घूंघट के पीछे का पुरुषार्थ, घुँघरुओं में दफ़्न चीत्कार: 'लौंडा नाच' का संपूर्ण सांस्कृतिक एवं सामाजिक दस्तावेज़

 


घूंघट के पीछे का पुरुषार्थ, घुँघरुओं में दफ़्न चीत्कार: 'लौंडा नाच' का संपूर्ण सांस्कृतिक एवं सामाजिक दस्तावेज़

## प्रस्तावना: कला और विवशता का अनूठा महासंगम

"लौंडा नाच" उत्तर-पूर्वी भारत—विशेषकर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल)—का एक अत्यंत विख्यात, ऐतिहासिक और पारंपरिक लोक-नाट्य (Folk Theatre) है। यह केवल मनोरंजन का एक साधन मात्र नहीं है, बल्कि यह उपेक्षित और हाशिए के वर्गों की मूक अभिव्यक्ति, सामंती व्यवस्था पर तीखा प्रहार और क्षेत्रीय लोक-संस्कृति का एक जीवंत, रक्तरंजित दस्तावेज़ है।

स्थानीय भोजपुरी, मगही और मैथिली बोलियों में 'लौंडा' शब्द का तात्पर्य 'लड़का या युवा पुरुष' से होता है। इस कला विधा की सबसे अनूठी और विस्मयकारी विशेषता यह है कि इसमें पुरुष कलाकार ही महिलाओं के वस्त्र, पारंपरिक आभूषण और गाढ़ा श्रृंगार धारण करके पूरी तरह स्त्री रूप (Cross-dressing) में नृत्य, गायन और अभिनय करते हैं। मंच की कृत्रिम रोशनी में जब ये कलाकार थिरकते हैं, तो उनके पैरों की थाप पर पूरा जनमानस झूम उठता है, परंतु इस झंकार के पीछे छिपी उनकी सामाजिक परिस्थिति, आर्थिक लाचारी और मानसिक प्रताड़ना की दास्तान अत्यंत मर्मस्पर्शी है।


## ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामाजिक संरचना


लौंडा नाच का उदय और विकास भारतीय समाज की रूढ़िवादी और सामंती जड़ों से जुड़ा हुआ है।


 * पर्दा प्रथा और मनोरंजन का संकट: मध्यकाल और औपनिवेशिक काल के दौरान, विशेषकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में, कड़े सामाजिक बंधनों और 'पर्दा प्रथा' के कारण कुलीन या सामान्य परिवारों की महिलाओं को सार्वजनिक मंचों पर नाचने, गाने या अभिनय करने की सख्त मनाही थी। समाज में मनोरंजन की इस भारी कमी को पूरा करने के लिए पुरुषों ने स्वयं आगे बढ़कर स्त्री का वेश धारण किया और लोक-मंचों की कमान संभाली।


 * भिखारी ठाकुर का स्वर्ण युग: इस लोक कला को देश-दुनिया में पहचान दिलाने, इसे अदब और सम्मान बख्शने तथा इसे समाज सुधार का एक अचूक हथियार बनाने का ऐतिहासिक श्रेय "भोजपुरी के शेक्सपियर" कहे जाने वाले महान लोक कलाकार भिखारी ठाकुर को जाता है। उन्होंने २०वीं सदी की शुरुआत में इस नाच विधा को केंद्र में रखकर 'बिदेसिया', 'गबरघिचोर' और 'बेटी बेचवा' जैसे कालजयी नाटकों की रचना की, जिसने समाज की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया।


 * शोषित वर्ग की आवाज़: पारंपरिक रूप से इस नाच मंडलियों में काम करने वाले अधिकांश कलाकार समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से अत्यधिक पिछड़े, शोषित और हाशिए के वर्गों (जैसे दलित, ओ.बी.सी. और अत्यंत पिछड़े वर्ग) से आते थे। ऊँची जातियों के सामंतों के महलों और आँगनों में जब ये शोषित कलाकार स्त्री बनकर नाचते थे, तो वह केवल नृत्य नहीं, बल्कि कला के माध्यम से व्यवस्था को दिया गया एक मूक उत्तर भी था।


## कलात्मक स्वरूप और मंचन शैली


लौंडा नाच कोई साधारण या सतही नृत्य नहीं है; यह भारतीय नाट्य परंपरा के लोक-पक्ष का वह उत्कृष्ट रूप है जिसमें नृत्य, संगीत, तीखा हास्य (Slapstick Comedy), और अत्यंत गंभीर नाट्य (Melodrama) का एक संपूर्ण कोलाज देखने को मिलता है।


 * वेशभूषा और नज़ाकत भरा श्रृंगार: मुख्य कलाकार (लौंडा) चटक रंग का घाघरा-चोली या बनारसी साड़ी पहनता है। वह पैरों में भारी घुँघरू, हाथों में कंगन, कानों में झुमके, गले में नौलखा हार और चेहरे पर गाढ़ा मेकअप (फाउंडेशन, लाली, तीखी बिंदी और काजल) लगाता है। मंच पर उनकी भाव-भंगिमाएँ, आँखों की मटकन और कमर की लचक इतनी सजीव और नज़ाकत भरी होती है कि पहली नज़र में किसी भी अजनबी के लिए यह पहचानना असंभव हो जाता है कि सामने थिरक रहा विग्रह वास्तव में एक पुरुष है।


 * पारंपरिक वाद्य यंत्रों का समन्वय: इसके संगीत पक्ष को ग्रामीण परिवेश के अनुकूल और ऊर्जामय बनाने के लिए हारमोनियम, ढोलक, झाल (मंजीरा) और कहीं-कहीं शहनाई या क्लैरिनेट का अनूठा प्रयोग किया जाता है। ऊंचे सुर में गाए जाने वाले पूर्वी, कजरी, चैती और बिदेसिया गीत दर्शकों के सीधे कलेजे में उतरते हैं।


 * जोकर या लबड़धोधो (विदूषक) की भूमिका: पूरी-पूरी रात चलने वाले इस नाच में दर्शकों के कौतूहल को बनाए रखने और समाँ बाँधने के लिए एक 'जोकर' होता है, जिसे स्थानीय भाषा में 'लबड़धोधो' कहा जाता है। वह फटे-पुराने, अजीबो-गरीब कपड़े पहनकर और चेहरे पर कालिख या चूना लगाकर मंच पर आता है। वह मुख्य कलाकार (लौंडा) के साथ तीखे, हास्यप्रद, व्यंग्यात्मक और सामाजिक-राजनीतिक संवाद बोलकर दर्शकों को लोटपोट कर देता है।


## मुख्य विषय-वस्तु (Themes)


भिखारी ठाकुर के नेतृत्व में इस नाच का उद्देश्य केवल सतही आमोद-प्रमोद नहीं, बल्कि तात्कालिक सामाजिक कुरीतियों पर करारा प्रहार था:


 1. पलायन और विरह का दर्द ('बिदेसिया'): बिहार और पूर्वांचल की सबसे बड़ी त्रासदी रही है—रोज़गार के लिए पुरुषों का असम के चाय बागानों या कोलकाता (कलकत्ता) की मिलों में पलायन। पीछे छूट गई एकाकी पत्नी के विरह, उसकी असुरक्षा और अंतहीन प्रतीक्षा के दर्द को जब एक पुरुष कलाकार मंच पर साड़ी का पल्लू आँख पर रख कर जीवंत करता था, तो पूरे पंडाल में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ता था।


 2. कुप्रथाओं पर निर्मम प्रहार ('बेटी बेचवा'): धन के लोभ में कम उम्र की बच्चियों की शादी वृद्ध पुरुषों के साथ कर देने की 'बेमेल विवाह' प्रथा पर इस नाच के माध्यम से ऐसी चोट की गई कि कई गावों में इस कुप्रथा पर रोक लग गई।


 3. घरेलू और राजनैतिक व्यंग्य: तत्कालीन ज़मींदारों के अत्याचारों, भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था और घरेलू मोर्चे पर सास-बहू या ननद-भाभी के तीखे संवादों को व्यंग्य के रूप में प्रस्तुत कर समाज को आईना दिखाया जाता था।


## कलाकारों की सामाजिक परिस्थिति और दर्द की दास्तान

मंच पर थिरकते जिन घुँघरुओं की आवाज़ पर दुनिया ताली बजाती है, वास्तव में वह उन कलाकारों के सीने में दफ़्न चीत्कारों का कफ़न है। इन नर्तकों का जीवन दोहरेपन, सामाजिक तिरस्कार और मानसिक अवसाद की एक ऐसी मूक गाथा है, जिसे समाज ने कभी पढ़ने की चेष्टा नहीं की।


१. सामाजिक अभिशाप और दोहरी पहचान का दंश


पितृसत्तात्मक समाज पुरुषत्व (Masculinity) के एक तय और कठोर ढांचे पर काम करता है। जब कोई पुरुष अपनी जीविका के लिए उस ढांचे को तोड़कर स्त्री वेश धारण करता है, तो समाज उसे अपनी नज़रों से गिरा देता है।


 * अपमानजनक उपनाम: इन कलाकारों को समाज में सामान्य पुरुषों की तरह सम्मान नहीं मिलता; उन्हें आम बोलचाल में 'हिजड़ा', 'छक्का', 'लौंडिया' या 'मेहरुआ' (जनाना) जैसे अत्यंत अपमानजनक और मानसिक रूप से तोड़ देने वाले शब्दों से प्रताड़ित किया जाता है, भले ही वे पारिवारिक और शारीरिक रूप से पूर्णतः सामान्य पुरुष हों।


 * अपनों का बहिष्कार: कई कलाकारों का दर्द यह है कि उनका अपना परिवार भी उन्हें स्वीकार नहीं कर पाता। उनके पिता, भाई या बच्चे समाज में इस बात को स्वीकार करने से कतराते हैं कि उनका कोई सगा संबंधी नाच मंडली में है। कई जाँबाज कलाकारों की शादियाँ टूट गईं और उनके बच्चों को स्कूलों में सहपाठियों के तीखे उपहास का सामना करना पड़ता है।


२. आर्थिक लाचारी: 'मजबूरी का नाच'


कोई भी पुरुष स्वेच्छा या केवल शौक के वशीभूत होकर रात भर अजनबियों की सामंती महफ़िलों में घाघरा पहनकर नहीं नाचता; इस नृत्य के पैरों में बंधी असली ज़ंजीर 'पेट की भूख' और 'भयानक मुफ़लिसी' है।


 * कर्ज़ का दुष्चक्र: इस पेशे से जुड़े अधिकांश कलाकार अत्यंत निर्धन और भूमिहीन परिवारों से होते हैं। जब सूखा या बाढ़ खेती को निगल जाती है और साहूकारों का कर्ज़ सिर चढ़कर बोलने लगता है, तब अपनी इस पुश्तैनी कला को बाज़ार में बेचने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचता।


 * बुढ़ापे का वीरान अंधकार: इस विधा की क्रूरता यह है कि यहाँ पैसा और सम्मान तभी तक है जब तक शरीर में लचीलापन, रीढ़ में लचक और चेहरे पर जवानी की रौनक है। उम्र ढलते ही, जब घुटने जवाब दे देते हैं, तो इन्हें मंडलियों से दूध में से मक्खी की तरह निकाल दिया जाता है। चूंकि इनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा या सरकारी पेंशन नहीं होती, इसलिए इन्हें जीवन के अंतिम पड़ाव पर दाने-दाने को मोहताज होना पड़ता है।


३. महफ़िलों का सन्नाटा और शारीरिक-मानसिक शोषण


लौंडा नाच प्रायः शादियों, मुंडन संस्कारों और लोक-उत्सवों में रात से लेकर सुबह होने तक अनवरत चलता है। शराब के नशे में धुत, हथियारों से लैस सामंती भीड़ के सामने इन कलाकारों की सुरक्षा हमेशा दांव पर लगी होती है।


"मंच पर वह सब कुछ सहता है—नशेड़ियों की फूहड़ फब्तियां, ज़बरदस्ती हाथ पकड़ने की कोशिशें और मना करने पर बंदूक की नोंक पर नाचने की धमकियाँ। वह रो नहीं सकता, क्योंकि आँखों से गिरा एक भी आँसू उसके चेहरे के गाढ़े मेकअप को बहा देगा और सामंतों का तमाशा खराब हो जाएगा।"


 * पहचान का संकट (Identity Crisis): पूरी रात एक स्त्री की नज़ाकत, उसकी कामुकता, उसके विरह और उसकी संवेदनाओं को ओढ़कर जीने के बाद, जब भोर की पहली किरण के साथ ये कलाकार अपना मेकअप उतारते हैं, तो वे एक भयानक मानसिक अवसाद से घिर जाते हैं। शीशे के सामने खड़ा पुरुष खुद से पूछता है कि उसका वास्तविक वजूद क्या है—वह पुरुष जो सुबह अपनी फटी धोती सिलता है, या वह स्त्री जो रात भर ज़मींदारों की हवस और मनोरंजन की तृप्ति करती रही?


## समकालीन चुनौतियाँ और अश्लीलता का प्रवेश


समय के पहिये और आधुनिकता की अंधी दौड़ ने इस गौरवशाली लोक-नाट्य के स्वरूप को विकृत कर दिया है:


 * डीजे और ऑर्केस्ट्रा की मार: आधुनिक सिनेमा, लाउड डीजे संस्कृति और आधुनिक भोजपुरी संगीत में आए द्विअर्थी, फूहड़ गानों के कारण पारंपरिक 'लौंडा नाच' की साहित्यिक और शास्त्रीय आत्मा दम तोड़ रही है। कुछ व्यावसायिक मंडलियों ने टिके रहने के चक्कर में इसमें फूहड़ता, अश्लीलता और नग्नता का समावेश कर दिया है, जिसके कारण संभ्रांत और सुशिक्षित परिवारों ने इस पारंपरिक विधा से पूरी तरह दूरी बना ली।


 * पुनरुद्धार की अंतिम किरण: इस अंधकार के बीच, भिखारी ठाकुर की मंडली के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित स्तम्भ, पद्मश्री से सम्मानित स्वर्गीय रामचंद्र मांझी ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक इस कला की गरिमा को बचाए रखा। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर यह सिद्ध किया कि यह नाच कोई 'सस्ता तमाशा' नहीं, बल्कि भारत की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है।


लौंडा नाच महज़ एक क्षेत्रीय लोक नृत्य नहीं है, बल्कि यह लोक-मानस की उस साझी, अनमोल विरासत का हिस्सा है जिसने कठिन से कठिन और शोषक समय में भी आम जनता को हँसना, रोना और अपनी विषम परिस्थितियों से लड़ना सिखाया है। यह कला उन गुमनाम और तिरस्कृत पुरुष कलाकारों के त्याग पर टिकी है जिन्होंने समाज के मनोरंजन के लिए अपने 'पुरुषत्व' की सामाजिक प्रतिष्ठा की आहुति दे दी।


आज समय की मांग है कि इस कला विधा को 'अश्लीलता' और 'उपहास' के ठप्पे से मुक्त कराया जाए। इसे सरकारी और सामाजिक स्तर पर संरक्षण दिया जाए, कलाकारों को उचित सम्मान और आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जाए, ताकि भिखारी ठाकुर द्वारा गढ़ा गया यह साहित्यिक और सामाजिक रंगमंच आधुनिकता के शोर में कहीं खो न जाए। जब तक हम कला के पीछे छिपे कलाकार के आंसुओं को सम्मान नहीं देंगे, तब तक हमारी लोक-संस्कृति अधूरी ही रहेगी।