राष्ट्रीय विमर्श (भाग-२): प्रतिपक्ष का अंतर्विरोध, युवा असंतोष और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


राष्ट्रीय विमर्श (भाग-२): प्रतिपक्ष का अंतर्विरोध, युवा असंतोष और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा

## 'का बरखा जब कृषि सुखानी' की चेतावनी के बीच, क्या क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षाओं का त्याग कर प्रतिपक्ष एक दीर्घकालिक राष्ट्रीय विकल्प बन पाएगा?

भारतीय राजनीति के वर्तमान फलक पर विपक्ष की एकजुटता जितनी आवश्यक दिखाई देती है, उतनी ही उसकी आंतरिक कमियां और विरोधाभास उसकी राह को कठिन बनाते हैं। दिल्ली की बैठक के बाद यह सवाल मौजूं हो गया है कि क्या 'INDIA' गठबंधन समय रहते चेतेगा, या इतिहास उसे एक और चूके हुए अवसर के रूप में याद रखेगा? राजनीतिक हलकों में पुरानी कहावत गूंज रही है—'का बरखा जब कृषि सुखानी' अर्थात् जब समय ही निकल जाए, तो उसके बाद की गई कोशिशें निरर्थक हो जाती हैं। प्रतिपक्ष को अपनी चुनावी और वैचारिक ज़मीन सूखने से पहले निर्णायक कदम उठाने होंगे।


1. स्वयंभू महत्त्वाकांक्षाएं और दल-बदल का मनोवैज्ञानिक संकट


विगत वर्षों में देश ने देखा है कि विपक्ष के कई नेताओं ने खुद को 'स्वयंभू' और प्रधानमंत्री पद के लिए एकमात्र उपयुक्त उम्मीदवार मानने की जो ऐतिहासिक भूलें कीं, उसने वैचारिक मोर्चे पर विभाजन पैदा किया।


* 2024 के जनादेश के बाद का भटकाव: 2024 के आम चुनाव में जनता ने सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ विपक्ष पर जो भरोसा जताया था, वह क्षेत्रीय क्षत्रपों के पलटीमार रवैये और महत्त्वाकांक्षाओं के कारण बिखर गया।

* संस्थागत क्षरण का प्रभाव: इस बिखराव का लाभ उठाकर सत्ता पक्ष ने शासन के अन्य स्तंभों पर अपना प्रभाव और सुदृढ़ किया, जिससे प्रतिपक्ष के भीतर एक गहरी निराशा (Defeatism) का माहौल बना। इसी हताशा का परिणाम है कि पराजित या कमजोर हो रहे दलों के नेताओं का झुकाव निरंतर सत्ताधारी दल की ओर बढ़ रहा है।


दृष्टिकोण: इस पलायन और निराशा का कोई तात्कालिक वैधानिक इलाज नहीं है। इसका एकमात्र समाधान सामूहिक लक्ष्य की स्पष्टता और निजी राजनैतिक स्वार्थों का पूर्ण परित्याग है। यदि आगामी चुनावों में टिकटों के बंटवारे को लेकर पुनः वैसी ही खींचतान हुई, तो यह गठबंधन स्वतः ही विघटनकारी साबित हो जाएगा।


2. युवा आक्रोश: शिक्षा व्यवस्था का संकट और रोज़गार का प्रश्न


इस अंधियारे दौर में यदि विपक्ष के लिए कोई सबसे बड़ी उम्मीद की किरण है, तो वह है देश की युवा शक्ति का बढ़ता असंतोष। वर्तमान में स्कूल से लेकर NEET और CBSE जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं की साख पर जो गंभीर प्रश्नचिह्न लगे हैं, उसने करोड़ों पढ़े-लिखे युवाओं के भविष्य को अधर में लटका दिया है।


```

    युवा असंतोष का चक्र:

[लेटरल एंट्री/बैकडोर भर्तियां] ➔ [परीक्षाओं में धांधली (NEET/CBSE)] ➔ [बढ़ती बेरोजगारी] ➔ [व्यापक सामाजिक असंतोष]


```


प्रशासनिक सेवाओं में 'बैकडोर एंट्री' (Lateral Entry) के निर्णयों से लेकर परीक्षा तंत्र की हालिया विफलताओं तक, युवाओं के भीतर व्यवस्था के प्रति गहरी नाराजगी है। वर्तमान परिदृश्य में केवल कांग्रेस और वामपंथी दल (Left Front) ही इस मोर्चे पर सड़क पर डटकर संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। इस युवा शक्ति को दिशा और सही मार्गदर्शन देना केवल एक दल का नहीं, बल्कि पूरे प्रतिपक्ष का राष्ट्रीय दायित्व है।


3. प्रतिपक्ष के आंतरिक अंतर्विरोध और भाजपा की रणनीति


विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि सत्ताधारी दल की राजनीतिक रणनीति अत्यंत आक्रामक है। जिसने भी उसके वर्चस्व को चुनौती दी—चाहे वह आम आदमी पार्टी हो, शिवसेना हो, या तृणमूल कांग्रेस—उसे अभूतपूर्व सांगठनिक और कानूनी दबाव का सामना करना पड़ा है। ऐसे में विपक्ष की आपसी कलह आत्मघाती है:


* अक्षम्य क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता: केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस और वामदलों के बीच की कटुता राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की विश्वसनीयता को कमजोर करती है। प्रतिपक्ष को समझना होगा कि वैचारिक संकट के इस दौर में वामपंथी दल ही उसके सबसे सुदृढ़ सहयोगी हैं।

* असंतोष का समय पर निवारण: डीएमके (DMK) जैसे मजबूत क्षेत्रीय सहयोगियों की नाराजगी को नजरअंदाज करने के बजाय संवाद के जरिए सुलझाना होगा। यह समय परस्पर लड़ने का नहीं, बल्कि 'समायोजन' (Accommodation) का है।


सुझाव: विपक्ष को अपनी कार्यशैली बदलनी होगी। दो महीने में एक बार मिलना अब पर्याप्त नहीं है। डिजिटल युग में देश की पल-पल बदलती गतिविधियों पर नजर रखने के लिए 'दैनिक ऑनलाइन समन्वय' (Daily Online Coordination) की व्यवस्था अनिवार्य की जानी चाहिए।


4. राजनैतिक शुचिता, अल्पसंख्यकों की स्थिति और संस्थागत चुनौतियां


देश में बढ़ती सांप्रदायिकता, मस्जिदों और धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद और अल्पसंख्यक समाज में पनपता असुरक्षा का भाव भारतीय राष्ट्रवाद के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है। इसके साथ ही, मीडिया के एक बड़े वर्ग का इस्तेमाल कर कर्तव्यपरायण अधिकारियों और विचारकों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रतिकूल है।


इसके अतिरिक्त, प्रतिपक्ष को अपने भीतर और लोकतांत्रिक संस्थाओं में मौजूद उन 'प्रच्छन्न तत्वों' या एजेंटों की पहचान करनी होगी जो अंदर रहकर व्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं। न्यायपालिका से लेकर अन्य स्वतंत्र निकायों में जो गतिरोध दिखाई देता है, उसकी जड़ें इसी वैचारिक घुसपैठ में हैं।


5. संघर्ष का माद्दा और जड़ों की ओर वापसी


विगत बारह वर्षों के राजनीतिक इतिहास का निष्पक्ष विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सत्ता के भारी दबाव के सामने निरंतर संघर्ष करने का माद्दा मुख्य रूप से कांग्रेस और वामदलों ने ही दिखाया है। गठबंधन के कई अन्य क्षेत्रीय दल समय-समय पर सत्ता की 'मधुर चाशनी' का स्वाद चख चुके हैं, जिसके कारण उनके प्रति जन-विश्वसनीयता में कमी आई है।


अब समय आ गया है कि ये तमाम दल अपनी जड़ों (Roots) की ओर लौटें। हर मोर्चे पर विफल नीतियों के खिलाफ एक 'संयुक्त मोर्चा' बनाकर केवल बंद कमरों में नहीं, बल्कि सड़क पर उतरकर जन-आंदोलनों की कमान संभालनी होगी।


यह भारतीय लोकतंत्र का संभवतः सबसे कठिन और अंधियारा दौर है, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब देश की युवा शक्ति और जन-आंदोलन एक साथ जागते हैं, तो बड़े से बड़ा सत्ता-प्रतिष्ठान भी ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। प्रतिपक्ष को अपने मन से भय निकालकर इस वैचारिक महासंग्राम में उतरना ही होगा।