मौन की विरासत और भरोसे का आकाश — पिता होने का अनकहा अध्यात्म

 


मौन की विरासत और भरोसे का आकाश — पिता होने का अनकहा अध्यात्म

इस नश्वर संसार में 'प्रेम' की जितनी भी परिभाषाएँ गढ़ी गईं, वे अधिकांशतः मुखरता के व्याकरण से संचालित होती रहीं। जो प्रेम रो सका, जो प्रेम गा सका, जो आँसुओं में बह सका या जो शब्दों में रिस सका, दुनिया ने उसे ही अपनी स्मृतियों में सहेजा। परंतु इसी जगत के एक शांत कोने में एक ऐसा प्रेम भी अनवरत बहता रहा, जिसने कभी अपनी नुमाइश नहीं की। वह प्रेम न तो लोरी बनकर कानों में गूंजा और न ही आँखों से सावन बनकर झरा। वह एक ऐसा प्रेम था जो चट्टानी खामोशी के नीचे 'मौन गंगा' की तरह बहता रहा, जिसे इस सृष्टि ने 'पिता' का नाम दिया।

पिता का होना वास्तव में एक जीवन-दर्शन है—बचपन में एक निर्भय 'ऊँगली' का अहसास और जवानी में सिर पर तनी हुई एक अदृश्य 'छत' का सरोकार।


१. ऊँगली का ब्रह्मांड: निर्भयता का आदि-पाठ


मनुष्य का जीवन जब अपनी शुरुआती देहरी पर होता है, तो पैर लड़खड़ाते हैं और यह संसार अजनबियों से भरा एक भयानक जंगल प्रतीत होता है। उस अंधकार भरे कौतूहल में अचानक एक बड़ी, खुरदरी और गर्म ऊँगली नन्हे हाथों को थाम लेती है। वह ऊँगली महज़ एक शारीरिक सहारा नहीं, बल्कि बच्चे के लिए निर्भयता का पहला ब्रह्मांड बन जाती है:


"बड़े बेफिक्र, बेपरवाह, बेखौफ होकर चलते हैं...

बच्चे जब पिता की उंगली पकड़कर चलते हैं।"


उस एक मजबूत ऊँगली को थामते ही राह की सारी चिंताएँ और मंज़िल की सारी फिक्र कपूर की तरह उड़ जाती हैं। बच्चे को इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि रास्ता कितना संकरा है या काँटे कितने तीखे हैं; उसके भीतर यह मनोवैज्ञानिक सत्य गहरे से बैठ जाता है कि जब तक यह हाथ मेरे हाथ में है, तब तक काल भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वह ऊँगली वास्तव में 'भरोसे की वह अविनाशी डोर' है जिससे बच्चे के सारे सुनहरे सपने और उसका खिलखिलाता हुआ शोर बंधा होता है। छोटे-छोटे पाँव जब पिता की मेहरबान छांव में चलते हैं, तो वह दृश्य इस धरती पर साकार ब्रह्म यानी 'ईश्वर की चलती पहचान' जैसा होता है।


२. विज्ञापनहीन प्रेम: सुबह की रोटी और स्कूल का बैग


जैसे-जैसे पाँव बड़े होते हैं, वह ऊँगली धीरे-धीरे छूट जाती है और बच्चा अपनी दुनिया में व्यस्त होने लगता है। इसी मोड़ पर पिता का प्रेम अपनी अभिव्यक्ति बदल लेता है। अब वह स्पर्श से हटकर 'व्यवस्था' में तब्दील हो जाता है। पिता वह व्यक्ति है जो कभी गले लगाकर रोज़ यह नहीं कहेगा कि "तुम मुझे बहुत प्यारे हो", न ही वह हर शाम दफ्तर से लौटकर भावुकता से पूछेगा कि "आज तुम्हारा दिन कैसा रहा?"


परंतु, उसका प्रेम अत्यंत व्यावहारिक और मौन रूप से काम करता है:

 * वह सुबह की गर्म रोटी के लिए पसीना बहाने में झलकता है।

 * वह स्कूल के नए बैग की खुशबू में छुपा होता है।

 * वह बिना मांगे जेब में चुपचाप रख दिए गए उन पैसों में मुस्कुराता है, जिसके लिए पिता ने न जाने अपनी कितनी इच्छाओं का गला घोंटा होता है।


उनका हर एक "मैं हूँ" शब्दहीन होता है। वे अपने हिस्से के सुखों का तर्पण करके संतान के हिस्से की खुशियों को सुरक्षित करते हैं। उनकी चुप्पी कोई अवसाद या उदासी नहीं होती, बल्कि वह उस शांत छत की तरह होती है जो खुद धूप, आंधी और सावन के थपेड़े सहती है ताकि नीचे सो रहा परिवार चैन की नींद ले सके।


३. नारियल सा आवरण: जड़ों का संवर्धन


पिता के प्रेम की सबसे मर्मांतक और सुंदर व्याख्या यह है कि उनका प्यार डाली पर लटकते सुंदर, सुकुमार फूलों की तरह नहीं होता जो ज़रा सी हवा से टूटकर बिखर जाएं। उनका प्यार **'जड़ों की तरह'** होता है। जड़ें कभी दिखाई नहीं देतीं; वे अंधेरे में, मिट्टी के भीतर, कंकड़-पत्थरों से टकराते हुए खुद को गाड़े रखती हैं। पूरा संसार ऊपर लहलहाते वृक्ष की तारीफ करता है, लेकिन उस संपूर्ण अस्तित्व को थामने का भगीरथ कार्य वह अदृश्य जड़ ही कर रही होती है।


जब संतान जीवन के कुरुक्षेत्र में गिरती है, तो पिता का दिल अंदर से तड़प उठता है। वे दौड़कर उसे थामते भी हैं, लेकिन उनकी जुबान से ममता की कोमलता के बजाय एक गुरु की सीख निकलती है—“संभल कर चलो।” जब दुनिया की ठोकरें खाकर संतान अंदर से टूटने लगती है, तो वे अपनी बरसों की संचित ऊर्जा से उसे दोबारा जोड़ते हैं, मगर साथ ही यह मंत्र भी फूंकते हैं—“खुद ही सम्भालना सीखो।”


| पिता के प्रेम का बाह्य रूप | पिता के प्रेम का आंतरिक सत्य 

                (कठोरता) (करुणा) |

| "संभल कर चलो" | "तुम्हें कभी चोट न लगे" 

           (कठोर निर्देश)। (अव्यक्त प्रार्थना) |

| "खुद ही संभालना सीखो" | "मेरे बाद भी तुम अजेय रहो" 

             (अकेला छोड़ना) (आत्मनिर्भरता का पाठ) |


यह कठोरता निष्ठुरता नहीं, बल्कि संतान को उस समय के लिए तैयार करने की कूटनीति है जब वे खुद इस दुनिया में नहीं होंगे। वे अपनी संतान को 'आश्रित' नहीं, 'आत्मनिर्भर' बनाना चाहते हैं।


४. मौन गंगा का महा-समर्पण


पिता का पूरा जीवन एक ऐसा अनुष्ठान है जहाँ कोई शिकायत नहीं होती, कोई शर्त नहीं होती। माँ के आँसू तो दुनिया देख लेती है और उनके प्रति कृतज्ञ हो जाती है, परंतु पिता के वे आँसू जो कभी आँखों के कोर तक नहीं आ पाए, जो अंदर ही अंदर उनके सीने में जम गए, उनका हिसाब इस दुनिया का कोई बहीखाता नहीं रख पाता।


वे उस 'मौन गंगा' के समान हैं जो खामोशी से बहती है, पत्थरों को काटती है, मैदानों को हरा-भरा करती है और अंत में बिना कोई दावा किए समुद्र में खुद को समर्पित कर देती है। उनकी इस स्थायी खामोशी के महासागर में भरपूर, अथाह और असीम प्यार छिपा होता है।


## कृतज्ञता का मौन साष्टांग


आज जब हम मुड़कर अपने बचपन और वर्तमान के बीच के फासले को देखते हैं, तो समझ आता है कि जिस ऊँगली को पकड़कर हम कभी बेखौफ चले थे, आज भले ही वह ऊँगली हमारे हाथ में न हो, लेकिन उसका 'भरोसा' हमारे आत्मविश्वास में बनकर दौड़ रहा है। पिता भले ही शांत हों, बूढ़े हो चले हों या समय के उस पार जा चुके हों, लेकिन उनके द्वारा बुनी गई सुरक्षा की वह अदृश्य छत ताउम्र हमारे सिर पर तनी रहती है।


यह समेकित आलेख संसार के उन सभी पिताओं के चरणों में एक सजल अर्घ्य है, जो बिना किसी ढोल-नगाड़े के, एक स्थायी मौन ओढ़कर, अपनी संतानों के भाग्य का निर्माण करते हैं। पिता को समझना ईश्वर को समझने जैसा है—दोनों ही अदृश्य रहकर हमारी सृष्टि को थामे रखते हैं।