फ्रांस में महाशक्तियों का समागम — मोदी-ट्रम्प वार्ता का रणनीतिक यथार्थ और कूटनीतिक धुंध

 


फ्रांस में महाशक्तियों का समागम — मोदी-ट्रम्प वार्ता का रणनीतिक यथार्थ और कूटनीतिक धुंध

फ्रांस की सुरम्य वादियों में आयोजित G-7 शिखर सम्मेलन, जिसमें भारत को वैश्विक दक्षिण (Global South) की धुरी के रूप में ब्राजील, मिस्र, केन्या और दक्षिण कोरिया के साथ विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था, वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती अपरिहार्यता का अकाट्य प्रमाण है। परंतु, इस बहुराष्ट्रीय महाकुंभ के इतर संपूर्ण विश्व की निगाहें भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच लगभग डेढ़ वर्ष के अंतराल के बाद हुई द्विपक्षीय मुलाकात पर टिकी थीं। प्रतीकात्मकता (Symbolism) और कैमरों की चमक के बीच दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की पारंपरिक प्रशंसा अवश्य की, परंतु जब कूटनीति के तराजू पर इस वार्ता के वास्तविक हासिल को तौला जाता है, तो सतह पर गहरे रणनीतिक संशय और विधिक अनुत्तरित प्रश्न तैरने लगते हैं। शीत युद्ध के बाद से लगातार प्रगाढ़ हो रहे भारत-अमेरिका संबंधों (India-US Relations) में आई इस हालिया शिथिलता के दौर में, यह मुलाकात एक 'नई शुरुआत' तो कही जा सकती है, लेकिन द्विपक्षीय कूटनीति के मोर्चे पर यह बातचीत संदेह के घेरे से बाहर निकलने में पूरी तरह असफल रही है।


१. मूक कूटनीति बनाम एकतरफा विमर्श: संवाद का असंतुलन


अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में दो संप्रभु राष्ट्रों के प्रमुखों के बीच होने वाली वार्ता के बाद दोनों पक्षों द्वारा अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को साझा प्रेस वार्ता में पुरजोर तरीके से रखा जाता है। परंतु फ्रांस में हुई इस मुलाकात के दौरान एक अजीबोगरीब दृश्य सामने आया। वार्ता का सारा निष्कर्ष और विवरण केवल अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ही वैश्विक मीडिया के सम्मुख प्रस्तुत किया गया, जबकि भारतीय प्रधानमंत्री पूरे समय उनके बगल में मूक गवाह बने बैठे रहे। उन्होंने ट्रम्प के बयानों में न तो कोई संशोधन किया, न ही भारत का राष्ट्रीय दृष्टिकोण स्पष्ट करने की जरूरत समझी।


यह केवल एक नेता की व्यक्तिगत शैली का मामला नहीं है, बल्कि यह संप्रभुता के प्रदर्शन का कूटनीतिक असंतुलन है। जब एक महाशक्ति का प्रमुख वैश्विक मीडिया के सामने दोनों देशों के संबंधों की दिशा तय कर रहा हो, तब भारतीय विदेश मंत्रालय या दूतावासों द्वारा बाद में जारी किए जाने वाले 'प्रेस नोट' उस प्रथम प्रभाव (First Impression) की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकते। कूटनीति में 'पर्सोना' (Persona) और 'पॉलिटिकल पोस्चरिंग' (Political Posturing) का बहुत महत्व होता है; यहाँ भारत की ओर से अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का मुखर प्रदर्शन न होना एक गंभीर चिंता का विषय है।


२. संप्रभुता और नागरिक सुरक्षा: होर्मुज और इमिग्रेशन का मर्मांतक यथार्थ


इस द्विपक्षीय वार्ता का बेसब्री से इंतजार इसलिए नहीं था कि दोनों नेता लंबे समय बाद मिल रहे थे, बल्कि इसलिए था क्योंकि हाल के महीनों में भारत की संप्रभु गरिमा और उसके नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े कई गंभीर मुद्दे ठंडे बस्ते में पड़े हुए थे।


* होर्मुज जलडमरूमध्य की त्रासदी: भू-राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील और सुलग रहे होर्मुज स्ट्रेट के पास अमेरिकी गोलाबारी में तीन निर्दोष भारतीय नाविकों की दुखद मौत हो गई। एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत को इस मुद्दे पर अमेरिका से जवाबदेही और मुआवजे की पुरजोर मांग करनी चाहिए थी। परंतु इस शिखर वार्ता में इस मुद्दे को औपचारिक रूप से भी उठाना तो दूर, जब एक विदेशी पत्रकार ने इस पर सवाल दागा, तो ट्रम्प ने बेहद असंवेदनशील तरीके से कह दिया कि—"नाविकों का पेशा ही खतरे से भरा होता है।" इस कड़वे और अहंकारपूर्ण बयान पर भारतीय नेतृत्व की चुप्पी भारत के आम नागरिकों और वैश्विक भारतीय श्रमबल (Global Indian Diaspora) के मनोबल को तोड़ने वाली है।

* 'डंकी रूट' और मानवाधिकार का हनन: यह चुप्पी उसी कूटनीतिक विवशता की निरंतरता है, जब कुछ समय पूर्व अमेरिका ने 'डंकी रूट' (अवैध अप्रवासन) के जरिए पहुंचे भारतीय नागरिकों को अपराधियों की तरह हथकड़ियां और कमर में जंजीरें बांधकर अमेरिकी वायुसेना के जहाजों से वापस भेजा था। किसी भी सभ्य राष्ट्र के नागरिकों के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों का उल्लंघन है। परंतु भारत के विदेश मंत्रालय ने इसके खिलाफ कड़ा कूटनीतिक प्रतिवाद दर्ज कराने के बजाय इसे 'आव्रजन नियमों का तर्कसंगत पालन' बताकर अमेरिका को 'क्लीन चिट' दे दी।


३. 'मैक्सिमम प्रेशर' और टैरिफ का आर्थिक चक्रव्यूह


आर्थिक मोर्चे पर डोनाल्ड ट्रम्प की 'अमेरिका फर्स्ट' (America First) की नीति भारत के घरेलू उद्योगों और विदेशी व्यापार के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। ट्रम्प द्वारा लगातार खेला जाने वाला 'टैरिफ-टैरिफ का खेल' भारतीय निर्यात को भारी नुकसान पहुंचा चुका है। जब भी वाशिंगटन अपनी मर्जी के मुताबिक भारतीय वस्तुओं पर संरक्षणवादी कर (Protective Tariffs) बढ़ाता है, तो भारतीय बाजार और विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector) पर इसका गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।


इसके विपरीत, अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए भारत सरकार को अमेरिकी कृषि और तकनीकी उत्पादों को भारतीय बाजारों में रियायती दर पर प्रवेश देने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इस मुलाकात में भी द्विपक्षीय व्यापार असंतुलन और एकतरफा टैरिफ को समाप्त करने की दिशा में कोई ठोस कूटनीतिक प्रगति नहीं दिखाई दी, जो यह संकेत देती है कि अमेरिका भारत को एक 'बराबर के रणनीतिक साझेदार' से अधिक अपनी आर्थिक नीतियों के एक 'बाजार' के रूप में देखता है।


४. काल्पनिक सुरक्षा गारंटी और दक्षिण एशिया का बदलता भू-राजनीतिक परिदृश्य


वार्ता के दौरान ट्रम्प ने एक बार फिर अपना पुराना पासा फेंका कि—"यदि भारत पर किसी देश ने आक्रमण किया, तो अमेरिका उसके साथ खड़ा रहेगा।" अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषक भली-भांति जानते हैं कि यह पूरी तरह से एक काल्पनिक और थोथा बयान है।


# पाकिस्तान :- 

* वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति : 'ऑपरेशन सिंदूर' और अमेरिका-ईरान युद्ध को रुकवाने में निभाई गई कूटनीतिक भूमिका के बाद पाकिस्तान अपनी 'आतंकी देश' की छवि से बाहर निकल रहा है। वह अब भारत के साथ सीधे सैन्य टकराव की स्थिति से बचना चाहेगा।

* अमेरिकी गारंटी की प्रासंगिकता : "शून्य" 

पाकिस्तान के संदर्भ में भारत को किसी तीसरे देश की सैन्य सहायता की आवश्यकता कभी नहीं रही।

# चीन :- 

* वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति : चीन अब खुद को अमेरिका के समकक्ष एक 'वैश्विक महाशक्ति' (Global Superpower) के रूप में स्थापित कर चुका है। वह भारत के साथ सीमा विवादों को सीधे द्विपक्षीय स्तर पर संभाल रहा है।

* अमेरिकी गारंटी की प्रासंगिकता : "अप्रासंगिक" 

अमेरिका कभी भी भारत के लिए चीन के साथ सीधे सैन्य युद्ध में नहीं उतरेगा, जैसा कि यूक्रेन और ताइवान के संकटों से स्पष्ट है।


५. लेन-देन की कूटनीति (Transactional Diplomacy) और ट्रम्प की विश्वसनीयता


इस संपूर्ण विमर्श का सबसे नाजुक बिंदु है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की अपनी कूटनीतिक विश्वसनीयता। ट्रम्प का राजनीतिक चरित्र 'अस्थिर चित्त' और अत्यधिक 'लेन-देन की कूटनीति' (Transactional Diplomacy) पर आधारित माना जाता है। वे भू-राजनीतिक संधियों को राष्ट्रों की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता के रूप में नहीं, बल्कि एक 'व्यापारिक सौदे' (Business Deal) के रूप में देखते हैं। वे एक दिन प्रधानमंत्री मोदी को 'शांत और संयमित' कहकर उनकी प्रशंसा के पुल बांध सकते हैं, और अगले ही दिन अपनी घरेलू राजनीति को साधने के लिए भारत की पर्यावरण या व्यापारिक नीतियों पर तीखा हमला बोल सकते हैं। ऐसे में, किसी दीर्घकालिक रणनीतिक समझौते (Strategic Pact) पर उनके साथ आंख मूंदकर भरोसा करना भारतीय विदेश नीति के लिए एक बड़ा जुआ साबित हो सकता है।


## राष्ट्रीय हितों की पारदर्शी पुनर्स्थापना आवश्यक


फ्रांस की इस मोदी-ट्रम्प मुलाकात ने संबंधों पर जमी बर्फ को थोड़ा पिघलाया जरूर है, लेकिन इसने भारत के राष्ट्रीय स्वाभिमान, नागरिकों की सुरक्षा और आर्थिक हितों के संदर्भ में कई गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं। भारत की विदेश नीति को यह समझना होगा कि अमेरिका के साथ 'सामरिक साझेदारी' (Strategic Partnership) का अर्थ 'सामरिक अधीनता' (Strategic Subservience) कभी नहीं हो सकता।


भारत सरकार और विदेश मंत्रालय का यह विधिक एवं लोकतांत्रिक कर्तव्य है कि वे देश की संसद और जनता के सामने इस वार्ता का वास्तविक 'हासिल' स्पष्ट रूप से रखें। जब तक होर्मुज स्ट्रेट में मरे भारतीय नाविकों को न्याय नहीं मिलता, जब तक टैरिफ के एकतरफा युद्ध पर विराम नहीं लगता, और जब तक दक्षिण एशिया में भारत के हितों को बिना किसी अमेरिकी हस्तक्षेप के सुरक्षित नहीं किया जाता, तब तक ऐसी मुलाकातों को केवल 'फोटो-ऑप' (Photo-Op) और एकतरफा संवाद का मंच ही माना जाएगा। भारत को महाशक्तियों के खेल में केवल एक 'मोहरा' बनने के बजाय अपनी वैश्विक संप्रभुता और सामरिक स्वायत्तता को मुखरता से स्थापित करना होगा।