कलम की आग

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


कलम की आग

जब-जब कलम आग उगलती है,

सत्य स्वयं उद्घोषक बन जाता है,

झूठ के ऊँचे महलों पर

एक-एक शब्द वज्र बनकर गिर जाता है।


वह केवल कागज़ पर नहीं चलती,

वह समय के माथे पर लिखती है,

मस्तिष्क की जड़ता को तोड़ती,

अंतरात्मा की निद्रा को भंग करती है।


उसकी नोक से निकले अक्षर

साधारण पंक्तियाँ नहीं होते,

वे प्रश्न बनकर जन्म लेते हैं,

और व्यवस्था के द्वारों पर दस्तक देते हैं।


जब शब्द चेतना में उतरते हैं,

मन के बंद कपाट खुलते हैं,

सुविधा के अंधेरे कोनों में

विवेक के दीपक जलते हैं।


फिर सोई हुई प्रजा जागती है,

आँखों से भ्रम का पर्दा हटता है,

मौन की जंजीरें टूटती हैं,

और मनुष्य स्वयं से प्रश्न करता है।


हृदय में परिवर्तन की चिंगारी

धीरे-धीरे ज्वाला बनती है,

अन्याय के विरुद्ध उठी हुई चेतना

जनशक्ति की मशाल बनती है।


जब वह ज्वाला घरों की देहरी लाँघकर

गलियों और सड़कों तक आती है,

जब जनमन का आक्रोश

संकल्प का रूप अपनाता है,


तब इतिहास करवट लेता है,

समय की धारा दिशा बदलती है,

और किसी रणभेरी से पहले

विचारों की क्रान्ति जन्म लेती है।


क्योंकि क्रान्तियाँ तलवारों से नहीं,

जागृत आत्माओं से जन्म लेती हैं,

और हर महान परिवर्तन की शुरुआत

किसी निर्भीक कलम की आग से होती है।


कलम जब आग उगलती है,

तो केवल शब्द नहीं लिखती—

वह युगों की नींद तोड़ती है,

और भविष्य का इतिहास रचती है।