शिकायतों का बूढ़ा हो जाना
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
शिकायतों का बूढ़ा हो जाना
शिकायतें बूढ़ी हो चली हैं अब।
पहले जैसी चंचल नहीं रहीं,
हर बात पर रूठ जाने वाली,
हर छोटी उपेक्षा पर शोर मचाने वाली
वो शिकायतें अब
धीमे कदमों से चलती हैं।
कम बोलती हैं।
बहुत कुछ देखकर,
बहुत कुछ सहकर,
बहुत कुछ अनकहा निगलकर
उन्होंने सीख लिया है
कि हर बात कह देना
हर बार ज़रूरी नहीं होता।
वे अब जल्दी थक जाती हैं।
किसी पुराने बरगद की छाँव तले बैठी
किसी वृद्धा की तरह
एक कोने में जाकर सुस्ता लेती हैं,
फिर धीरे-धीरे
अपने ही अतीत के पन्ने उलटती रहती हैं।
उन्हें याद आते हैं वे दिन
जब उनकी आवाज़ सुनी जाती थी,
जब उनका होना
किसी रिश्ते की धड़कन हुआ करता था।
क्योंकि शिकायत वहीं जन्म लेती है
जहाँ उम्मीद बची होती है।
जहाँ प्रेम होता है,
जहाँ अपनापन होता है,
जहाँ यह विश्वास होता है
कि सामने वाला समझेगा।
इसलिए वे फिर उठती हैं,
धीरे-धीरे चल पड़ती हैं,
कुछ कहने,
कुछ सुनने,
कुछ समझाने,
कुछ समझने।
उन्हें लगता है—
शायद इस बार बात बन जाए,
शायद इस बार कोई सुन ले,
शायद इस बार कोई कह दे—
"हाँ, मुझे पता है,
तुम्हें तकलीफ़ हुई थी।"
और इतना सुन लेना ही
कई शिकायतों का मोक्ष होता है।
लेकिन समय के साथ
शिकायतें भी समझदार हो जाती हैं।
उन्हें पता चल जाता है
कि कुछ दरवाज़े अब नहीं खुलेंगे,
कुछ आवाज़ें अब नहीं लौटेंगी,
कुछ लोग अब सुनने की स्थिति में नहीं हैं।
तब वे ज़िद छोड़ देती हैं।
धीरे-धीरे
उनकी आवाज़ क्षीण होने लगती है।
और फिर एक दिन
वे बहुत थक जाती हैं।
इतनी थक जाती हैं
कि बोलना बंद कर देती हैं।
न कोई प्रश्न,
न कोई उलाहना,
न कोई गिला।
बस एक लंबी खामोशी।
और अजीब बात यह है
कि उस दिन लोग अक्सर राहत महसूस करते हैं।
उन्हें लगता है—
चलो, अब सब ठीक है।
लेकिन सच यह नहीं होता।
सच यह होता है कि
शिकायतों का मर जाना
रिश्तों के स्वस्थ होने का प्रमाण नहीं,
कई बार उनके भीतर से
उम्मीद के मर जाने का प्रमाण होता है।
फिर जब कई दिनों तक
कोई शिकायत नहीं आती,
कोई उलाहना नहीं मिलता,
कोई प्रतीक्षा नहीं दिखती,
तब कोई पूछता है—
"क्या नहीं रहीं शिकायतें?"
और कोई धीमे से कहता है—
"हाँ...
अब नहीं रहीं।"
उस उत्तर में
एक अजीब-सी उदासी होती है।
क्योंकि शिकायतों के साथ
केवल शिकायतें नहीं मरतीं।
उनके साथ मर जाती हैं
कई प्रतीक्षाएँ,
कई संवाद,
कई आग्रह,
कई उम्मीदें,
कई अधूरे स्पष्टीकरण।
और बहुत कुछ
दफ़न हो जाता है
उनकी कब्र के आसपास।
प्रेम भी कभी-कभी।
अपनापन भी।
और वह विश्वास भी,
जो किसी समय
दो लोगों के बीच
एक पुल की तरह खड़ा था।
इसलिए यदि कोई आपसे शिकायत करता है,
तो उसे केवल शिकायत मत समझिए।
वह शायद यह कह रहा होता है—
"मैं अब भी तुम्हें खोना नहीं चाहता।"
क्योंकि सबसे भयावह स्थिति
शिकायतों का होना नहीं,
शिकायतों का
हमेशा के लिए
चुप हो जाना है।
शायद इसलिए रिश्तों में शिकायतें दुश्मन नहीं होतीं; वे उस अंतिम दीपक की तरह होती हैं जो बुझने से पहले भी यह संकेत देता रहता है कि भीतर अभी कुछ प्रकाश बाकी है। जब वह दीपक बुझ जाता है, तब अंधेरा केवल कमरे में नहीं, स्मृतियों में भी उतर आता है।
