भरत भूषण प्रकरण: क्या भारत में न्यायिक प्रक्रिया के स्थान पर ‘तत्काल न्याय’ की संस्कृति विकसित हो रही है?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


भरत भूषण प्रकरण: क्या भारत में न्यायिक प्रक्रिया के स्थान पर ‘तत्काल न्याय’ की संस्कृति विकसित हो रही है?

"लोकतंत्र की असली परीक्षा सत्ता से नहीं, सत्ता पर प्रश्न उठाने वालों के साथ उसके व्यवहार से होती है"

बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर क्षेत्र के बिलौटी गांव से सामने आया भरत भूषण तिवारी प्रकरण केवल एक व्यक्ति की मृत्यु का मामला नहीं रह गया है। यह घटना उन व्यापक प्रश्नों को जन्म दे रही है जो भारतीय लोकतंत्र, कानून के शासन, नागरिक स्वतंत्रताओं और राज्य की जवाबदेही से जुड़े हुए हैं।


यदि किसी नागरिक की मृत्यु पुलिस कार्रवाई में होती है, विशेषकर तब जब घटना को लाखों लोग प्रत्यक्ष या सोशल मीडिया माध्यमों से देख रहे हों, तो स्वाभाविक रूप से जनता के मन में अनेक प्रश्न उठते हैं। ऐसे प्रश्नों को लोकतंत्र-विरोधी या व्यवस्था-विरोधी कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। वास्तव में प्रश्न पूछना ही लोकतांत्रिक नागरिकता का मूल तत्व है।


## कानून का शासन बनाम राज्य की शक्ति


भारतीय संविधान का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है—Rule of Law अर्थात कानून का शासन। इस सिद्धांत का अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति को अपराधी मान लेने मात्र से उसके संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। भारत का संविधान, दंड प्रक्रिया संहिता और सर्वोच्च न्यायालय की अनेक ऐतिहासिक व्याख्याएँ स्पष्ट करती हैं कि अपराध सिद्ध करने का अधिकार केवल न्यायपालिका को है, कार्यपालिका को नहीं।


यही कारण है कि पुलिस को अपराध की जांच, गिरफ्तारी और कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार तो प्राप्त है, लेकिन दंड देने का अधिकार नहीं। यदि किसी मुठभेड़ में पुलिस द्वारा बल प्रयोग अपरिहार्य था, तो इसकी जांच होना आवश्यक है। यदि बल प्रयोग आवश्यकता से अधिक था, तो उससे भी अधिक आवश्यक है कि इसकी निष्पक्ष जांच हो। लोकतांत्रिक राज्य की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह कितनी शक्ति रखता है, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपनी शक्ति पर कितने नियंत्रण स्वीकार करता है।


## एनकाउंटर संस्कृति का प्रश्न


पिछले दो दशकों में देश के विभिन्न हिस्सों में पुलिस मुठभेड़ों को लेकर लगातार बहस होती रही है। नकई मामलों में पुलिस ने दावा किया कि उसने खतरनाक अपराधियों का सामना किया। वहीं अनेक मामलों में मानवाधिकार संगठनों, न्यायालयों और नागरिक समूहों ने स्वतंत्र जांच की मांग उठाई। समस्या केवल किसी एक राज्य या किसी एक सरकार की नहीं है।


वास्तविक चिंता उस मानसिकता की है जिसमें न्यायिक प्रक्रिया को धीमा और एनकाउंटर को त्वरित न्याय का विकल्प समझा जाने लगता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए अत्यंत खतरनाक है।


यदि समाज यह मानने लगे कि अदालतों की आवश्यकता नहीं और पुलिस ही न्याय का अंतिम स्रोत है, तो कल वही शक्ति किसी भी नागरिक के विरुद्ध प्रयुक्त हो सकती है।


इतिहास बताता है कि जब भी राज्य को अनियंत्रित शक्ति मिली है, उसका दायरा धीरे-धीरे बढ़ता गया है। जो अधिकार पहले अपराधियों के विरुद्ध प्रयोग किए गए, वे बाद में असहमति रखने वालों तक भी पहुँच गए।


## जनसरोकार उठाने वालों की सुरक्षा


बताया जाता है कि भरत भूषण तिवारी अपने क्षेत्र में गंगा कटाव, विस्थापन, स्थानीय समस्याओं और जनहित के मुद्दों को लेकर सक्रिय थे। यदि यह तथ्य सही है तो यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या जनसरोकारों को उठाने वाले नागरिक स्वयं को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं?


लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है। लोकतंत्र पंचायत से संसद तक जनता की आवाज़ पहुँचाने की व्यवस्था का नाम है। यदि जनता की ओर से प्रश्न उठाने वाले लोग भय, उत्पीड़न या असुरक्षा की भावना अनुभव करने लगें, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर पड़ने लगती है।


## विरोध प्रदर्शन और राज्य की प्रतिक्रिया


किसी भी विवादित घटना के बाद जनता द्वारा शांतिपूर्ण विरोध करना संवैधानिक अधिकार है। अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति, संगठन और शांतिपूर्ण प्रतिवाद का अधिकार प्रदान करता है। साथ ही राज्य का दायित्व है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखे। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संतुलन आवश्यक है—न तो हिंसक भीड़तंत्र स्वीकार्य है और न ही शांतिपूर्ण असहमति का दमन। जब जनता का एक बड़ा वर्ग किसी घटना पर प्रश्न उठा रहा हो, तब सबसे प्रभावी उत्तर पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच होती है।


## क्या समाज हिंसा के प्रति अधिक सहिष्णु होता जा रहा है?


यह प्रश्न किसी एक दल या एक सरकार से कहीं बड़ा है। पिछले वर्षों में सार्वजनिक जीवन में भाषा की आक्रामकता, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सामाजिक अविश्वास बढ़ा है। सोशल मीडिया ने संवाद को तेज बनाया है, लेकिन कई बार उसने समाज को खेमों में भी विभाजित किया है।


आज अनेक लोग किसी भी घटना का मूल्यांकन इस आधार पर करते दिखाई देते हैं कि पीड़ित कौन है और आरोपी कौन। यदि पीड़ित हमारी विचारधारा का है तो हम न्याय की मांग करते हैं; यदि नहीं है तो हम मौन हो जाते हैं। यही चयनात्मक नैतिकता लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।


कानून का शासन तभी जीवित रह सकता है जब न्याय की मांग व्यक्ति, जाति, धर्म, वर्ग और राजनीतिक पहचान से ऊपर उठकर की जाए।


## न्याय का सिद्धांत सार्वभौमिक होना चाहिए


यदि किसी समुदाय के साथ अन्याय हो तो उसके विरोध में आवाज़ उठनी चाहिए। यदि किसी दूसरे समुदाय के साथ वही अन्याय हो तो भी वही आवाज़ उठनी चाहिए।


यदि किसी राजनीतिक विरोधी के अधिकारों का उल्लंघन हो तो भी लोकतंत्र को उतनी ही चिंता होनी चाहिए जितनी अपने समर्थकों के अधिकारों की होती है। संविधान का अर्थ ही यही है कि वह बहुमत की इच्छा से ऊपर नागरिक की गरिमा की रक्षा करता है।


## आगे का रास्ता


भरत भूषण प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता निष्पक्ष, समयबद्ध और पारदर्शी जांच की है। यदि पुलिस की कार्रवाई विधिसम्मत थी तो जांच से यह स्पष्ट होना चाहिए। यदि कहीं प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है तो दोषियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। लोकतंत्र में सत्य का निर्धारण भीड़, अफवाह या राजनीतिक प्रचार से नहीं, बल्कि स्वतंत्र जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होना चाहिए।


भरत भूषण तिवारी की मृत्यु का मामला अंततः केवल बिहार का मामला नहीं है। यह उस भारत का प्रश्न है जिसे संविधान ने कानून के शासन पर खड़ा किया था।


आज आवश्यकता किसी व्यक्ति, दल या विचारधारा का पक्ष लेने की नहीं, बल्कि उस मूल सिद्धांत की रक्षा करने की है जिसके बिना लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता—कि किसी भी नागरिक का जीवन और स्वतंत्रता विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना नहीं छीनी जा सकती।


यदि इस सिद्धांत को कमजोर होने दिया गया, तो अंततः नुकसान किसी एक समुदाय, किसी एक दल या किसी एक राज्य का नहीं होगा; नुकसान भारतीय गणराज्य की उस आत्मा का होगा जो न्याय, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा के वादे पर आधारित है।