प्रशासनिक जवाबदेही, संगठनों की भूमिका और पारदर्शिता के लोकतांत्रिक सरोकार
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
प्रशासनिक जवाबदेही, संगठनों की भूमिका और पारदर्शिता के लोकतांत्रिक सरोकार
हाल के वर्षों में, विशेषकर NEET जैसी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परीक्षाओं में हुई विफलता और पेपर लीक जैसी घटनाओं ने देश के प्रशासनिक ढांचे की सीमाओं को उजागर किया है। जब राज्य की सर्वोच्च एजेंसियां और तकनीकी तंत्र असफल साबित होने लगते हैं, तब स्वाभाविक रूप से समाज और विश्लेषकों के बीच देश के सबसे बड़े और 'सक्षम' होने का दावा करने वाले संगठनों की भूमिका, उनकी जवाबदेही और उनके विशेष अधिकारों को लेकर बुनियादी सवाल उठने लगते हैं।
1. प्रशासनिक कार्य बनाम स्वैच्छिक क्षमता
आरएसएस प्रमुख के 2018 के बयान (जिसमें आपदा या संकट के समय तीन दिनों में स्वयंसेवकों को तैयार करने की बात कही गई थी) के संदर्भ में यह सवाल उठना लाजिमी है कि यदि कोई संगठन इतना अनुशासित और त्वरित है, तो देश के संकटों में उसका उपयोग क्यों नहीं होता?
हालांकि, इस पर प्रशासनिक और संवैधानिक दृष्टिकोण थोड़ा भिन्न है:
* संवैधानिक मर्यादा: भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहां परीक्षा कराना, कानून-व्यवस्था संभालना या सुरक्षा सुनिश्चित करना पूरी तरह से संप्रभु राज्य (Sovereign State) और उसके वैधानिक निकायों (जैसे NTA, UPSC, या सुरक्षा बल) का एकाधिकार है।
* संस्थागत विशेषज्ञता: परीक्षा आयोजित करना केवल अनुशासन का काम नहीं, बल्कि अत्यधिक जटिल गोपनीय, तकनीकी और अकादमिक प्रक्रिया है। किसी भी गैर-सरकारी या सांस्कृतिक संगठन को यह जिम्मेदारी सौंपना प्रशासनिक और कानूनी रूप से संभव नहीं है, क्योंकि वे जनता या संसद के प्रति सीधे जवाबदेह नहीं होते।
* सैन्य/अर्धसैनिक बलों की तैयारी: परीक्षाओं के सुचारू संचालन के लिए सेना या सीआरपीएफ की मदद लेने की खबरें प्रशासनिक हताशा को तो दर्शाती हैं, लेकिन यह राज्य के अपने ही तंत्र पर निर्भरता को भी रेखांकित करती है, न कि किसी निजी या सांस्कृतिक संगठन पर।
2. राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग और प्रधानमंत्री द्वारा सीधे हस्तक्षेप करने की स्थिति पर उठ रहे सवाल लोकतांत्रिक जवाबदेही के मूल सिद्धांत से जुड़े हैं। लोकतंत्र में 'मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी' (Collective Responsibility) का नियम होता है। यदि कोई मंत्रालय बार-बार विफल होता है और उसका कार्यभार शीर्ष नेतृत्व को संभालना पड़ता है, तो यह उस विशिष्ट विभाग की अक्षमता को स्वीकार करने जैसा ही है। नीतिगत विमर्श में यह माना जाता है कि बिना कड़ी राजनीतिक जवाबदेही तय किए, प्रशासनिक सुधार संभव नहीं हैं।
3. पंजीकरण, पारदर्शिता और आरटीआई (RTI) का दायरा
यह तर्क अत्यंत सुसंगत है कि जो संगठन देश की राजनीति, नीतियों और सरकार के निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, उसके बारे में सब कुछ पारदर्शी होना चाहिए।
* पंजीकरण का मुद्दा: आरएसएस खुद को एक पंजीकृत संस्था के बजाय एक 'स्वैच्छिक सांस्कृतिक संगठन' मानता है। लेकिन जब किसी संगठन का प्रभाव सरकार बनवाने या नीति निर्धारण में दिखने लगे, तो आलोचकों और नागरिकों का यह मांग करना न्यायसंगत प्रतीत होता है कि उसे एक स्पष्ट विधिक ढांचे के तहत आना चाहिए।
* सूचना का अधिकार (RTI): वर्तमान में केवल वे संस्थाएं आरटीआई के दायरे में आती हैं जो सरकार द्वारा वित्तपोषित (funded) या नियंत्रित होती हैं। चूंकि संघ को राजनीतिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है, इसलिए लोकतांत्रिक पारदर्शिता के पैरोकार यह बहस छेड़ते रहे हैं कि राजनीतिक दलों की तरह ही ऐसे प्रभावी सांस्कृतिक-राजनीतिक संगठनों को भी सूचना और जवाबदेही के कड़े दायरे में लाया जाना चाहिए ताकि 'तानाशाही प्रवृत्तियों' पर अंकुश लगाया जा सके।
4. गुरु दक्षिणा और कर (Tax) व्यवस्था का विरोधाभास
कर व्यवस्था के दोहरे मानदंडों पर उठाया गया सवाल आर्थिक न्याय और समानता के सिद्धांत के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
* ऐतिहासिक और वर्तमान संदर्भ: 1967 या उसके आस-पास की कर नीतियां एक अलग आर्थिक युग का हिस्सा थीं। आज जब देश का एक आम नागरिक, यूट्यूब क्रिएटर, ट्यूशन पढ़ाने वाला शिक्षक और मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा अपनी मेहनत की कमाई पर 'आयकर' (Income Tax) दे रहा है, और स्कूल की फीस पर भी अप्रत्यक्ष करों का बोझ है, तो किसी भी बड़े संगठन को मिलने वाले कर-मुक्त दान (गुरु दक्षिणा) पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
* 'तर्क यह है' कि यदि कोई भी बड़ी राशि, चाहे वह किसी भी रूप में आए, सार्वजनिक जीवन या राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने में इस्तेमाल हो सकती है, तो उस पर वित्तीय पारदर्शिता और टैक्स के नियम वैसे ही लागू होने चाहिए जैसे किसी अन्य ट्रस्ट या नागरिक पर होते हैं।
* 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली धारणा लोकतंत्र को कमजोर करती है। कानून की नजर में सबको समान होना चाहिए (Article 14), चाहे वह कोई व्यक्ति हो, व्यापारी हो, या कोई शक्तिशाली संगठन।
यह पूरा विमर्श दिखाता है कि भारत का जागरूक नागरिक अब केवल दावों या अतीत के नियमों से संतुष्ट होने वाला नहीं है। चाहे परीक्षाओं के आयोजन में सरकार की विफलता हो, मंत्रियों की जवाबदेही का अभाव हो, या किसी संगठन को मिलने वाली वित्तीय व विधिक छूट—हर पहलू पर पारदर्शिता और आधुनिक लोकतांत्रिक मानदंडों के अनुसार पुनर्मूल्यांकन की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है। लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब सबसे शक्तिशाली तंत्र से भी सबसे कठिन सवाल पूछे जाएं।
