लोकतंत्र तुम कहाँ हो...?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


लोकतंत्र तुम कहाँ हो...?

लोकतंत्र कहाँ हो...?

जनता के साथ हो

या कुर्सी-वीर नेताओं के साथ?


लोकतंत्र कहाँ हो...?


संविधान के साथ हो

या भ्रष्टाचार के साथ?


लोकतंत्र कहाँ हो...?


गाँव की धूल में सने

गरीब आदिवासियों के साथ हो

या सत्ता के गलियारों में गूँजते

बड़े उद्योगपतियों के साथ?


लोकतंत्र कहाँ हो...?


उस किसान के साथ हो

जो कर्ज़ और मौसम से लड़ रहा है,

या उन हाथों के साथ

जो नीतियों की दिशा तय कर रहे हैं?


लोकतंत्र कहाँ हो...?


उस मज़दूर के साथ हो

जिसके पसीने से राष्ट्र खड़ा है,

या उन महलों के साथ

जहाँ फैसलों की कीमत तय होती है?


लोकतंत्र कहाँ हो...?


अदालत की चौखट पर न्याय खोजते नागरिक के साथ हो

या ताक़त और प्रभाव के साथ?


लोकतंत्र कहाँ हो...?


यदि तुम सचमुच लोकतंत्र हो,

तो तुम्हारा स्थान किसी दल, किसी व्यक्ति,

किसी पूँजीपति या किसी शासक के साथ नहीं—


तुम्हारा स्थान उस अंतिम नागरिक के साथ है

जिसके नाम पर संविधान लिखा गया,

जिसके वोट से सरकार बनती है,

और जिसके विश्वास से राष्ट्र चलता है।


क्योंकि लोकतंत्र का धर्म सत्ता नहीं,

जनता है।


लोकतंत्र का स्वामी नेता नहीं,

नागरिक है।


और सच यही है—


लोकतंत्र वहीं होना चाहिए

जहाँ संविधान हो,

जहाँ न्याय हो,

जहाँ जवाबदेही हो,

जहाँ सबसे कमज़ोर व्यक्ति का अधिकार सुरक्षित हो।