जय श्रीमन्नारायण। श्री हरि ॐ।

 


जय श्रीमन्नारायण। श्री हरि ॐ।

नेह-डोर: दामोदर लीला


# भूमिका (दोहा)


मोह बांधता जीव को, मिले न आदि न अंत।

प्रेम बांधता ईश को, नाच नचावे संत॥

जो निर्बन्ध अगाध है, व्यापक जग-दातार।

आज बंधा वह प्रेम में, ओखल की मँझधार॥


# छवि मनहार (छंद प्रवाह)


कमर बंधी ओखल की रस्सी, खींचत छवि मनहार है,

राखो लाज हमारी मोहन, तुम ही पालनहार है।

सुघड़ नयन का काजल बहकर, गाल-ललाटहिं राँगत है,

मींज-मींज लोचन मुठिया से, श्यामल मुख सरसाँगत है ॥१॥


धूल लपेटे कमल-कान्ति सम, धूसर गात सुकुमार अहो,

'मैया-मातु-तात' कहि रोवत, अस्फुट सुर की धार अहो।

आँगन के बल ओखल खींचत, पहुँचे काठ दुआर पर,

लटक रही काछनी कमर में, पैजनि बाजे पाँयन पर ॥२॥


गले सोहे मुक्तावलि माला, कर कंकन कंचन भारी,

घूँघरू वाले रेशम से कच, मोर-पंख छवि अति न्यारी।

रुनझुन-रुनझुन पैजनि बाजे, रुकि-मुड़ि मैया को जोहैं,

'कहीं मारन को मातु न आए', मन में डर ऐसा पोहैं ॥३॥


जो निर्बन्ध, दयानिधि, अविगत, कालहुँ जासों डरता है,

वह आज मैया की नेह-डोर में, फँसकर क्रंदन करता है।

यही भेद है मोह-प्रेम का, जग का बंधन खारा है,

पर प्रभु जब बँधते हैं इसमें, बहती रस की धारा है ॥४॥


# प्रार्थना (सवैया)


दामोदर! मोहे तिहारे ही द्वार पे, चाकर रूप में राखि लियो अब,

भूलि गयो सब जग के बंधन, तोहरे चरनन चित्त दियो अब।

पातक कोटि हरो प्रभुजी, निज किंकर मोहे स्वीकार करो अब,

दास की लाज तुम्हारे ही हाथ है, पार उतारि मँझधार हरो अब॥


॥ इति श्रीहरिचरणारविन्दमस्तु ॥