पत्रकारिता का स्वर्णयुग बनाम ‘अमृतकाल’ का दरबारी युग

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


पत्रकारिता का स्वर्णयुग बनाम ‘अमृतकाल’ का दरबारी युग

"जब कलम सत्ता से बड़ी थी, और आज सत्ता की प्रेस विज्ञप्ति ही पत्रकारिता बनती जा रही है।"

भारतीय पत्रकारिता का इतिहास केवल अख़बारों, चैनलों और न्यूज़रूम का इतिहास नहीं है। यह उस संघर्ष का इतिहास है जिसमें कलम ने तलवार को चुनौती दी, सत्य ने सत्ता से टक्कर ली और कुछ लोगों ने अपने करियर, स्वतंत्रता और कभी-कभी अपना जीवन तक दांव पर लगाकर जनता के जानने के अधिकार की रक्षा की।

लेकिन आज जब हम पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति को देखते हैं, तो एक असहज प्रश्न सामने खड़ा हो जाता है— "क्या हम सचमुच पत्रकारिता के युग में जी रहे हैं, या पत्रकारिता के वेश में जनसंपर्क (PR), राजनीतिक प्रचार और कॉर्पोरेट प्रबंधन के युग में प्रवेश कर चुके हैं?"


## जब पत्रकारिता मिशन थी, पेशा नहीं


भारतीय पत्रकारिता का स्वर्णिम दौर वह था जब पत्रकार सत्ता के दरबारों में नहीं, जनता के बीच पाए जाते थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारिता का अर्थ था जोखिम उठाना।


* गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर की गलियों में सांप्रदायिक हिंसा रोकते हुए शहीद हो गए, लेकिन सत्ता के सामने झुके नहीं।

* बाल गंगाधर तिलक ने "केसरी" के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी और जेल गए।

* माखनलाल चतुर्वेदी ने पत्रकारिता को राष्ट्रनिर्माण का उपकरण माना, न कि करियर निर्माण का।


उन दिनों पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता के निकट जाना नहीं था। उद्देश्य था सत्ता को जनता के निकट लाना।


## आपातकाल: पत्रकारिता की अग्निपरीक्षा


यदि भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में किसी कालखंड को उसकी सबसे बड़ी परीक्षा कहा जाए, तो वह था भारतीय आपातकाल। जब सेंसरशिप लागू हुई, अख़बारों के पन्ने खाली छोड़े गए। उसी समय एक प्रसिद्ध टिप्पणी सामने आई— "जब उनसे झुकने को कहा गया, तो वे रेंगने लगे।"


यह टिप्पणी केवल उस समय के पत्रकारों के लिए नहीं थी। यह हर युग के लिए चेतावनी थी। क्योंकि पत्रकारिता का असली संकट सेंसरशिप नहीं होता।


असली संकट आत्म-सेंसरशिप होता है। जब पत्रकार बिना आदेश के ही समझ जाए कि क्या नहीं बोलना है, तब लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच टूटने लगता है।


## तब बीट रिपोर्टर होते थे, आज ब्रांड एंबेसडर हैं


1990 और 2000 के दशक तक अधिकांश बड़े पत्रकारों की अपनी-अपनी बीट होती थी।


* कोई संसद कवर करता था।

* कोई विदेश नीति।

* कोई कृषि।

* कोई श्रम आंदोलन।

* कोई न्यायपालिका।


पत्रकार का मूल्य उसकी जानकारी से तय होता था। आज अनेक मामलों में मूल्य उसकी पहुँच (access) से तय होता है।


* वह किस मंत्री के साथ फोटो खिंचवा सकता है।

* किस मुख्यमंत्री के विमान में बैठ सकता है।

* किस उद्योगपति के निजी कार्यक्रम में आमंत्रित होता है।

* किस दल का "विश्वसनीय चेहरा" माना जाता है।


यही वह बिंदु है जहाँ पत्रकारिता धीरे-धीरे सूचना से हटकर प्रभाव के कारोबार में बदलने लगती है।


## पत्रकार से प्रभावक (Influencer) बनने की यात्रा


आज का एक बड़ा संकट यह है कि पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता के बीच की रेखा धुंधली हो चुकी है। कई पत्रकार अब खबरें नहीं करते, नैरेटिव चलाते हैं। वे तथ्यों की जांच नहीं करते, अपने पक्ष की पुष्टि खोजते हैं। उनका लक्ष्य सूचना देना नहीं, अपने दर्शकों की वैचारिक भूख को संतुष्ट करना होता है।


परिणाम यह है कि पत्रकारिता धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संस्था से बदलकर डिजिटल अखाड़ा बनती जा रही है। जहाँ बहस कम और निष्ठा अधिक दिखाई देती है।


## कॉर्पोरेट नियंत्रण: मीडिया या व्यवसाय?


एक तथ्य यह भी है कि पिछले तीन दशकों में मीडिया उद्योग की संरचना पूरी तरह बदल गई है। समाचार संस्थान अब केवल समाचार संस्थान नहीं रहे। वे बड़े कॉर्पोरेट समूहों का हिस्सा हैं। उनकी आय का बड़ा स्रोत पाठक नहीं, विज्ञापनदाता हैं। ऐसे में अक्सर पत्रकारिता और व्यावसायिक हितों के बीच टकराव पैदा होता है।


जब किसी उद्योगपति पर रिपोर्ट लिखने से पहले विज्ञापन विभाग की प्रतिक्रिया का अनुमान लगाना पड़े, तब समस्या केवल पत्रकार की नहीं रह जाती। वह पूरी संरचना की समस्या बन जाती है।


## "अमृतकाल" का नया पत्रकार


आज एक नई प्रजाति विकसित हुई है। यह पत्रकार कम और दरबारी अधिक है।


इसकी पहचान सरल है—


* यह सत्ता से कठिन प्रश्न नहीं पूछता।

* यह विपक्ष से कठिन प्रश्न पूछकर स्वयं को निष्पक्ष घोषित कर देता है।

* यह प्रेस कॉन्फ़्रेंस में प्रश्न नहीं, अवसर खोजता है।

* यह स्टूडियो में बहस नहीं, अभियोजन चलाता है।

* यह जनता के लिए नहीं, एल्गोरिद्म के लिए काम करता है।

* यह सच से अधिक ट्रेंडिंग विषयों के प्रति प्रतिबद्ध होता है।


ऐसे पत्रकारों की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं कि वे पक्षपाती हैं। समस्या यह है कि वे स्वयं को पक्षपाती मानने को भी तैयार नहीं होते।


## औकात का प्रश्न


"औकात" शब्द कठोर लग सकता है, लेकिन लोकतंत्र में पत्रकार की औकात क्या है?


* पत्रकार की औकात मंत्री से ऊपर नहीं होती।

* न्यायाधीश से ऊपर नहीं होती।

* प्रधानमंत्री से ऊपर भी नहीं होती।

* लेकिन पत्रकार की औकात किसी मंत्री के चरणों में बैठने की भी नहीं होती।


पत्रकार की औकात जनता के प्रतिनिधि की होती है। वह जनता की ओर से प्रश्न पूछता है। उसकी शक्ति उसके पद में नहीं, उसकी विश्वसनीयता में होती है। जिस दिन वह सत्ता का मित्र बन जाता है, उसी दिन वह जनता का प्रतिनिधि रहना बंद कर देता है।


## युवा पत्रकारों के लिए सबसे बड़ा सबक


आज पत्रकारिता के विद्यार्थियों को यह समझना होगा कि पत्रकारिता का उद्देश्य प्रसिद्ध होना नहीं है। पत्रकारिता का उद्देश्य उपयोगी होना है।


टेलीविजन की चमक, सोशल मीडिया के लाखों फॉलोअर, पुरस्कार, विदेशी यात्राएँ, सरकारी समितियाँ और राजनीतिक संपर्क—इनमें से कोई भी पत्रकारिता की गुणवत्ता का प्रमाण नहीं है।


यदि पत्रकार जनता की ओर से प्रश्न नहीं पूछ सकता, तो वह चाहे जितना प्रसिद्ध हो, वह केवल एक प्रभावशाली वक्ता हो सकता है, लेकिन पत्रकार कदापि नहीं।


## इतिहास का कठोर फैसला


इतिहास बहुत निर्मम होता है।


* वह यह नहीं पूछता कि किसी पत्रकार के कितने फॉलोअर थे।

* वह यह नहीं पूछता कि उसे कितने पुरस्कार मिले।

* वह यह भी नहीं पूछता कि उसके कितने राजनीतिक मित्र थे।


इतिहास केवल एक प्रश्न पूछता है— "जब सत्ता सबसे शक्तिशाली थी, तब तुम किसके साथ खड़े थे?"


* सत्य के साथ या सुविधा के साथ?

* जनता के साथ या दरबार के साथ?


क्योंकि अंततः पत्रकारिता की पहचान उसके स्टूडियो की रोशनी से नहीं होती।


उसकी पहचान उस अंधेरे से होती है, जिसमें वह सच की मशाल लेकर उतरने का साहस रखती है। और जब पत्रकार मशाल छोड़कर दरबार की झूमरों के नीचे खड़ा हो जाए, तब समझ लेना चाहिए कि पत्रकारिता का संकट सत्ता की ताकत नहीं, पत्रकार के चरित्र का संकट बन चुका है।