लोकतंत्र, दल-बदल और मीडिया की सुर्खियाँ: आखिर कहानी क्या है?
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
लोकतंत्र, दल-बदल और मीडिया की सुर्खियाँ: आखिर कहानी क्या है?
## क्या भारतीय राजनीति विचारधारा से चल रही है या अवसरवाद से?
भारतीय लोकतंत्र एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ घटनाओं से अधिक उनकी प्रस्तुति चर्चा का विषय बनती जा रही है। संसद से लेकर सड़क तक, राजनीतिक दलों से लेकर मीडिया संस्थानों तक, हर कोई लोकतंत्र, संविधान और जनता की बात तो करता है, परंतु प्रश्न यह है कि इन शब्दों का वास्तविक अर्थ किसके व्यवहार में दिखाई देता है?
हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या भारत की राजनीति अब वैचारिक संघर्ष का मंच है या केवल सत्ता-समीकरणों का अखाड़ा?
एक ओर विपक्षी दलों का गठबंधन अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करने का प्रयास करता है, दूसरी ओर उसी समय सहयोगी दलों में टूट-फूट, सांसदों के पाला बदलने और नए राजनीतिक समीकरणों की खबरें सामने आती हैं। यह केवल किसी एक दल या गठबंधन का संकट नहीं है; यह उस राजनीतिक संस्कृति का संकट है जिसमें जनादेश से अधिक महत्व सत्ता की संभावनाओं को मिलने लगता है।
## दल-बदल: लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना
यदि किसी दल के बड़ी संख्या में सांसद अचानक वैचारिक मतभेदों के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ, दबाव या अवसर के कारण अपना रुख बदलते हैं, तो यह केवल उस दल की समस्या नहीं रहती। यह लोकतांत्रिक नैतिकता का प्रश्न बन जाती है।
लोकतंत्र में दल बदलना कानूनी रूप से संभव हो सकता है, लेकिन उसका नैतिक औचित्य अलग प्रश्न है। जनता किसी सांसद को केवल व्यक्ति के रूप में नहीं चुनती; वह उसके दल, विचारधारा और चुनावी वादों पर भी विश्वास करती है।
इसलिए जब निर्वाचित प्रतिनिधि चुनाव के बाद अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलते हैं, तब सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि जनादेश आखिर किसका था— मतदाता का या सत्ता के गलियारों का?
यदि आज किसी राज्य में विपक्षी दल टूटता है और कल किसी दूसरे राज्य में सत्तारूढ़ दल टूटे, दोनों स्थितियों में लोकतंत्र को समान रूप से क्षति पहुँचती है। लोकतंत्र का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि लाभ किसे हुआ, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि जनता के विश्वास का क्या हुआ।
## मीडिया की भूमिका: खबर या व्याख्या?
इन घटनाओं का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष मीडिया की भूमिका है। एक ही घटना को अलग-अलग अखबार अलग-अलग शीर्षकों के साथ प्रस्तुत करते हैं। कहीं किसी दल की टूट को "फलाँ नेता को झटका" कहा जाता है, कहीं उसे "लोकतांत्रिक विद्रोह" बताया जाता है, तो कहीं उसे राष्ट्रीय राजनीति के नए अध्याय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यहीं से पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है।
"क्या समाचार का उद्देश्य तथ्य बताना है या पाठक को किसी निष्कर्ष तक पहुँचाना?"
उदाहरण के लिए, यदि किसी दल के सांसद दूसरी राजनीतिक धारा में चले जाते हैं, तो यह एक तथ्य है। लेकिन उसे "झटका", "संकट", "मास्टरस्ट्रोक", "राजनीतिक चमत्कार" या "जनता का फैसला" कहना संपादकीय व्याख्या है।
समाचार और टिप्पणी के बीच की यह रेखा जितनी धुंधली होती जाएगी, लोकतंत्र में नागरिकों के लिए सत्य को पहचानना उतना ही कठिन होता जाएगा।
## राजनीतिक प्रचार और व्यक्तित्व-पूजा का दौर
भारतीय राजनीति का एक चिंताजनक पक्ष यह भी है कि नीतियों और संस्थाओं की तुलना में व्यक्तियों का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है। राजनीतिक विमर्श का केंद्र अब बेरोज़गारी, शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता जैसे प्रश्न कम और नेताओं की छवि अधिक हो गई है।
जब किसी भी सरकार की आलोचना को राष्ट्र-विरोध और किसी भी नेता की प्रशंसा को राष्ट्रभक्ति का पर्याय बना दिया जाता है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे संस्थाओं से हटकर व्यक्तियों के इर्द-गिर्द सिमटने लगता है। लोकतंत्र की शक्ति किसी एक नेता की लोकप्रियता में नहीं, बल्कि संस्थाओं की स्वतंत्रता में निहित होती है।
## विपक्ष का संकट और सत्ता की चुनौती
यह भी सच है कि किसी भी लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष उतना ही आवश्यक है जितनी सशक्त सरकार।
यदि विपक्ष बिखरता है, तो सत्ता निरंकुश होने का खतरा बढ़ता है। लेकिन यदि विपक्ष केवल सत्ता-विरोध के आधार पर एकजुट होता है और वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत नहीं करता, तो उसकी विश्वसनीयता भी कमजोर पड़ती है। इसलिए विपक्ष का प्रश्न केवल एकता का नहीं, बल्कि वैचारिक स्पष्टता का भी है।
उसी प्रकार सरकार का दायित्व केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के विश्वास को मजबूत बनाए रखना भी है।
## लोकतंत्र की असली कसौटी
लोकतंत्र की परीक्षा तब नहीं होती जब सब कुछ सामान्य चल रहा हो। लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब सत्ता शक्तिशाली हो, विपक्ष कमजोर हो, मीडिया विभाजित हो और संस्थाओं पर प्रश्न उठ रहे हों। ऐसे समय में लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं रह जाता। लोकतंत्र का अर्थ बन जाता है—
* क्या असहमति सुरक्षित है?
* क्या संस्थाएँ स्वतंत्र हैं?
* क्या मीडिया निर्भीक है?
* क्या जनता को पूरी जानकारी मिल रही है?
और सबसे महत्वपूर्ण— "क्या सत्ता जनता से अधिक शक्तिशाली हो गई है?"
## लोकतंत्र किसी दल का नहीं, जनता का होता है
आज आवश्यकता किसी एक नेता, एक दल या एक गठबंधन के पक्ष अथवा विपक्ष में खड़े होने की नहीं है। आवश्यकता लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में खड़े होने की है। क्योंकि सरकारें आती-जाती हैं, गठबंधन बनते-बिगड़ते हैं, नेता बदलते हैं, लेकिन लोकतंत्र तभी बचता है जब जनता सजग रहती है और मीडिया सत्ता तथा विपक्ष— दोनों से समान दूरी बनाए रखकर प्रश्न पूछता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संसद नहीं, सरकार नहीं, विपक्ष नहीं— बल्कि जागरूक नागरिक होता है। और जब नागरिक प्रश्न पूछना बंद कर देता है, तब लोकतंत्र का क्षरण शुरू हो जाता है।
