चुनाव आयोग या चुनावी प्रबंधन आयोग? मीनाक्षी नटराजन प्रकरण, बंगाल का मतदाता-संकट और लोकतंत्र का संस्थागत क्षरण

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


चुनाव आयोग या चुनावी प्रबंधन आयोग? मीनाक्षी नटराजन प्रकरण, बंगाल का मतदाता-संकट और लोकतंत्र का संस्थागत क्षरण

लोकतंत्र केवल मतदान की औपचारिकता नहीं है। उसकी असली परीक्षा उन संस्थाओं की निष्पक्षता में होती है जो चुनाव को संचालित करती हैं, और उन प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता में होती है जिन पर हारने वाला भी भरोसा कर सके। यही कारण है कि जब मध्यप्रदेश में कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होता है, और साथ ही पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान लाखों नामों के हटने पर गहरा विवाद खड़ा होता है, तो प्रश्न किसी एक उम्मीदवार या एक राज्य तक सीमित नहीं रह जाता; प्रश्न चुनावी प्रणाली की साख का बन जाता है।

संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को निर्वाचन-प्रक्रिया की “superintendence, direction and control” की केंद्रीय शक्ति देता है। इसी संवैधानिक आधार के कारण आयोग से अपेक्षा की जाती है कि वह केवल कागज़ों पर मुहर लगाने वाली संस्था न रहे, बल्कि निष्पक्ष रेफरी की तरह विवादों का निपटारा भी करे। चुनावी हलफ़नामे के लिए आयोग का फॉर्म 26 साफ़ कहता है कि उम्मीदवार को अपने लंबित आपराधिक मामलों की घोषणा करनी होगी; उसमें FIR, अदालत, केस नंबर, धाराएँ, अपराध का संक्षिप्त विवरण, और यह तक पूछना होता है कि आरोप तय हुए हैं या नहीं। आयोग की 2022 की निर्देशावली और उससे जुड़ी सुप्रीम कोर्ट की रेखांकित व्यवस्था यह भी बताती है कि राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों के आपराधिक antecedents वेबसाइट, अख़बारों और टीवी पर प्रकाशित करने होते हैं।


मीनाक्षी नटराजन विवाद की जड़ यही है कि विवादित मामले को किस श्रेणी में रखा जाए। इंडिया टुडे के अनुसार, यह एक निजी शिकायत से शुरू हुआ प्रकरण है; कांग्रेस का कहना है कि कोई FIR दर्ज नहीं हुई, केवल अदालत की ओर से नोटिस आया था, और इसलिए उसे “लंबित आपराधिक मामला” मानकर खुलासा करना आवश्यक नहीं था। दूसरी ओर, रिटर्निंग ऑफिसर ने यह मानते हुए नामांकन रद्द कर दिया कि हलफ़नामे में जरूरी जानकारी छिपाई गई है। बाद में कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने निर्वाचन आयोग के सामने आपत्ति दर्ज कराई और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा। यही वह बिंदु है जहाँ प्रशासनिक विवेक, विधिक व्याख्या और राजनीतिक संदेह—तीनों एक साथ टकराते हैं। लेकिन लोकतंत्र का संकट केवल इस एक नामांकन से नहीं बनता। संकट तब गहराता है जब जनता को यह महसूस होने लगे कि नियम सबके लिए समान नहीं हैं। मीनाक्षी नटराजन मामले में कांग्रेस का आरोप है कि बिना FIR और बिना सामान्य आपराधिक प्रक्रिया के किसी निजी शिकायत को ऐसे पढ़ा गया जैसे वह पक्का लंबित केस हो; जबकि निर्वाचन तंत्र से अपेक्षा यह थी कि वह संदेह की स्थिति में अधिक पारदर्शी, अधिक सुनवाई-प्रधान और अधिक संतुलित रवैया अपनाए। इसी तरह बंगाल में SIR के दौरान लगभग 9 मिलियन नाम हटाए जाने, जिनमें 2.7 मिलियन को “doubtful” या सत्यापन-लंबित श्रेणी में रखा गया, ने बड़े पैमाने पर disenfranchisement की आशंका को जन्म दिया। कुछ रिपोर्टों में 27 लाख दावों के अस्वीकार होने का उल्लेख भी है। जब एक ही समय में नामांकन-प्रक्रिया और मतदाता-सूची—दोनों पर अविश्वास बढ़े, तो लोकतंत्र के भीतर का भरोसा टूटने लगता है।


यह भी ध्यान देने की बात है कि सार्वजनिक जीवन में आपराधिक antecedents के प्रश्न पर न्यायालय और आयोग दोनों ने पारदर्शिता को केंद्रीय मूल्य माना है। सुप्रीम कोर्ट ने Public Interest Foundation मामले में उम्मीदवारों के मामलों में disclosure की आवश्यकता को रेखांकित किया था; अदालत के अवलोकनों में यह बात भी आई कि लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी मतदाता के “right to know” का हिस्सा है, और राजनीतिक दलों पर अपने उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों की सूचना प्रकाशित करने का दायित्व है। इसीलिए यदि कोई नामांकन रद्द होता है, तो जनता का पहला प्रश्न केवल “क्यों” नहीं, बल्कि “क्या सभी पर यही नियम समान रूप से लागू हुआ” भी बन जाता है।


यहीं विपक्ष की भी परीक्षा शुरू होती है। यदि वह वास्तव में मानता है कि संस्थाएँ निष्पक्ष नहीं रह गई हैं, तो केवल प्रेस कॉन्फ़्रेंस, नाराज़ बयान और औपचारिक बैठकों से काम नहीं चलेगा। कांग्रेस ने इस प्रकरण पर विरोध दर्ज कराया, आयोग के बाहर प्रदर्शन किया और शीर्ष अदालत का दरवाज़ा खटखटाया; लेकिन व्यापक राष्ट्रीय प्रतिरोध का प्रश्न उससे भी बड़ा है। बंगाल में मतदाता-सूची विवाद पर जिस प्रकार व्यापक विपक्षी एकजुटता नहीं बन पाई, वही कमजोरी यदि राज्यसभा नामांकन जैसे मुद्दे पर भी दोहराई गई, तो यह सिर्फ़ एक दल की नहीं, समूचे विपक्ष की राजनीतिक अक्षमता होगी। लोकतंत्र को बचाने के लिए विपक्ष को संसद, न्यायपालिका और जनमत—तीनों स्तरों पर एक साथ, निरंतर और अनुशासित ढंग से लड़ना पड़ता है।


पर सवाल विपक्ष से शुरू होकर सिर्फ़ विपक्ष पर खत्म नहीं होता। असली सवाल यह है कि क्या चुनावी संस्थाएँ अभी भी उतनी ही स्वतंत्र, पारदर्शी और आत्मविश्वासी हैं जितनी उन्हें होना चाहिए। जब आयोग की शक्तियाँ अनुच्छेद 324 के तहत व्यापक हैं, और जब उसके फॉर्म 26, disclosure rules तथा criminal-antecedent guidelines पहले से मौजूद हैं, तब किसी भी एकतरफा, अस्पष्ट या असंगत फैसले का असर साधारण प्रशासनिक भूल से कहीं बड़ा हो जाता है। वह निर्वाचन-प्रक्रिया की नैतिक संरचना को चोट पहुँचाता है। और लोकतंत्र में सबसे खतरनाक बीमारी सत्ता का दमन नहीं, भरोसे का क्षरण है। भरोसा गिरते ही चुनाव रहते हैं, पर लोकतंत्र का अर्थ खोने लगता है।


इसलिए मीनाक्षी नटराजन प्रकरण को केवल एक सीट, एक उम्मीदवार या एक दल के कोण से देखना भूल होगी। यह हमारे समय का संस्थागत लिटमस टेस्ट है। यह बताता है कि क्या भारत की चुनावी व्यवस्था अब भी समान अवसर, निष्पक्ष सुनवाई और पारदर्शी नियमों की जमीन पर खड़ी है, या फिर वह धीरे-धीरे ऐसी मशीन में बदल रही है जो चुनाव कराती तो है, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा नहीं कर पाती। बंगाल का मतदाता-संकट, राज्यसभा नामांकन का विवाद और विपक्ष की बिखरी प्रतिक्रिया—तीनों मिलकर एक ही चेतावनी दे रहे हैं: यदि संस्थाएँ अपनी विश्वसनीयता खो दें, तो गणतंत्र की इमारत भीतर से खोखली होने लगती है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी रक्षा किसी एक जीत में नहीं, निष्पक्ष प्रक्रिया की निरंतरता में है। और उसी निरंतरता की आज सबसे कठोर परीक्षा हो रही है।