संस्थागत शुचिता का क्षरण, 'ऑपरेशन टाइगर' और जनादेश की संवैधानिक डकैती
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
संस्थागत शुचिता का क्षरण, 'ऑपरेशन टाइगर' और जनादेश की संवैधानिक डकैती
भारतीय लोकतंत्र का सबसे सुंदर और पवित्र दस्तावेज—भारत का संविधान—नागरिकों को संप्रभुता और जन-प्रतिनिधियों को जनता के प्रति जवाबदेही की गारंटी देता है। परंतु, समकालीन संसदीय राजनीति जिस भयावह और अनैतिक दौर से गुजर रही है, वह इस पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के वेंटिलेटर पर चले जाने का संकेत है। महाराष्ट्र की राजनीति में 'ऑपरेशन टाइगर' के नाम पर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) को एक बार फिर तोड़ने की कथित कवायद, सांसदों की १५-१५ करोड़ रुपये में खरीद-फरोख्त के संगीन आरोप, और इसके समानांतर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के २० सांसदों का एक अनाम दल में रातों-रात विलय करके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को परोक्ष समर्थन देना—महज राजनीतिक चतुराई या 'मास्टरस्ट्रोक' नहीं हैं। यह भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) की आत्मा की हत्या और करोड़ों मतदाताओं के पवित्र जनादेश पर डाली गई सुनियोजित 'संवैधानिक डकैती' है।
१. 'कमल' के सौंदर्य पर आघात और राजनीति का सर्कस
दशकों से भारतीय राजनीति ने सत्ता परिवर्तन के कई दौर देखे हैं, लेकिन सत्ता हथियाने के लिए 'ऑपरेशनों' की जो संस्कृति हाल के वर्षों में विकसित हुई है, उसने राजनीतिक विमर्श के स्तर को गर्त में धकेल दिया है। कर्नाटक, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में 'ऑपरेशन लोटस' चलाया गया। यह प्रकृति की सबसे अनुपम और पवित्र रचना—कमल के फूल—का घोर राजनीतिक अपमान था। कमल की विशेषता यह है कि वह कीचड़ में खिलकर भी बेदाग रहता है और देवताओं के चरणों में अर्पण के योग्य होता है। लेकिन बेदाग सौंदर्य के इस प्रतीक को विधायकों और सांसदों की मंडी सजाने, लालच और केंद्रीय जांच एजेंसियों के डर के बूते सत्ता छीनने वाले कृत्य का कोड-नेम (Code-Name) बना दिया गया।
अब महाराष्ट्र की धरती पर 'ऑपरेशन टाइगर' और 'वेट एंड वॉच' के पोस्टर लहरा रहे हैं। 'टाइगर' (शेर) स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना की अनझुकी रीढ़ और निर्भीक पहचान का प्रतीक रहा है। एकनाथ शिंदे गुट खुद को असली उत्तराधिकारी साबित करने के लिए अब शेरों की गिनती अपने पाले में दिखाने को बेताब है। परंतु, शिंदे गुट के कार्यकर्ताओं और देश के नागरिकों को यह बुनियादी फर्क समझना होगा कि: "सर्कस में रिंग मास्टर के कोड़े और इशारों पर नाचने वाले शेर, और जंगल में अपनी संप्रभु मर्जी से दहाड़ने वाले शेर के बीच एक बुनियादी और नैतिक अंतर होता है। सत्ता के संरक्षण में पलने वाला शेर कभी भी लोक-चेतना का प्रतीक नहीं हो सकता।"
२. वैचारिक परिवर्तन बनाम जनादेश से विश्वासघात: दलबदल की विधिक अराजकता
राजनीति शास्त्र का यह बुनियादी नियम है कि यदि किसी जन-प्रतिनिधि की विचारधारा बदलती है, तो वह पूरी ईमानदारी से अपने पद से इस्तीफा दे और नई विचारधारा के साथ जनता की अदालत में दोबारा जाए। लेकिन समकालीन परिदृश्य में जो हो रहा है, वह अनैतिकता की पराकाष्ठा है।
पश्चिम बंगाल का उदाहरण लोकतंत्र के माथे पर कलंक की तरह है। साल २०२४ के आम चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के जिन २० सांसदों को जनता ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) की नीतियों के खिलाफ, धुर-विरोधी के रूप में चुनकर संसद भेजा था, वे सांसद रातों-रात एनसीपीआई (NCPI) नामक एक अनजानी पार्टी बनाकर एनडीए के पाले में खड़े हो जाते हैं। ये २० सांसद कम से कम एक करोड़ से अधिक मतदाताओं की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
* जनता के साथ छल: जिस मतदाता ने चिलचिलाती धूप में लाइन में खड़े होकर भाजपा को हराने के लिए वोट दिया था, उसके वोट को इन सांसदों ने अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और सुरक्षा के लिए सत्ता पक्ष की वेदी पर चढ़ा दिया।
* नैतिकता की कसौटी: 'युद्ध और प्रेम में सब जायज है' जैसे कुतर्क अनैतिक ताकतों ने अपनी सुविधा के लिए गढ़े हैं। लोकतंत्र में केवल वही जायज है जो नैतिकता, शुचिता और कानून की कसौटी पर शत-प्रतिशत खरा उतरे।
३. संसद में संख्याबल की हवस और संविधान पर मंडराता खतरा
आखिर आम चुनाव बीतने के बाद भी विपक्ष के खेमे में इस कदर तोड़-फोड़ मचाने की जरूरत क्यों आन पड़ी है? इसका सीधा संबंध संसदीय संतुलन और संविधान की रक्षा से जुड़ा है। साल २०२४ में सत्ता पक्ष ने 'चार सौ पार' का नारा इसलिए दिया था ताकि संसद में बिना किसी प्रतिरोध के संविधान की मूल संरचना में मनमाना बदलाव किया जा सके। देश की जनता ने सूझबूझ दिखाते हुए सत्ता को २४० सीटों पर समेट दिया, जिससे संविधान पर आया तात्कालिक संकट टल गया था।
परंतु, कार्यपालिका अब संसद के भीतर अपने पूर्ण वर्चस्व और एकाधिकार को दोबारा हासिल करने के लिए बेताब है। बीते १७ अप्रैल को संसद के विशेष सत्र के दौरान विपक्ष (INDIA Block) की अभूतपूर्व एकजुटता के कारण ही सरकार अपना 'संविधान संशोधन विधेयक' पारित नहीं करवा पाई थी। इस विधायी पराजय ने सत्ता प्रतिष्ठान को यह समझा दिया कि वर्तमान संख्याबल के साथ वे संसद में अपनी मनमर्जी नहीं चला सकते। चूंकि वे विपक्ष के गठबंधन में सीधे दरार नहीं डाल पा रहे हैं, इसलिए उन्होंने विपक्षी दलों के भीतर 'संवैधानिक सर्जिकल स्ट्राइक' शुरू कर दी है। पहले टीएमसी और अब पुनः शिवसेना (यूबीटी) को निशाना बनाना इसी रणनीतिक हताशा का परिणाम है।
४. लोकसभा अध्यक्ष की परीक्षा और दसवीं अनुसूची की सीमाएं
इस गहरे संकट के बीच, शिवसेना (यूबीटी) ने लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) ओम बिड़ला को एक आधिकारिक पत्र सौंपकर बेहद गंभीर संवैधानिक मांग की है। पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि संसद में केवल उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले दल को ही एकमात्र आधिकारिक राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दी जाए और किसी भी बागी या स्वतंत्र गुट को कोई भी विशेषाधिकार न मिले। साथ ही, पार्टी ने संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के तहत कार्रवाई का अपना विधिक अधिकार सुरक्षित रखा है।
अब गेंद लोकसभा अध्यक्ष के पाले में है, और यह पद इस समय भारतीय इतिहास की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा से गुजर रहा है। अतीत में हमने देखा है कि कैसे दलबदल विरोधी कानून के तहत फैसलों को महीनों और सालों तक लटका कर बागी गुटों को अवैध रूप से सत्ता का सुख भोगने दिया गया। यदि इस बार भी संसदीय पीठ ने निष्पक्षता के बजाय राजनीतिक झुकाव का परिचय दिया, तो यह देश की सर्वोच्च विधायी संस्था की साख पर ऐसा दाग होगा जिसे कभी धोया नहीं जा सकेगा।
५. डर, लालच और स्वार्थ की त्रिमूर्ति: क्या राजनीति बेजान हो चुकी है?
जैसा कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के संदर्भ में रेखांकित किया कि कैसे उनके विधायकों, एमएलसी और राज्यसभा सांसदों को तोड़ा गया। यह सवाल केवल किसी एक दल का नहीं है। आज भाजपा सत्ता में है और वह इस तकनीक का इस्तेमाल कर रही है; कल यदि कोई दूसरा दल सत्ता में आएगा, तो वह भी इसी रास्ते पर चल पड़ेगा।
दलबदल के इस पूरे खेल के पीछे तीन ही मुख्य कारक काम कर रहे हैं: "स्वार्थ, लालच और डर (ED, CBI और आयकर जैसी जांच एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल)।" राजनीति में जब तक नैतिकता का पूरी तरह लोप नहीं होता, तब तक कोई भी नेता अपनी मूल पार्टी को धोखा नहीं दे सकता। राजनैतिक विश्लेषकों और मुख्यधारा के मीडिया (Mainstream Media) का एक बड़ा हिस्सा जो इन दलबदलों को 'चाणक्य नीति' या 'मास्टरस्ट्रोक' कहकर महिमामंडित करता है, वह वास्तव में राजनीतिक भ्रष्टाचार का वैचारिक सरपरस्त बन चुका है।
## ईमानदार राजनीति का पुनरुत्थान ही एकमात्र विकल्प
यह पूरा प्रकरण यह साबित करता है कि दलबदल विरोधी कानून (10th Schedule) अब पूरी तरह अप्रासंगिक और दंतविहीन हो चुका है। राजनेता और उनके कानूनी सलाहकार इस कानून की कमियों का फायदा उठाकर पूरे के पूरे विधायी दल का ही अपहरण कर रहे हैं।
यदि इस सिलसिले को यहीं नहीं रोका गया, तो चुनाव और लोकतंत्र केवल एक दिखावा बनकर रह जाएंगे। जनता वोट देती रहेगी और सत्ता के सौदागर बंद कमरों में करोड़ों रुपये की थैलियां खोलकर जनादेश को बदलते रहेंगे। इस व्यवस्था को बचाने का एकमात्र तरीका यह है कि देश का नागरिक वर्ग जागृत हो और दलबदलुओं को सामाजिक व राजनीतिक रूप से पूरी तरह बहिष्कृत करे। राजनीति में शुचिता और ईमानदारी को पुनस्र्थापित करना निश्चित रूप से एक कठिन और भगीरथ कार्य है, लेकिन भारत के लोकतंत्र को तानाशाही और कॉरपोरेट डकैती से बचाने के लिए यह अपरिहार्य है। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ताएं निरंकुश हुई हैं, तब-तब इस देश की जनता ने ही व्यवस्था को सुधारा है, और इस बार भी अंतिम फैसला जनता की अदालत में ही होना है।
