क्षेत्रीय दलों का अवसान, 'थैलीशाही' का नग्न नृत्य और मतदाता का लावारिस जनादेश

 


क्षेत्रीय दलों का अवसान, 'थैलीशाही' का नग्न नृत्य और मतदाता का लावारिस जनादेश

भारतीय लोकतंत्र का ढांचा बहुदलीय व्यवस्था और बहुसांस्कृतिक बहुलता की नींव पर खड़ा है। इस नींव को मजबूती देने में क्षेत्रीय दलों (Regional Parties) ने हमेशा एक सुरक्षा कवच (Safety Valve) की भूमिका निभाई है, जिसने दिल्ली के केंद्रीय एकाधिकार को चुनौती देकर राज्यों की अस्मिता और स्थानीय आकांक्षाओं को संसद में गूंजने का मौका दिया। परंतु, समकालीन राजनीति के पन्नों पर जो पटकथा इस समय लिखी जा रही है, वह बेहद भयावह है।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) का बिखराव, आम आदमी पार्टी के ७ राज्यसभा सांसदों का पाला बदलना, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना के ६ लोकसभा सांसदों की ताजा टूट, और झारखंड राज्यसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM), राष्ट्रीय जनता दल (RJD) व वामपंथ (CPI-ML) के विधायकों द्वारा किया गया खुला 'क्रॉस-वोटिंग' का खेल—यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि भारतीय राजनीति अब 'विचारधारा' और 'सिद्धांतों' के मरुस्थल में तब्दील हो चुकी है। अब बात किसी एक दल या नेता की नहीं रही; अब यह सवाल भारतीय जनतंत्र और नागरिक की 'वोट की आजादी' के वजूद का बन चुका है।


१. झारखंड से महाराष्ट्र तक: 'थैलीशाही' और संस्थाओं का नग्न नृत्य


झारखंड में हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा चुनाव के परिणाम राजनीतिक नैतिकता के ताबूत पर अंतिम कील की तरह हैं। जिस राज्य में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की सरकार हो, मुख्यमंत्री खुद सत्ता में बैठे हों, वहां उनकी अपनी ही पार्टी का विधायक, वामपंथी विचारधारा (CPI-ML) का प्रतिनिधि और लालू प्रसाद यादव की आरजेडी (RJD) के चारों विधायक खुलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान कर आते हैं।


यह कोई वैचारिक हृदय परिवर्तन नहीं है। राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता के बीच यह खुला सच है कि इस 'क्रॉस-वोटिंग' के पीछे भारी-भरकम वित्तीय लेन-देन, स्वार्थ और केंद्रीय जांच एजेंसियों के डंडे का खौफ काम कर रहा था।


यही कहानी आज महाराष्ट्र में दोहराई गई है, जहां उद्धव ठाकरे की पार्टी के ६ लोकसभा सांसदों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया। बीजू जनता दल (BJD), हरियाणा का इनेलो (INLD) और पंजाब का कभी बेहद शक्तिशाली रहा अकाली दल—इन सभी को या तो अप्रासंगिक बना दिया गया है या पूरी तरह खत्म किया जा चुका है।


# सत्ता की भाषा ही अंतिम सत्य: इन क्षेत्रीय दलों का मुख्य नेतृत्व और इनके भीतर की दूसरी पंक्ति के नेता आज केवल और केवल 'सत्ता की मलाई' और 'संसाधनों की भाषा' जानते हैं। संघर्ष की आंच में तपने का माद्दा खो चुके ये नेता जनसेवा के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि सत्ता के सौदागर नजर आ रहे हैं।


२. २०२७ की गारंटी और उत्तर प्रदेश-बिहार का संभावित संकट


यह कड़वी आशंका शत-प्रतिशत सच साबित हो सकती है कि यदि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (SP) आगामी विधानसभा चुनाव में वांछित सफलता हासिल नहीं कर पाती है, तो २०२४ के लोकसभा चुनाव में जिन ३७ सांसदों को जनता ने एक बड़े विकल्प के रूप में चुना था, उनमें से अधिकांश का पाला बदलना तय मानिए। क्योंकि जब राजनीति का मुख्य आधार केवल 'पारिवारिक विरासत' और 'अल्पकालिक सत्ता सुख' हो, तो विपक्ष की बेंच पर बैठकर जनता के हक की लड़ाई लड़ने का धैर्य आज के नेताओं में नहीं बचता।


बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की स्थिति भी इसी सांगठनिक खोखलेपन को दर्शाती है। गठबंधन के नाम पर झारखंड में चुनाव लड़कर जो ४ विधायक जीतकर आए थे, उन्होंने पहली ही परीक्षा में अपने वोट को सत्ताधारी दल के पाले में बेच दिया।


यह स्थिति मतदाताओं के भीतर एक गहरा हताशाजनक डिप्रेशन पैदा करती है। एक आम नागरिक यह सोचने पर मजबूर है कि वह कड़कड़ाती धूप और लंबी लाइनों में खड़े होकर जिस उम्मीदवार को 'विपक्ष की आवाज' बनाने के लिए चुनता है, वह जीतने के बाद चंद सिक्कों और अपनी सुरक्षा की खातिर 'सत्ता का हुक्मबरदार' बन जाता है।


३. २०२९ का यक्ष प्रश्न: किस पर करें विश्वास?


यह परिदृश्य देश के सामने एक अत्यंत गंभीर यक्ष प्रश्न खड़ा करता है। आने वाले समय में राज्यों के विधानसभा चुनावों और २०२९ के आम चुनावों में देश का नागरिक आखिर किस पर विश्वास करे? किस उम्मीदवार को अपनी आकांक्षाओं का प्रतिनिधि बनाकर संसद या विधानसभा भेजे?


वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान की रणनीति बिल्कुल साफ है—वह देश को 'एक दलीय व्यवस्था' (One-Party System) की ओर धकेलना चाहता है। यदि जनता भूल से या पूरी ताकत लगाकर विपक्ष के किसी उम्मीदवार को जिता भी देती है, तो सत्ताधारी दल अपने अकूत धनबल, कॉरपोरेट फंडिंग और सरकारी संस्थाओं (ED, CBI, Income Tax) के आतंक के दम पर उसे कुछ ही महीनों में तोड़कर अपने पाले में शामिल कर लेता है। दलबदल विरोधी कानून (10th Schedule) अब केवल कागजी हाथी बनकर रह गया है, जिसका इस्तेमाल सत्ता पक्ष अपनी सुविधा के अनुसार विपक्षी दलों को कानूनी रूप से हड़पने के लिए करता है।


४. स्वयंभू ठेकेदारों का अंत और लोकतंत्र की अंतिम सीमा


इस पूरे संकट के लिए केवल सत्ताधारी दल को दोष देना नासमझी होगी। इन क्षेत्रीय दलों के 'स्वयंभू ठेकेदारों' और उनकी छोटी-छोटी 'पारिवारिक प्राइवेट लिमिटेड पार्टियों' ने खुद अपने विनाश की पटकथा लिखी है। आंतरिक लोकतंत्र का अभाव, वंशवाद को प्राथमिकता, और कार्यकर्ताओं को केवल भीड़ की तरह इस्तेमाल करने की नीति के कारण इन पार्टियों की जड़ें खोखली हो चुकी थीं। भाजपा ने बस उनकी इसी कमजोरी पर प्रहार किया है। मुमकिन है कि २०२९ के आते-आते ये पारिवारिक पार्टियां चुनाव लड़ने के लायक भी न बचें।


लेकिन पार्टियों के मिटने से बड़ा संकट लोकतंत्र के मिटने का है। जब संसद और विधानसभाओं में कोई मजबूत विपक्ष ही नहीं बचेगा, जब हर चुनी हुई आवाज सत्ता के सुर में सुर मिलाने लगेगी, तो उसे 'लोकतंत्र' नहीं, बल्कि 'चुनी हुई तानाशाही' कहा जाएगा।


## गेंद अब पूरी तरह जनता के पाले में है


अब यह लड़ाई राजनीतिक दलों, गठबंधनों या नेताओं के दायरे से बहुत बाहर निकल चुकी है। यह लड़ाई अब भारत के आम नागरिक और इस देश के संविधान की अंतिम सांसों के बीच की है। संस्थाएं घुटने टेक चुकी हैं, कानून पंगु हो चुका है, और जनप्रतिनिधि बिकाऊ हो चुके हैं।


ऐसे में गेंद पूरी तरह से देश की जनता के पाले में है। अब फैसला मतदाताओं को करना है कि क्या वे इस 'थैलीशाही' के मूक दर्शक बने रहेंगे, या फिर आने वाले चुनावों में दलबदलुओं, मौकापरस्तों और जनादेश का सौदा करने वालों को ऐसी ऐतिहासिक राजनीतिक सज़ा देंगे कि सत्ता की थैलियां भी छोटी पड़ जाएं। यदि जनता अब भी नहीं जागी, तो आने वाली नस्लें केवल किताबों में पढ़ेंगी कि भारत कभी दुनिया का सबसे बड़ा जीवंत लोकतंत्र हुआ करता था।