अकेला नागरिक' और रक्षक का तराजू — क्या व्यवस्था के सवालों की कीमत जान से चुकाई जाएगी?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


'अकेला नागरिक' और रक्षक का तराजू — क्या व्यवस्था के सवालों की कीमत जान से चुकाई जाएगी?

समकालीन भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य से उभरती कुछ घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था का संकट नहीं होतीं, बल्कि वे हमारे पूरे संवैधानिक ढांचे, न्यायिक शुचिता और नागरिक गरिमा के अस्तित्व पर एक गहरा यक्ष प्रश्न खड़ा कर देती हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल साक्ष्यों और जन-आक्रोश के केंद्र में आया 'भरत तिवारी कथित फेक एनकाउंटर' मामला इसी श्रेणी का एक ज्वलंत उदाहरण है। यह त्रासदी केवल एक गरीब और निर्दलीय नागरिक की असमय मृत्यु का विषय नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा राष्ट्रीय मुद्दा है जो हमारी राजनैतिक, संवैधानिक, विधिक और सामाजिक चेतना के खोखलेपन को उजागर करता है।


जब व्यवस्था से सवाल पूछने वाले, पक्ष-विपक्ष की विसंगतियों को आईना दिखाने वाले और जनता के अधिकारों की बात करने वाले एक अकेले नागरिक की जान की कीमत इतनी सस्ती हो जाए, तो दुष्यंत कुमार के शब्दों में यह पूछना अनिवार्य हो जाता है कि—शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए, यह बुनियाद आखिर किस दिशा में हिल रही है?


1. राजनैतिक दृष्टिकोण: 'वोटबैंक' का चश्मा और मरणोपरांत राजनीति


इस घटना का सबसे वीभत्स पहलू समकालीन राजनीति का चयनात्मक चरित्र (Selective Character) है।


* जीवित रहते हुए उपेक्षा: जब भरत तिवारी जीवित थे और क्षेत्र, राज्य तथा देश के विकास के लिए बुनियादी सवाल उठा रहे थे, तब न तो सत्तापक्ष उनके साथ खड़ा था और न ही विपक्ष। क्योंकि वे किसी स्थापित राजनीतिक दल के एजेंट नहीं थे और न ही उनके पीछे कोई मजबूत जातिगत या धार्मिक वोटबैंक का सुरक्षा कवच था। व्यवस्था के सामने एक 'अकेले' और 'गरीब' नागरिक की आवाज को दबाना हमेशा से सबसे आसान रहा है।

* मरणोपरांत गिद्ध-राजनीति: संकट तब और गहरा जाता है जब वही राजनीतिक दल, जो किसी व्यक्ति के जीवित रहते उसके विचारों से कन्नी काटते हैं, उसकी मृत्यु के बाद उसकी जाति, धर्म या सरनेम का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए करने लगते हैं। यह राजनीति का वह घिनौना चेहरा है जहां न्याय की मांग भी चुनावी समीकरणों को देखकर तय की जाती है।


2. संवैधानिक दृष्टिकोण: 'अनुच्छेद 21' की अवहेलना और राज्य का चरित्र


भारत का संविधान हर नागरिक को, चाहे वह कितना भी गरीब या असहाय क्यों न हो, गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है।


* जीवन का अधिकार (Article 21): संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure established by law) के बिना उसके जीवन से वंचित नहीं किया जा सकता। जब पुलिसिया तंत्र त्वरित न्याय (Instant Justice) या 'एनकाउंटर' को एक प्रशासनिक नीति के रूप में अपनाने लगता है, तो वह अनजाने में संविधान के मूल ढांचे पर प्रहार करता है।

* सवाल पूछने का अधिकार: लोकतंत्र की आत्मा 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' (अनुच्छेद 19) में निहित है। यदि कोई नागरिक अधिकारियों, मीडिया या राजनेताओं से जवाब मांगता है, तो राज्य का दायित्व उसे सुरक्षा देना है, न कि उसे 'पागल', 'अपराधी' या 'देशद्रोही' घोषित करके उसके खिलाफ दंडात्मक बल का प्रयोग करना।


3. विधिक परिप्रेक्ष्य: वायरल साक्ष्य बनाम पुलिसिया थ्योरी का द्वंद्व


विधिक और कानूनी धरातल पर यह मामला पूरी तरह से 'कानून के शासन' (Rule of Law) की अग्निपरीक्षा है।


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                       [ विधिक अंतर्विरोध ]

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        (पुलिसिया दावा) (सोशल मीडिया साक्ष्य)

  "आत्मरक्षा में चलाई गोली, "हथियार फेंककर समर्पण का प्रयास,

   हथियार तानने पर कार्रवाई" कोई जवाबी हमला नहीं"

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                      [ न्यायिक जांच की मांग ]


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* साक्ष्यों का विरोधाभास: पुलिस का पारंपरिक तर्क होता है कि अपराधी ने उन पर हथियार ताना, इसलिए आत्मरक्षा (Self-Defense) में गोली चलानी पड़ी। परंतु, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो—जिसमें कथित तौर पर पीड़ित द्वारा अपनी बंदूक पुलिस की तरफ फेंककर निहत्था होने की बात सामने आ रही है—इस थ्योरी को गंभीर विधिक कटघरे में खड़ा करता है।

* न्यायिक गाइडलाइंस का उल्लंघन: सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के 'पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले के स्पष्ट निर्देश हैं कि हर एनकाउंटर की जांच एक स्वतंत्र एजेंसी द्वारा और मजिस्ट्रेट की निगरानी में होनी चाहिए। कानूनन, पुलिस का काम किसी को सजा देना नहीं बल्कि उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना है। हथियार उठाने या कानून तोड़ने पर भी पुलिस को केवल न्यूनतम आवश्यक बल (Minimum Force) प्रयोग करने का अधिकार है, न कि सीधे जान लेने का।


4. सामाजिक दृष्टिकोण: चयनात्मक चुप्पी और सामूहिक हीनभावना


यह विमर्श हमारे समाज के आंतरिक पतन की भी गवाही देता है। हम एक ऐसे मूक समाज (Silent Society) में तब्दील हो रहे हैं जिसका खून तभी खौलता है जब मरने वाला उनकी अपनी 'कम्युनिटी' या जाति का हो।


* ब्राह्मणवाद बनाम सामाजिक न्याय का ढोंग: जो संगठन दिन-रात 'जातिगत न्याय', 'दलित-पिछड़ा विमर्श' या 'ब्राह्मण समाज' के नाम पर राजनीति करते हैं, वे एक गरीब और अकेले नागरिक की प्रशासनिक हत्या पर मौन साध लेते हैं। यह चयनात्मक एकजुटता (Selective Solidarity) दर्शाती है कि समाज के ठेकेदारों को न्याय से कोई सरोकार नहीं है, उन्हें केवल अपनी राजनीतिक गोटियां सेट करनी हैं।

* मनोवैज्ञानिक भय: जब समाज यह देखता है कि एक अकेले, तार्किक और निष्पक्ष व्यक्ति को तंत्र मिलकर कुचल देता है, तो आम नागरिक के भीतर एक सामूहिक डर और हीनभावना पैदा हो जाती है। लोग सही के लिए आवाज उठाने से डरने लगते हैं, जो किसी भी जीवंत समाज की मौत का संकेत है।


## अन्ततः : अब 'सूरत बदलनी ही चाहिए'


भरत तिवारी का मामला इस देश के सिस्टम के सामने एक ऐसा आईना है, जिसे देखने से हर जिम्मेदार संस्था कतरा रही है। यह एनकाउंटर हमें चेतावनी देता है कि यदि आज हम एक गरीब और अकेले नागरिक के लिए निष्पक्ष न्याय की मांग को लेकर खड़े नहीं हुए, तो कल यह कुप्रथा किसी भी आम नागरिक के दरवाजे तक पहुंच सकती है।


राष्ट्रीय हित की मांग है कि:


1. इस पूरे मामले की समयबद्ध, उच्च-स्तरीय न्यायिक जांच (Judicial Inquiry) हो, और वायरल वीडियो की फॉरेंसिक सत्यता जांची जाए।

2. यदि पुलिसिया कार्रवाई में सत्ता के संरक्षण या व्यक्तिगत द्वेष की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों पर 'हत्या' का मुकदमा चलाकर एक कठोर नजीर पेश की जाए।

3. समाज और प्रबुद्ध वर्ग जाति-धर्म के संकीर्ण चश्मे को उतारकर 'न्याय' को एक निरपेक्ष मूल्य के रूप में स्वीकार करे।


जब तक सवाल पूछने वाले नागरिकों की जान सुरक्षित नहीं होगी, तब तक नए भारत के निर्माण और विकास के सारे दावे खोखले और बेमानी हैं। इस व्यवस्था की 'पीर अब पर्वत सी हो चुकी है', और राष्ट्रीय शुचिता के लिए इसका पिघलना अनिवार्य है।