पंजीकरण का जाल, 'पीएम केयर्स' का रहस्य और आरएसएस के बैंक खाते का यक्ष प्रश्न
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
पंजीकरण का जाल, 'पीएम केयर्स' का रहस्य और आरएसएस के बैंक खाते का यक्ष प्रश्न
एक आदर्श और कल्याणकारी लोकतंत्र की पहचान यह होती है कि वह अपने नागरिकों के लिए 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (व्यापार करने की सुगमता) और 'ईज ऑफ लिविंग' (जीवन जीने की सुगमता) सुनिश्चित करे। लेकिन समकालीन भारत के प्रशासनिक परिदृश्य पर नजर डालें, तो एक अजीबोगरीब और परेशान करने वाला विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ देश का आम नागरिक, छोटा दुकानदार, आरडब्ल्यूए (RWA) और घरेलू उद्यमी हैं, जिन्हें हर छोटे काम, जिम, स्विमिंग पूल या बैंक खाता खोलने के लिए भारी-भरकम पंजीकरण शुल्कों और कागजी भूलभुलैया में झोंक दिया गया है। दूसरी तरफ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसे देश के सबसे शक्तिशाली संगठन और 'पीएम केयर्स' जैसे सरकारी संरक्षण प्राप्त फंड हैं, जो बिना किसी पंजीकरण, विधिक ढांचे या सार्वजनिक जवाबदेही के अरबों-करोड़ों का वित्तीय साम्राज्य चला रहे हैं। यह विरोधाभास सवाल खड़ा करता है कि क्या इस देश में कानून की नजर वाकई सब पर बराबर है?
1. उत्तर प्रदेश का 'डबल इंजन' मॉडल: आम जनता से वसूली, जनसुनवाई पर ताला
'राम राज्य' और 'अच्छे दिनों' का दावा करने वाले उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र को देखिए। नोएडा और गाजियाबाद के अपार्टमेंट्स में रहने वाले मध्यमवर्गीय नागरिकों के लिए बने एक अदद जिम या स्विमिंग पूल के पंजीकरण की सालाना फीस 15-15 हजार रुपये तय कर दी गई है। अपार्टमेंट्स की रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) की पंजीकरण फीस कहने को तो 600 रुपये है, लेकिन विडंबना देखिए—600 रुपये की फीस देकर भी आरडब्ल्यूए को समय पर नवीनीकरण (Renewal) का आश्वासन नहीं मिलता, जबकि 15,000 रुपये की व्यावसायिक वसूली से बचने का आम नागरिक के पास कोई रास्ता नहीं है।
जब इस विसंगति के खिलाफ पीड़ित नागरिक मुख्यमंत्री कार्यालय या 'जनसुनवाई पोर्टल' का दरवाजा खटखटाते हैं, तो उन्हें जवाब मिलता है कि 'यह पुराना नियम है' (अर्थात इसमें कुछ नहीं बदला जा सकता)। हद तो तब हो जाती है जब मुख्यमंत्री कार्यालय के लोक शिकायत अनुभाग-5 से आधिकारिक मेल आता है: "मुख्यमंत्री कार्यालय के कार्यालय-ज्ञाप में ई-मेल के माध्यम से प्रेषित आवेदकों की शिकायतों का संज्ञान न लिये जाने का प्रावधान है..."
यह जवाब जनतंत्र के मुंह पर तमाचा है। जिस सरकार की यूएसपी (USP) त्वरित शिकायत निवारण का दावा थी, उसका शीर्ष कार्यालय ईमेल से भेजी गई शिकायतों को कानूनी तौर पर 'अस्वीकार्य' घोषित कर देता है। आम जनता के लिए कहीं कोई सुनवाई नहीं है।
2. छोटे व्यवसायियों पर 'कागजी राष्ट्रवाद' का बोझ और दम तोड़ता व्यापार
यही दमघोंटू स्थिति देश के छोटे दुकानदारों और 'प्रोपराइटरशिप' (स्वत्वाधिकारी) फर्म चलाने वाले युवाओं की है। साल 2014 से पहले, यदि कोई व्यक्ति अपने घर या मोहल्ले की छोटी दुकान से व्यापार शुरू करना चाहता था, तो उसे किसी जटिल पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होती थी। निश्चित टर्नओवर से कम होने पर न टैक्स का झंझट था, न पैन का। लेकिन डिजिटल इंडिया के दौर में बैंकों का ऐसा चौतरफा दबाव है कि बिना किसी न किसी सरकारी विभाग (जैसे शॉप एंड एस्टैब्लिशमेंट एक्ट) के पंजीकरण के आप चालू खाता (Current Account) खोल ही नहीं सकते।
यह पंजीकरण सिर्फ पैसे ऐंठने का जरिया बन चुके हैं। शॉप एक्ट के तहत पूछा जाता है कि 'साप्ताहिक अवकाश किस दिन रखेंगे?' अब घर से अकेले काम करने वाला फ्रीलांसर या छोटा दुकानदार क्या अवकाश रखेगा? लेकिन यदि फॉर्म में लिख दिया कि 'सातों दिन काम करेंगे', तो सरकार एकमुश्त फीस और बढ़ा देती है। यदि आपके पास दस्तावेज नहीं हैं, तो बैंक आपका खाता ब्लॉक कर देंगे।
# बैंकिंग सिस्टम से करोड़ों का नुकसान:
इस कागजी कड़ाई का आर्थिक दुष्परिणाम भी भयावह रहा है। सरकार ने काले धन पर प्रहार के नाम पर 4 लाख से ज्यादा तथाकथित 'शेल कंपनियां' बंद करा दीं। यदि इन कंपनियों के खातों में न्यूनतम 5000 रुपये की राशि भी फ्रीज हुई, तो बैंकिंग सिस्टम से करोड़ों रुपये एक झटके में बाहर हो गए। इस प्रक्रिया में कितने वास्तविक छोटे कारोबारी अपनी पूंजी गंवा बैठे और कितनों के धंधे बंद हो गए, इसका कोई सरकारी हिसाब नहीं है।
3. जब आम जनता के लिए 'पैन और पता' अनिवार्य, तो RSS का बैंक खाता कैसे चल रहा है?
अब इस सिक्के के दूसरे पहलू को देखिए, जहां देश का सबसे प्रभावी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) खड़ा है। जब एक छोटे से प्रोपराइटरशिप फर्म को खाता खोलने के लिए अपना पैन कार्ड, ऑफिस के पते का पुख्ता सबूत, और कई सरकारी अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) देने पड़ते हैं, तब यह बुनियादी और तीखा सवाल उठना लाजिमी है: "आरएसएस का बैंक खाता आखिर किस कानून के तहत और कैसे चल रहा है?"
* पंजीकरण से इनकार क्यों? संघ खुद को एक गैर-पंजीकृत सांस्कृतिक संगठन बताता है। प्रचारक और समर्थक इसके बचाव में तर्क देते हैं कि संघ को पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है।
* यक्ष प्रश्न: यदि 2014 के बाद देश के बैंकिंग नियमों को इतना सख्त कर दिया गया है कि बिना पैन और पते के सबूत के एक साधारण नागरिक का चालू खाता नहीं चल सकता, तो आरएसएस को यह विशिष्ट छूट क्यों? क्या बैंकों ने संघ के खातों के लिए अपने 'केवाईसी' (KYC) नियमों को शिथिल कर दिया है?
जो संगठन देश की सत्ता तय करता हो, जिसके इशारे पर प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री जैसे नीति-नियंता काम करते हों, उस संगठन के पास अपनी वित्तीय पारदर्शा के लिए कोई विधिक पंजीकरण न होना आधुनिक लोकतंत्र की स्थापित परिपाटी के खिलाफ है। यदि नए नियम आम लोगों के लिए जरूरी हैं, तो वे आरएसएस के लिए अनिवार्य क्यों नहीं होने चाहिए? क्या यह 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' का आधुनिक संस्करण नहीं है?
4. एनजीओ (NGO) पर शिकंजा, 'न्यूजक्लिक' और 'पीएम केयर्स' का दोहरा चरित्र
संस्थाओं की शुचिता को लेकर सरकार की नीति का दोहरापन गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और विदेशी चंदे (FCRA) के मामले में पूरी तरह नग्न हो जाता है। गृह मंत्रालय ने विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले एनजीओ के लिए 17 ऐसे कड़े नियम बनाए हैं, जिनके तहत जरा सी चूक पर उनका पंजीकरण रद्द कर दिया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में लगभग 2000 एनजीओ सरकारी शर्तों और फील्ड जांच की जटिलताओं को पूरा न कर पाने के कारण 'डिफॉल्टर' हो गए या उन्होंने अपने लाइसेंस के नवीनीकरण का आवेदन ही नहीं किया।
सरकार का तर्क है कि उसे विदेशी चंदे की 'नीयत' पर शक है। 'न्यूजक्लिक' जैसे मीडिया संस्थानों के मामले में सरकार ने जिस आक्रामकता के साथ जांच और पाबंदियां लगाईं, वह उसकी इस मंशा को जगजाहिर करता है। भले ही कोई एनजीओ विदेश से पैसा लाकर भारत के गरीब इलाकों में स्वास्थ्य या शिक्षा की मदद कर रहा हो, लेकिन यदि उसके दावों की पुष्टि में मामूली कागजी विसंगति भी मिलती है, तो उसे तुरंत 'देश विरोधी' या 'अवैध' घोषित कर दिया जाता है। "लेकिन सवाल तब उठता है जब यही पैमाना 'पीएम केयर्स फंड' (PM CARES) पर लागू नहीं होता।"
पीएम केयर्स फंड को विदेशी चंदा (FCRA) प्राप्त करने की पूरी छूट है, लेकिन यह सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे से बाहर है। इसमें आने वाले पैसे की ऑडिटिंग सीएजी (CAG) नहीं कर सकती। जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि इस फंड में किसने और क्यों पैसा दिया। जो पारदर्शिता सरकार छोटे एनजीओ से मांगती है, वही पारदर्शिता वह 'पीएम केयर्स' और 'आरएसएस' के मामले में क्यों छुपा ले जाती है?
## दोहरे मानदंडों से खोखला होता जनतंत्र
यह पूरा परिदृश्य दिखाता है कि वर्तमान शासन व्यवस्था में 'कानून का शासन' (Rule of Law) चयनात्मक हो चुका है। देश का मध्यमवर्ग और छोटे व्यापारी टैक्स और पंजीकरण के बोझ तले दबे जा रहे हैं; बैंक खातों के बंद होने से उनका दम घुट रहा है, और मुख्यमंत्री कार्यालय उनकी डिजिटल शिकायतों को रद्दी की टोकरी में डाल रहा है। वहीं दूसरी ओर, सत्ता के शीर्ष पर बैठे संगठन और फंड्स वित्तीय व विधिक जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त हैं।
जब तक शक्तिशाली संगठनों (जैसे आरएसएस) के बैंक खातों की विधिक जांच नहीं होगी, जब तक 'पीएम केयर्स' जैसे फंड पारदर्शी नहीं होंगे, तब तक आम जनता पर थोपे जाने वाले नियम केवल और केवल 'प्रशासनिक उत्पीड़न' ही कहलाएंगे। लोकतंत्र की नींव इस विश्वास पर टिकी है कि राजा और रंक, दोनों एक ही तराजू में तोले जाएं। यदि तराजू का एक पलड़ा सत्ता के प्रभाव से हमेशा हल्का बना रहेगा, तो नागरिकों का व्यवस्था से विश्वास उठना तय है।
