सूरत बदलनी चाहिए' — नैरेटिव के चक्रव्यूह में घिसटती नागरिक चेतना और लोकतंत्र की बुनियादी शर्त
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
'सूरत बदलनी चाहिए' — नैरेटिव के चक्रव्यूह में घिसटती नागरिक चेतना और लोकतंत्र की बुनियादी शर्त
"सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मिरा मक़्सद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।" दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियाँ आज महज़ कविता नहीं हैं, बल्कि समकालीन भारत के उस हर नागरिक का घोषणापत्र हैं जो टीवी की स्क्रीनों, चुनावी मंचों और प्रशासनिक गलियारों में लोकतंत्र की बुनियादी रूह को कुचलते हुए देख रहा है। आज देश के सामने सबसे बड़ा संकट आर्थिक या तकनीकी नहीं है, बल्कि 'सवाल पूछने वाले की नागरिकता और नीयत' पर उठाए जाने वाले अंतहीन संदेहास्पद नैरेटिव का है।
जब दश की सामूहिक चेतना को इस कदर सुन्न कर दिया जाए कि सवाल पूछने वाले का भूगोल, उसका सरनेम या उसकी शारीरिक बनावट उसकी देशभक्ति का पैमाना बनने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि 'बुनियाद' में गंभीर दरारें आ चुकी हैं।
1. भूगोल, बनावट और देशभक्ति का संकीर्ण तराजू
इस विमर्श का सबसे दुखद और संवेदनशील पहलू वह है जहां देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले विचारकों को उनकी नस्लीय या क्षेत्रीय पहचान के आधार पर कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
* लद्दाख की गूंज और उपेक्षा: सोनम वांगचुक जैसे शिक्षाविदों और पर्यावरणविदों ने, जिन्होंने देश के सुदूर और रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (लद्दाख) की पारिस्थितिकी और स्थानीय अधिकारों के लिए आवाज उठाई, उन्हें जब व्यवस्था के पैरोकार 'चीनी कनेक्शन' या 'विदेशी एजेंट' के चश्मे से देखने लगते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं है। यह उस पूरे सीमावर्ती समाज के भरोसे पर चोट है, जो भारतीय तिरंगे के स्वाभिमान के लिए शून्य से नीचे के तापमान पर खड़ा रहता है।
* पहचान का हथियार: क्या किसी नागरिक की निष्ठा का मूल्यांकन उसकी आंखों की बनावट से होगा या उसके द्वारा राष्ट्र निर्माण में दिए गए वैज्ञानिक व शैक्षणिक योगदान से? यह सवाल आज भारत की लोकतांत्रिक संप्रभुता के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है।
2. 'खान' बनाम 'फैजल': जब माफिया और व्यवस्था मिलकर नाम बदलते हैं
शिक्षा और स्वास्थ्य—ये दो ऐसे बुनियादी क्षेत्र हैं जो किसी भी देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की किस्मत बदलते हैं। परंतु, जब कोई शिक्षक या समाजसेवक इन क्षेत्रों में व्यावसायिक सिंडिकेट (कोचिंग माफिया और कॉर्पोरेट अस्पताल) को चुनौती देता है, तो पूरी व्यवस्था उसके खिलाफ लामबंद हो जाती है।
* पहचान का ध्रुवीकरण: व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता को रातों-रात 'सांप्रदायिक रंग' दे दिया जाता है। जो शिक्षक कल तक लाखों युवाओं का मार्गदर्शक था, उसे व्यवस्था के पैरोकार उसकी धार्मिक पहचान (खान बनाम फैजल खान) के खांचे में समेट देते हैं ताकि आम जनता उसके द्वारा उठाए गए 'सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा' के बुनियादी सवाल को भूलकर धार्मिक बहसों में उलझ जाए।
* सरनेम का भय: स्थिति यह हो चुकी है कि चाहे आपके नाम के पीछे तिवारी लगा हो, शर्मा हो, यादव हो या खान—यदि आप अकेले खड़े हैं और व्यवस्था के दोषपूर्ण चरित्र से सवाल कर रहे हैं, तो समाज का बहुसंख्यक हिस्सा तमाशबीन बन जाता है। आपकी छवि को 'देशविरोधी' नाकर आपके अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया जाता है।
3. विरोधाभासों का महाजाल: 'एक रहेंगे' के नारे बनाम टुकड़ों में बंटता समाज
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समकालीन राजनीति के मंचों से जो विरोधाभास निकल रहे हैं, वे देश के सामाजिक ताने-बाने को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे हैं:
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[ समकालीन राजनीतिक विरोधाभास ]
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(चुनावी नारे) (जमीनी हकीकत) (मीडिया की प्राथमिकता)
"एक रहोगे तो सेफ रहोगे" जातिगत/धार्मिक विभाजन झालमुरी, मेलोडी और सेलिब्रिट
* नारों की राजनीति: एक तरफ राष्ट्रीय एकता और "एक रहोगे तो सेफ रहोगे" के बड़े-बड़े नारे उछाले जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ पर्दे के पीछे सूक्ष्म स्तर पर समाज को धार्मिक ध्रुवीकरण और जातिगत वोटबैंक के गणित में निर्दयता से बांट दिया जाता है।
* मीडिया का सतही चरित्र (The Deflection Mechanism): जिस दौर में नाबालिग महिलाओं के साथ होने वाले जघन्य अपराधों, कानून-व्यवस्था के ढीलेपन और कथित फेक एनकाउंटर्स (जैसे भरत तिवारी या अन्य मामले) पर गंभीर न्यायिक व प्रशासनिक जवाबदेही तय होनी चाहिए, उस दौर में मुख्यधारा का मीडिया 'झालमुरी' और 'मेलोडी' जैसे विदूषक विमर्शों में देश का समय बर्बाद कर रहा है। यदि कोई इनके इस भटकाव पर सवाल उठाए, तो उस पर करोड़ों रुपये के मानहानि (Defamation) के मुकदमे ठोककर उसकी आर्थिक और मानसिक कमर तोड़ दी जाती
## 'बुनियाद हिलनी चाहिए' — एक नागरिक पुनर्जागरण की आवश्यकता
"मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।"
यह देश किसी दल, किसी नेता, किसी विशिष्ट कम्युनिटी या किसी पीआर (PR) एजेंसी की बपौती नहीं है। यह देश राजस्थान, बिहार, लद्दाख, छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्य प्रदेश के उन करोड़ों आम नागरिकों का है जिनके टैक्स के पैसे से यह पूरा सिस्टम पलता है।
जब तक हम किसी व्यक्ति के सवालों का मूल्यांकन उसके सरनेम, धर्म, जाति या क्षेत्र के आधार पर करना बंद नहीं करेंगे, तब तक हम एक न्यायपूर्ण राष्ट्र की नींव नहीं रख सकते। व्यवस्था को सुधारने की पहली शर्त ही यह है कि सवाल पूछने वाले की सुरक्षा और सम्मान की गारंटी हो, न कि उसके एनकाउंटर या चरित्र-हनन की। दुष्यंत कुमार की 'आग' असल में वही तार्किक चेतना और सजगता है, जिसे हर नागरिक को अपने सीने में जलाए रखना होगा, ताकि यह लोकतांत्रिक दीवार पर्दों की तरह हिलने के बजाय अपनी सही बुनियाद पर वापस खड़ी हो सके।
