संकोचन
गाड़ी चली। पीछे छूटते गए वे भौतिक घर, दीवारें, आँगन, पेड़ और वे सारे सम्बोधन जिनसे मनुष्य का 'मैं' अपनी झूठी पहचान बनाता है। जब सारे बाहरी सहारे छूट जाते हैं, तब अंतःकरण जागता है।
धीरे-धीरे एक हाथ ने दूसरे हाथ को छुआ। वह स्पर्श हाड़-मांस की देह का लौकिक स्पर्श नहीं था। वह तो उपनिषद के 'तादात्म्य' और 'अध्यास' की पहली व्यावहारिक घोषणा थी— "अब तुम्हारा दुःख मेरा है, और मेरी प्रसन्नता तुम्हारी।"
यहीं से द्वैत की उस अभेद्य दीवार में पहली दरार पड़ती है, जिसे संसार 'स्वार्थ' कहता है। जब आप दूसरे के दुःख को अपने भीतर महसूस करने लगते हैं, तो आपकी सीमा फैल जाती है। अब आप केवल एक शरीर में बंद नहीं हैं; आपका विस्तार दूसरे शरीर तक हो गया है।
४. तृतीय सोपान: वास्तविक गृहप्रवेश और दहराकाश का विस्तार
गृहप्रवेश हुआ। दीप जले, आरती उतरी, मंगलध्वनि गूँजी। यह समाज का नियम था। किंतु ऋषियों की अंतर्दृष्टि कहती है—वास्तविक गृहप्रवेश किसी ईंट-गारे से बनी दीवारों के भीतर नहीं होता। वास्तविक गृहप्रवेश तो तब घटित होता है, जब एक आत्मा दूसरी आत्मा के 'दहराकाश' (हृदय के भीतर का सूक्ष्म आकाश) में सदा के लिए अपना स्थान पा लेती है। जब एक का अस्तित्व दूसरे के अस्तित्व को बिना किसी शर्त के अंगीकार कर लेता है, वही सच्चा प्रवेश है।
रात्रि उतरी। जगत का कोलाहल धीरे-धीरे विदा हो गया। सम्बंधों के स्वर, हँसी के झरने, उत्सव की तरंगें—सब मौन के महासागर में समा गए। अब शेष थे केवल दो। पर क्या सचमुच दो?
५. चतुर्थ सोपान: छायाओं का विलीनीकरण और 'हम' का प्राकट्य
कक्ष में एक अकेला दीपक जल रहा था। उसकी लौ के सम्मुख दो देह थीं, और उनकी दो छायाएँ थीं। पर जैसे-जैसे समय बीत रहा था, वे दोनों छायाएँ दीवार पर एक-दूसरे में इस तरह घुलने लगीं कि उनका पृथक अस्तित्व खोजना असंभव हो गया।
* प्रयाग का रूपक: जैसे गंगा और यमुना जब प्रयाग के पावन संगम पर मिलती हैं, तो कुछ दूर तक उनकी धाराओं का रंग अलग दिखता है, पर अंततः वे अपना नाम और रूप खोकर केवल 'समुद्रगामी महाजल' बन जाती हैं।
* राग का रूपक: जैसे दो अलग-अलग सुर जब एक सुंदर संगति में मिलते हैं, तो सुर खो जाते हैं और केवल एक 'राग' का वितान शेष रहता है।
* मंत्र का रूपक: जैसे दो भिन्न अक्षर मिलकर जब तक एक अर्थवान ध्वनि न बन जाएं, वे मंत्र की शक्ति नहीं पा सकते।
उस रात्रि का परम रहस्य देह का वासनात्मक रहस्य नहीं था; देह तो केवल एक भौतिक द्वार थी। रहस्य तो उस दिव्य क्षण में था, जब "मैं" और "तुम" अपने-अपने अहंकार के राजसी सिंहासन से नीचे उतरते हैं और एक नए तत्व का जन्म होता है जिसे संसार "हम" कहता है।
ऋषियों ने उद्घोष किया था—प्रेम का अंतिम फल अधिकार नहीं, समर्पण है। और समर्पण की अंतिम परिणति मिलन नहीं, बल्कि 'विलय' (Dissolution) है। जब तक कोई प्रेमी कहता है—"मैं तुमसे प्रेम करता हूँ", तब तक व्याकरण का दोष है, तब तक द्वैत जीवित है, क्योंकि वहाँ एक 'प्रेम करने वाला' है और एक 'जिससे प्रेम किया जा रहा है'। पर जिस क्षण कहने वाला भी खो जाए और सुनने वाला भी विलीन हो जाए, और केवल 'प्रेम' ही अपनी शुद्धतम अवस्था में शेष रह जाए—वहीं अद्वैत का शंखनाद होता है।
६. पंचम सोपान: "नेह नानास्ति किंचन" — वेदांत का साक्षात्कार
उस महारात्रि में न कोई विजेता था, न कोई पराजित। न कोई स्वामी था, न कोई दासी। न वह पुरुष था, न वह स्त्री थी। वे तो चेतना की दो धाराएँ थीं, जो अपने ही मूल उद्गम (सागर) की ओर बढ़ रही थीं। और सागर को कभी धाराओं के व्यक्तिगत नाम याद नहीं रहते।
'अद्वैत' का अर्थ एक जैसा हो जाना नहीं है; 'अद्वैत' का अर्थ है—भिन्न रहते हुए भी अभिन्न हो जाना।
| तत्व | बाह्य स्वरूप | आंतरिक अद्वैत |
| दीप और ज्योति | दो दिखते हैं | ज्योति के बिना दीप का कोई अस्तित्व नहीं |
| पुष्प और सुगंध | पुष्प दृश्य है, सुगंध अदृश्य | सुगंध ही पुष्प की आत्मा है |
| शब्द और अर्थ | शब्द शरीर है | अर्थ उसकी अंतश्चेतना है |
उस परम क्षण में न कोई दूल्हा था, न दुल्हन; न वर, न वधू; न पति, न पत्नी। वहाँ तो केवल एक ही अखंड चैतन्य था, जो दो रूपों में दर्पण की भांति स्वयं को ही निहार रहा था। और तभी वेदों का वह अत्यंत गूढ़ और अमर महावाक्य अनुभव की कसौटी पर उतरता है— नेह नानास्ति किंचन।
"यहाँ कोई द्वैत नहीं है, कोई भिन्नता नहीं है। जो सामने सम्मुख खड़ा है, वही मेरा आंतरिक स्वरूप है। जो प्रिय है, वही मेरी आत्मा है। और जो मेरी आत्मा है, वही साक्षात् ब्रह्म है।"
७. उपसंहार: प्रभात का नव-उन्मेष और जीवन की साध्य-साधना
प्रभात हुआ। कक्ष के द्वार खुले। संसार ने उनके चेहरों पर एक अलौकिक मुस्कान देखी। लोग समझे कि यह एक सफल विवाह की सुबह है। पर उन संसारी आँखों को क्या पता कि उस बंद कपाट के पीछे रात भर में केवल एक सामाजिक विवाह नहीं हुआ था, बल्कि साक्षात् 'एक उपनिषद घटित हुआ था'। दो सीमित और क्षुद्र अस्तित्वों ने असीमता और अमरत्व की दिशा में अपना पहला कदम रख दिया था।
तब जाकर मनुष्य को समझ में आता है कि विवाह कोई सामाजिक अनुबंध या गृहस्थी चलाने की मजबूरी नहीं है—यह तो 'आत्मा की सर्वोच्च साधना' है। प्रेम कोई क्षणिक शारीरिक भावना नहीं है—यह तो 'ब्रह्म' की ओर से मिलने वाला एक मौन संकेत है।
और इस संपूर्ण जीवन का अंतिम और शाश्वत सत्य यही है—न कोई पति है, न पत्नी; न मैं हूँ, न तुम हो। केवल वही एक परम तत्व शेष रहता है—जो दोनों के हृदयों में प्रेम बनकर धड़कता है, जो समर्पण बनकर आँखों से बहता है, और जो मौन की गहराइयों में साक्षात् ब्रह्म बनकर प्रकाशित होता है।
"द्वैत से अद्वैत तक की इसी महायात्रा का नाम प्रेम है, और प्रेम की इसी परिपूर्ण एकात्मता का नाम ब्रह्म है।"
॥ओम् तत् सत्॥
