श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः

अभीप्सा की पराकाष्ठा और चरम शरणागति: केवट प्रसंग का तात्विक एवं दार्शनिक अनुशीलन

(क्षीरसागर के संकल्प से गंगा-तट के सायुज्य मोक्ष तक की एक अलौकिक आध्यात्मिक यात्रा)

संसार में प्रत्येक जीव सुख की खोज में भटक रहा है, परंतु सनातन दर्शन उद्घोष करता है कि वह परम सुख, वह आत्यंतिक आनंद केवल परमात्मा की प्राप्ति में है। प्रश्न उठता है कि हमारे भीतर उस सच्चिदानन्द को पाने की इच्छा कितनी प्रबल है? क्या वह इच्छा केवल एक क्षणिक तरंग है, या युगों-युगों का अखंड संकल्प?


रामचरितमानस का 'केवट प्रसंग' केवल एक कथा नहीं है, बल्कि वह जीव की अनंत जन्मों की तड़प, प्रारब्ध के संघर्ष और अंततः ईश्वरीय अनुग्रह के महामिलन का सर्वोच्च दार्शनिक आलेख है। आइए, इस पावन प्रसंग के गूढ़ आध्यात्मिक, दार्शनिक एवं धार्मिक रहस्यों का अनुशीलन करें।


१. आदि संकल्प: क्षीरसागर का उपक्रम और अवरोध का वेदांत


इस आध्यात्मिक यात्रा का उद्गम क्षीरसागर की उस अलौकिक स्थिति से होता है, जहाँ नारायण शेष-शय्या पर विराजमान हैं और भगवती महालक्ष्मी उनके चरणों की सेवा में लीन हैं। यह दृश्य ब्रह्मांड की सर्वोच्च साम्यावस्था का प्रतीक है।


* अंगूठे का संकेत (ईश्वरीय सुलभता): भगवान के चरण कमल का एक अंगूठा शय्या से बाहर आकर लहरों से खेल रहा है। शास्त्र कहते हैं कि परमात्मा सदैव जीव के लिए सुलभ होने का संकेत देता है। क्षीरसागर के एक क्षुद्र जीव (कछुए) ने जब इस सत्य को देखा, तो उसके भीतर 'मुमुक्षुत्व' (मोक्ष की तीव्र इच्छा) जाग्रत हुई। उसने विचार किया कि यदि इस अंगूठे का स्पर्श मिल जाए, तो भवबंधन कट जाए।

* माया और काल का अवरोध: जीव जैसे ही परमात्मा की ओर बढ़ता है, प्रकृति के नियम उसके आड़े आते हैं। शेषनाग (जो साक्षात् 'काल' और 'क्रोध' के प्रतीक हैं) ने फुँफकार कर उसे भगा दिया। काल और भय के कारण जीव पीछे हट जाता है। जब कछुए ने पुनः प्रयास किया, तो महालक्ष्मी (जो 'माया' और 'ऐश्वर्य' की प्रतीक हैं) की दृष्टि ने उसे दूर कर दिया।

* दार्शनिक मर्म: यह जीव की आदि कहानी है। जब-जब साधक भगवान की ओर बढ़ता है, तब-तब काल (समय का अभाव) और माया (सांसारिक आकर्षण व प्रमाद) उसे प्रभु-चरणों से विमुख कर देते हैं।


२. जन्म-जन्मांतर का अनुवर्तन: तपोबल से दिव्य दृष्टि


अवरोधों से भयभीत होकर संकल्प को छोड़ देना सांसारिक जीव का लक्षण है, परंतु सच्चा साधक युगों तक प्रतीक्षा करता है। वह कछुआ अनेक योनियों में भटकता रहा। सतयुग बीता, त्रेता आया।


"अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्" (भगवद्गीता ६.४५)


ऋषि कहते हैं कि साधना कभी नष्ट नहीं होती। अनेक जन्मों के संचित तपोबल से उस जीव ने 'दिव्य दृष्टि' प्राप्त कर ली। उसे ज्ञान हो गया कि जो नारायण क्षीरसागर में थे, वे ही अब मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनकर धरा पर आए हैं; जो शेष जी काल रूप थे, वे लक्ष्मण हैं और जो माया रूप लक्ष्मी थीं, वे सीता जी हैं। उसने जान लिया कि इस बार प्रभु वनवास के बहाने गंगा तट पर आएंगे और उन्हें नाव की आवश्यकता होगी। इसलिए, वह पूर्व-नियोजित रूप से केवट बनकर गंगा के घाट पर बैठ गया।


जब केवट प्रभु राम से कहता है—“कहहि तुम्हार मरमु मैं जाना"—तो यह मर्म केवल यह नहीं है कि आपकी धूल से शिला नारी बन जाती है, बल्कि वह कोटि-कोटि वर्षों का यह मर्म जानता है कि इस बार त्रिलोकीनाथ स्वयं चलकर भक्त के घाट पर आए हैं।


३. भय का शमन और प्रेम का हठ


सत्ययुग में वह शेष जी की फुँफकार से डर गया था। लेकिन इस बार, प्रेम ने भय पर विजय प्राप्त कर ली थी। इस बार उसे लक्ष्मण जी के तीरों से मर जाना स्वीकार था, परंतु प्रभु के चरणों को पखारे बिना नाव पर बिठाना स्वीकार नहीं था।


गोस्वामी तुलसीदास जी इस अनन्य हठ को इन अमर पंक्तियों में पिरोते हैं:


पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उरराई चहौं।

मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं॥

बरु तीर मारहु लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।

तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥


* तात्विक विश्लेषण: यहाँ केवट साक्षात् 'पराभक्ति' का विग्रह है। वह कहता है कि मुझे उतराई (सांसारिक प्रतिफल) नहीं चाहिए। उसे 'दशरथ की शपथ' है, क्योंकि वह जानता है कि राम सत्य प्रतिज्ञ हैं। 'लखन बरु तीर मारहु'—यह घोषणा है कि जब साधक ईश्वर के प्रेम में पूर्णतः डूब जाता है, तो उसे मृत्यु का भय (काल का भय) भी स्पर्श नहीं कर सकता। वह मोक्ष के द्वार को बलपूर्वक खोल देता है।


४. प्रभु की अंतर्निहित मुस्कान: दोनों चरणों का समर्पण


जब प्रभु ने केवट के इन 'अटपटे' परंतु प्रेम-रस से सिक्त वचनों को सुना, तो मानसकार लिखते हैं:


सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।

बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥


यह मुस्कान (बिहसे करुनाऐन) ब्रह्मांड की सबसे रहस्यमयी मुस्कान है। प्रभु श्रीराम ने जैसे ही सीता (महालक्ष्मी) और लक्ष्मण (शेषनाग) की ओर देखा, तो उस चितवन में एक दिव्य उपालंभ था। प्रभु मानो मौन भाषा में कह रहे थे: "याद करो क्षीरसागर का वह दृश्य! तब यह केवल एक अंगूठा छूना चाहता था, और तुम दोनों ने इसे भगा दिया था। तुमने कलिकाल और माया का पहरा बिठा दिया था। अब देखो, समय का चक्र बदला, आज मैं असहाय होकर इसके घाट पर खड़ा हूँ, और यह केवल अंगूठा नहीं, मेरे दोनों पैर मांग रहा है! और तुम दोनों मौन खड़े देखने के अलावा कुछ नहीं कर सकते।"


यह प्रेम की पराकाष्ठा है, जहाँ भक्त भगवान को पराजित कर देता है।


५. सायुज्य मुक्ति और कुल का तर्पण


केवट केवल चतुर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रूप से पूर्ण जागृत था। उसने केवल स्वयं के लिए न्याय नहीं माँगा, बल्कि अपने पूरे अस्तित्व का ईश्वर में विलय कर दिया:


पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।

पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥


* धार्मिक एवं आध्यात्मिक फलश्रुति: भगवान के चरणों को धोकर, उस पादोदक (चरणामृत) का स्वयं और परिवार सहित पान करना 'आत्म-शुद्धि' है। उसी जल से पितरों का तर्पण करना यह दर्शाता है कि जब कुल में एक भी अनन्य भक्त पैदा होता है, तो उसकी भक्ति के प्रताप से भूतकाल के पितर और भविष्य की पीढ़ियाँ स्वतः ही भवसागर से पार हो जाती हैं।


## हमारे लिए संदेश


यह हमें इस शाश्वत सत्य से अवगत कराता है कि परमात्मा को पाने की इच्छा में जब तक 'हठ', 'अखंड धैर्य' और 'निर्भयता' नहीं आती, तब तक प्रभु रीझते नहीं हैं। संसार के अवरोध (शेष जी की फुँफकार और लक्ष्मी जी की दृष्टि) हमें रोकेंगे, युग बीत जाएंगे, योनियाँ बदलेंगी; परंतु यदि अंतःकरण में वह आदि-संकल्प जीवित है, तो एक दिन ईश्वर को स्वयं चलकर हमारे घाट पर आना ही पड़ेगा।


केवट का यह पावन चरित्र हमें सिखाता है कि ज्ञान और ऐश्वर्य से नहीं, ईश्वर को केवल और केवल 'प्रेम की अटपटी डोर' से ही बांधा जा सकता है।


श्रीमद्रामचंद्रचरणौ शरणं प्रपद्ये। श्री राम जय राम जय जय राम।