एवियन की 'फ़रिश्ता कूटनीति' और वाशिंगटन-तेहरान समझौते का नया वैश्विक यथार्थ
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
एवियन की 'फ़रिश्ता कूटनीति' और वाशिंगटन-तेहरान समझौते का नया वैश्विक यथार्थ
जब फ़्रांस के एवियन शहर में जी-7 शिखर सम्मेलन के इतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक कठोरता को "फ़रिश्ते" जैसी सुंदर उपमाओं से ढक रहे थे, तब पर्दे के पीछे वैश्विक भू-राजनीति की सबसे बड़ी बिसात बिछाई जा रही थी। अमेरिका और ईरान के बीच हस्ताक्षरित 14 सूत्रीय "समझौता ज्ञापन" (MoU) का पूरा पाठ सार्वजनिक होना महज़ एक द्विपक्षीय युद्धविराम नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) और वैश्विक अर्थव्यवस्था के इतिहास का एक नया मोड़ है। यह समझौता साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जो देश कल तक 'परम शत्रु' थे, वे अपने आर्थिक और रणनीतिक अस्तित्व के लिए किसी भी सीमा तक जाकर हाथ मिला सकते हैं।
इस ऐतिहासिक समझौते के आलोक में, एवियन में हुई मोदी-ट्रंप मुलाक़ात और भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं का नए सिरे से मूल्यांकन करना बेहद प्रासंगिक हो जाता है।
1. होर्मुज़ स्ट्रेट का खुलना और भारतीय नाविकों का सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एवियन में जिस 'फ़्रीडम ऑफ़ नेविगेशन' (समुद्री नौवहन की स्वतंत्रता) और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने की पुरज़ोर वकालत की थी, इस समझौते की धारा-4 और धारा-5 ने उसे धरातल पर उतार दिया है। अमेरिका द्वारा अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को 30 दिनों के भीतर पूरी तरह समाप्त करने का निर्णय और बदले में ईरान द्वारा होर्मुज़ स्ट्रेट से वाणिज्यिक जहाजों को "सुरक्षित मार्ग" देने की प्रतिबद्धता—वैश्विक व्यापार के लिए एक संजीवनी की तरह है।
* भारतीय संदर्भ: भारत के लाखों नाविक (सीफ़ेरर्स) जो इन अशांत समुद्रों में अपनी जान जोखिम में डालकर सेवाएं दे रहे थे, उनके लिए यह राहत की ख़बर है। लेकिन भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी नाकेबंदी के दौरान अमेरिकी हमलों में उसके निर्दोष नागरिकों को जान गंवानी पड़ी थी। यह समझौता जहां तेल की कीमतों को स्थिर करेगा, वहीं यह भी याद दिलाएगा कि महाशक्तियों के संघर्ष और उनके अचानक हुए समझौतों के बीच विकासशील देशों के हितों को केवल 'कोलैटरल डैमेज' या मूक दर्शक की तरह ही देखा जाता है।
2. 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण और कूटनीति का यू-टर्न
इस 14 सूत्रीय दस्तावेज़ में सबसे चौंकाने वाला और वैचारिक रूप से विचलित करने वाला बिंदु धारा-6 है। इसके तहत अमेरिका और उसके क्षेत्रीय भागीदार ईरान के पुनर्निर्माण के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की योजना विकसित करेंगे। जो अमेरिका कल तक ईरान को 'अक्ष का हिस्सा' (Axis of Evil) और वैश्विक आतंकवाद का प्रायोजक बताकर उस पर कड़े प्राथमिक व द्वितीयक (Primary & Secondary) प्रतिबंध मढ़ रहा था, वही अमेरिका अब ईरान की अर्थव्यवस्था को अपने पैसों से सींचने को तैयार है।
यह कूटनीतिक यू-टर्न भारत जैसे देशों के लिए एक बड़ा सबक है। हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भारत को ईरान पर लगे प्रतिबंधों और नाकेबंदी का कड़ाई से पालन करने की 'चेतावनी' दी थी। भारत ने अमेरिकी दबाव में ईरान से अपने सदियों पुराने तेल आयात को लगभग शून्य कर दिया था और चाबहार बंदरगाह जैसी रणनीतिक परियोजनाओं की गति धीमी पड़ गई थी। आज जब अमेरिका खुद ईरान के कच्चे तेल, बैंकिंग और बीमा सेवाओं को टैक्स छूट (धारा-10) दे रहा है और उसकी ज़ब्त संपत्तियों को बहाल (धारा-11) कर रहा है, तो सवाल उठता है कि वाशिंगटन के दबाव में आकर अपने रणनीतिक हितों की बलि देने वाले देशों के हाथ में क्या आया?
3. 'व्यक्ति-केंद्रित' गारंटी बनाम संस्थागत अंतरराष्ट्रीय नियम
एवियन में डोनाल्ड ट्रंप ने बड़े नाटकीय अंदाज़ में कहा था कि "अगर भारत पर हमला होता है, और मोदी नेता हैं, तो हम मदद के लिए वहां रहेंगे।" लेकिन ईरान के साथ हुआ यह समझौता दिखाता है कि अमेरिका किसी व्यक्ति विशेष के चेहरे को देखकर नीतियां नहीं बदलता, बल्कि अपनी घरेलू आर्थिक मजबूरियों और वैश्विक दबावों के आगे झुकता है।
ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को वर्तमान यथास्थिति (धारा-9) पर रखने और आईएईए (IAEA) के पर्यवेक्षण को स्वीकार करने के बदले अमेरिका को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। यह समझौता किसी व्यक्तिगत 'केमिस्ट्री' का परिणाम नहीं है, बल्कि कड़े संस्थागत मोलभाव (Negotiation) का नतीजा है, जिसे अंततः संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के एक बाध्यकारी प्रस्ताव (धारा-14) द्वारा सुरक्षित किया जाएगा। यह भारत के रणनीतिकारों को याद दिलाता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में 'मौखिक आश्वासनों' और 'नेताओं की सुंदरता' की प्रशंसा से परे, केवल लिखित, संस्थागत और बहुपक्षीय संधियां ही स्थायी सुरक्षा की गारंटी होती हैं।
## भारत के लिए आत्मनिरीक्षण की घड़ी
वाशिंगटन और तेहरान के बीच 60 दिनों की यह वार्ता खिड़की (Negotiation Window) यदि अंतिम समझौते में बदलती है, तो यह वैश्विक भू-राजनीति का एक नया सवेरा होगा। पश्चिम एशिया में "नई किरण" देखने की प्रधानमंत्री मोदी की आशा सच साबित हो रही है, लेकिन इसके पीछे ट्रंप के प्रयासों से ज्यादा अमेरिकी प्रशासन की यह मजबूरी है कि वह एक साथ कई मोर्चों (यूक्रेन, ताइवान और मिडल ईस्ट) पर युद्ध नहीं झेल सकता।
भारत के लिए यह समय 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) को फिर से परिभाषित करने का है। जब अमेरिका अपने धुर विरोधी के साथ 300 अरब डॉलर की डील कर सकता है, तो भारत को भी बिना किसी हिचकिचाहट के ईरान के साथ अपने ऊर्जा और व्यापारिक संबंधों को तुरंत पुनर्जीवित करना चाहिए। एवियन की 'फ़रिश्ता कूटनीति' अपनी जगह है, लेकिन इस समझौते की कड़वी हकीकत यही सिखाती है कि महाशक्तियों की कूटनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न कोई स्थायी दुश्मन; वहां केवल और केवल 'राष्ट्रीय हित' ही स्थायी होते हैं।
