विपत्तियों का अध्यात्म और निष्काम शरणागति — राजमाता कुंती का क्रांतिकारी दुख-दर्शन

 


विपत्तियों का अध्यात्म और निष्काम शरणागति — राजमाता कुंती का क्रांतिकारी दुख-दर्शन

विपदः सन्तु ताः शश्वत् तत्र तत्र जगद्गुरो।

भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्॥ (श्रीमद्भागवत: १.८.२५)

महाभारत का भीषण महायुद्ध समाप्त हो चुका था। कुरुक्षेत्र की रक्त रंजित भूमि पर विजय के शंखनाद के साथ हस्तिनापुर के सिंहासन पर धर्मराज युधिष्ठिर विराजमान थे। चारों ओर न्याय, नीति और धर्म की पुनर्स्थापना का उत्सव था। परंतु इस बाह्य विजय के पीछे लाखों पिताओं के क्रंदन, स्त्रियों के विलाप और वीरान हो चुकी कोखों के असंख्य मर्मांतक घाव थे। जब इस महाविनाश के सूत्रधार और पाण्डवों के परम रक्षक योगेश्वर श्रीकृष्ण सब कुछ सुव्यवस्थित करके अपनी नगरी द्वारका लौटने लगे, तब रथ के समीप खड़ी राजमाता कुंती का हृदय तड़प उठा।

राजप्रासाद के ऐश्वर्य, वैभव और पुत्रों के सम्राट बनने के इस चरम सुख के क्षण में कुंती ने भगवान से जो माँगा, वह सामान्य मानवीय बुद्धि के परे है। जहां संसार का प्रत्येक प्राणी घुटनों के बल बैठकर विधाता से सुख, समृद्धि और दुखों की निवृत्ति की भीख मांगता है, वहीं इतिहास की उस महानायिका ने हाथ जोड़कर कहा—"हे जगद्गुरु! हमारे जीवन में विपत्तियाँ शाश्वत रूप से बार-बार आती रहें।"


१. आध्यात्मिक दृष्टिकोण: अहंकार का विसर्जन और सान्निध्य का रहस्य


अध्यात्म के मार्ग पर 'सुख' को अक्सर सबसे बड़ा अवरोध माना गया है। सुख मनुष्य के भीतर एक छद्म सुरक्षा का भाव पैदा करता है, जिससे 'अहंकार' (Ego) का जन्म होता है। जब जीवन में सब कुछ अनुकूल होता है, तो जीव अनजाने में खुद को ही अपनी नियति का कर्ता मान बैठता है।


 * सुख की विस्मृति: सुख में वासनाएं और इंद्रियां इतनी प्रबल हो जाती हैं कि आत्मा का चैतन्य सो जाता है। संत कबीर ने इसी शाश्वत सत्य को रेखांकित करते हुए कहा था:


"सुख के माथे सिल पड़े, नाम हरि का जाय। 

बलिहारी दुःख आपनो, पल-पल हरि गुण गाय॥"


 * दुख की कीमिया (Alchemy of Suffering): कुंती का दुख मांगना कोई 'पीड़ा-लोलुपता' (Masochism) नहीं थी। वे दुख की उस आध्यात्मिक कीमिया को समझ चुकी थीं जो मनुष्य के अहंकार को छिन्न-भिन्न कर देती है। दुख में जब संसार के सारे सहारे टूट जाते हैं, जब बुद्धि और पुरुषार्थ पंगु हो जाते हैं, तब जीव पूर्ण रूप से 'अकिंचन' (अत्यंत असहाय) होकर ईश्वर की शरण में आता है। कुंती के लिए दुख का आना, वास्तव में कृष्ण के आने का आमंत्रण था।


२. दार्शनिक दृष्टिकोण: परम विरक्ति और 'अपुनर्भव' का मार्ग


भारतीय दर्शन में जीवन का अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' यानी जन्म-मरण के इस अंतहीन चक्र से मुक्ति है। कुंती की प्रार्थना का दार्शनिक आधार यही परम वैराग्य है। वे कहती हैं कि संकटों के उस महासागर में जब-जब आपका दर्शन होता है, तो वह दर्शन 'अपुनर्भवदर्शनम्' हो जाता है—अर्थात उसके बाद फिर इस नश्वर संसार का दर्शन (पुनर्जन्म) नहीं करना पड़ता।


 * इतिहास की गवाही: कुंती ने भगवान कृष्ण को याद दिलाते हुए उन सारे संकटों की सूची गिनाई जिससे वे गुजरी थीं। भीम को विष दिए जाने का षड्यंत्र, लाक्षागृह की भयानक अग्नि, हिडिम्ब जैसे राक्षसों का भय, द्यूतसभा में द्रौपदी का मर्मभेदी अपमान, एक वर्ष का अज्ञातवास व बारह वर्षों का कठोर वनवास, कुरुक्षेत्र के युद्ध में भीष्म-द्रोण-कर्ण जैसे महारथियों के अस्त्र और अंततः उत्तरा के गर्भ पर अश्वत्थामा द्वारा छोड़ा गया ब्रह्मास्त्र।


 * संकट का कूटनीतिक सत्य: कुंती का दार्शनिक निष्कर्ष यह था कि यदि उनके जीवन में ये भयावह संकट न आए होते, तो लाक्षागृह में, वन में, और युद्ध के मैदान में नारायण साक्षात् सारथी बनकर उनके साथ खड़े न होते। संकट जितने गहरे थे, भगवान का सान्निध्य उतना ही सघन था। आज जब राज्य मिल गया है, सुख आ गया है, तो कृष्ण दूर द्वारका जा रहे हैं। इसलिए कुंती के लिए कृष्णविहीन 'स्वर्ग' से ज्यादा प्रिय कृष्णयुक्त 'नरक' था।


३. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण: मानसिक अनुकूलन और निर्भयता का रूपांतरण


आधुनिक मनोविज्ञान (Modern Psychology) के प्रकाश में यदि हम कुंती के मानस का विश्लेषण करें, तो यह 'तनाव से उबरने की क्षमता' (Resilience) का चरम उदाहरण है। सामान्यतः दुख मनुष्य को अवसाद (Depression) और कुंठा की ओर ले जाता है। परंतु कुंती ने अपने जीवन के दुखों का 'संज्ञानात्मक पुनर्गठन' (Cognitive Reframing) कर दिया।


 * दुख का दैवीकरण: कुंती ने अपनी पीड़ा को 'दुर्भाग्य' मानने के बजाय उसे 'भगवद्-कृपा' के रूप में देखना शुरू किया। जैसे ही मनुष्य अपने संकटों को ईश्वर की किसी उच्च योजना का हिस्सा मान लेता है, उसका मानसिक संताप समाप्त हो जाता है।


 * भय की समाप्ति: जब मनुष्य सबसे बुरे दौर से गुजर चुका होता है और उसमें भी सुरक्षित बच जाता है, तो उसका भय समाप्त हो जाता है। कुंती इतनी निर्भय हो चुकी थीं कि अब वे दुख से भागने के बजाय उसे आंखें दिखाकर कह सकती थीं कि 'आओ, क्योंकि तुम्हारे पीछे मेरा कृष्ण खड़ा है।'


४. समाजशास्त्रीय एवं पारिवारिक दृष्टिकोण: विषमताओं में तपी एक मां का मातृत्व


एक समाजशास्त्रीय और पारिवारिक दृष्टिकोण से देखें तो कुंती का पूरा जीवन एक अंतहीन संघर्ष की गाथा है। महलों की रानी होने के बावजूद उन्होंने कभी सुख का उपभोग नहीं किया। दासी माद्री के बच्चों (नकुल-सहदेव) को अपने बेटों से ज्यादा प्रेम देना, समाज की कुरीतियों और दुर्योधन के अन्याय के खिलाफ अपने बेटों के भीतर स्वाभिमान की आग जलाए रखना—यह एक असाधारण मां का चरित्र है।


 * सामूहिक चेतना का परिष्कार: महाभारत के युद्ध के बाद जब समाज पूरी तरह टूट चुका था, तब राजमाता के इस बयान ने पूरे हस्तिनापुर की सामूहिक चेतना को एक नई दिशा दी। उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि यदि धर्म की राह पर चलते हुए दुख भी सहना पड़े, तो वह दुख अधर्म के सुख से लाख गुना बेहतर है।


 * निष्काम भक्ति का पैमाना: कुंती ने आने वाली पीढ़ियों के लिए भक्ति का एक ऐसा मापदंड स्थापित किया जहां ईश्वर से किसी 'सौदेबाजी' (Transactional Faith) की गुंजाइश नहीं बचती। यह प्रेम की वह पराकाष्ठा है जहां प्रेमी अपने प्रिय से उसके होने के बदले कुछ नहीं मांगता, यहाँ तक कि अपनी सुख-शांति भी नहीं।


## भक्ति का शाश्वत शिखर


राजमाता कुंती की यह प्रार्थना संसार के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित एक ऐसा रहस्यमयी द्वार है, जो केवल निष्काम प्रेमियों के लिए खुलता है। यह स्तुति हमें सिखाती है कि जीवन की वास्तविक सार्थकता दुखों से भागने में या केवल सुखों की सेज पर सोने में नहीं है।

"सच्चा आनंद तो इस बोध में है कि परिस्थिति चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल, हृदय की धड़कन में केवल और केवल उस परम चेतना का स्मरण बना रहे। कुंती का यह अध्यात्म आज के व्यग्र और तनावग्रस्त मानव समाज के लिए एक संजीवनी बूटी है, जो याद दिलाती है कि कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी विपत्ति ही ईश्वर के सबसे निकट पहुंचने का सर्वोत्तम मार्ग बन जाती है।"