पश्चिम एशिया की अंतहीन विभीषिका और वैश्विक कूटनीति का अंतर्विरोध
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
पश्चिम एशिया की अंतहीन विभीषिका और वैश्विक कूटनीति का अंतर्विरोध
पश्चिम एशिया की धरती एक बार फिर इतिहास के सबसे खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। लेबनान पर इज़रायल के लगातार होते विनाशकारी हमले, बेरूत को मलबे में तब्दील करने की धमकियां और इसके प्रत्युत्तर में ईरान की जवाबी आक्रामकता ने इस पूरे क्षेत्र को एक ऐसे बारूद के ढेर में बदल दिया है, जिसकी चिंगारी वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति को झुलसाने के लिए पर्याप्त है। इस महासमर के बीच सबसे दिलचस्प और गंभीर मोड़ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के रिश्तों में आई वह दरार है, जो अब छिपने से भी नहीं छिप रही है। राजनीति में अक्सर अपने क्षणिक हितों के लिए अनियंत्रित ताकतों को शह दी जाती है, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब वे ताकतें अपनी सीमाएं लांघने लगती हैं, तो वे स्वयं अपने आकाओं के लिए 'भस्मासुर' सिद्ध होती हैं। आज व्हाइट हाउस और तेल अवीव के बीच का कूटनीतिक तनाव इसी कटु सत्य की तस्दीक कर रहा है।
व्हाइट हाउस से लीक हुई यह कूटनीतिक तल्खी—जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा नेतन्याहू को बेहद सख्त और अमर्यादित लहजे में फटकार लगाने की बात सामने आई है—महज एक व्यक्तिगत गुस्सा नहीं है। यह असल में वाशिंगटन की उस हताशा का प्रकटीकरण है, जहाँ वह अपनी ही बनाई रणनीतियों के जाल में उलझ चुका है। इज़रायल को अब तक मिले बिना शर्त अमेरिकी सैन्य और राजनैतिक संरक्षण ने नेतन्याहू को इस कदर आक्रामक बना दिया है कि वे अब अमेरिकी कूटनीति की सीमाओं को भी लांघ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) द्वारा २१ नवंबर २०२४ को युद्ध अपराधी घोषित किए जाने और गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बावजूद नेतन्याहू का यह अड़ियल रुख उनकी अपनी राजनैतिक उत्तरजीविता (Survival) का आखिरी दांव है। चाहे पर्दे के पीछे एपस्टीन फाइल्स का ब्लैकमेल कूटनीति हो या कोई अन्य रणनीतिक मजबूरी, यह साफ है कि दोनों नेताओं की युद्धपिपासु प्रवृत्तियों ने दुनिया को तबाही के मुहाने पर ला खड़ा किया है।
इस युद्ध की सबसे भारी कीमत अब दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों को चुकानी पड़ रही है। ईरान द्वारा 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को आंशिक या पूर्ण रूप से बाधित किए जाने के बाद अब 'बाब अल-मंदाब' (Bab al-Mandab) पर मंडराता खतरा वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए 'डेथ वारंट' जैसा है।
# बाब अल-मंदाब: वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा : लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाला यह संकरा जलमार्ग दुनिया के कुल कंटेनर ट्रैफिक का लगभग ३० प्रतिशत वहन करता है। रोज़ाना ४० से ७० लाख बैरल कच्चा तेल और एलएनजी (LNG) इसी रास्ते से होकर यूरोप और अमेरिका तक पहुँचती है।
यदि यमन के हूती विद्रोहियों और ईरान के समन्वय से यह मार्ग पूरी तरह ठप होता है, तो अंतरराष्ट्रीय जहाजों को अफ्रीका के 'केप ऑफ गुड होप' का चक्कर लगाकर लंबा रास्ता तय करना होगा। इसका सीधा अर्थ है:
* यात्रा के समय में १० से १४ दिनों की भारी वृद्धि।
* माल ढुलाई (Freight) और समुद्री बीमे (Insurance) के खर्च में बेतहाशा बढ़ोतरी।
* वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट और कमोडिटी बाज़ारों में अनियंत्रित मुद्रास्फीति (Inflation)।
डोनाल्ड ट्रम्प की नेतन्याहू को दी गई कड़े शब्दों में चेतावनी इसी आर्थिक महाविनाश के डर से उपजी है, क्योंकि ईरान के साथ परोक्ष शांति वार्ता (बैक-चैनल डिप्लोमेसी) के टूटने से अमेरिका की घरेलू अर्थव्यवस्था और सामरिक साख दांव पर लग गई है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची का यह बयान कि "एक मोर्चे पर युद्धविराम का उल्लंघन, सभी मोर्चों पर युद्धविराम का उल्लंघन माना जाएगा," वाशिंगटन को यह समझाने के लिए काफी है कि वह टुकड़ों-टुकड़ों में शांति की बिसात नहीं बिछा सकता।
रूस, चीन और यहाँ तक कि यूरोपीय संघ के कई देश जहाँ इस आक्रामकता की खुलकर आलोचना कर रहे हैं और ओमान वार्ता जैसी शांति पहलों को बहाल करने की वकालत कर रहे हैं, वहीं भारत की इस पूरे मामले पर कूटनीतिक चुप्पी और इज़रायल के प्रति झुकाव नीतिगत गलियारों में तीखे सवाल खड़े करता है। मुख्य विपक्षी दल द्वारा प्रधानमंत्री की प्राथमिकताओं पर उठाए गए सवाल—कि क्या उनके लिए अपनी वास्तविक मातृभूमि से अधिक वैश्विक भू-राजनीतिक संबंध मायने रखते हैं—शायद राजनैतिक भाषा में तीखे हो सकते हैं, लेकिन वे भारत की पारंपरिक 'गुटनिरपेक्ष' और संतुलित विदेश नीति के विचलन की ओर जरूर इशारा करते हैं।
भारत इस समय वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ बनने की कगार पर है। ऐसे में ऊर्जा सुरक्षा, लाखों प्रवासी भारतीयों के हित और अरब देशों के साथ हमारे द्विपक्षीय आर्थिक संबंध हमें किसी एक खेमे में खड़े होने की इजाजत नहीं देते। नई दिल्ली को यह समझना होगा कि पश्चिम एशिया की इस आग में यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था स्वाहा होती है, तो भारत का 'विकसित भारत' बनने का सपना भी अछूता नहीं रहेगा। कूटनीतिक संतुलन समय की मांग है, और इतिहास हमेशा मूकदर्शियों से भी उनके मौन का हिसाब मांगता है।
